<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970</id><updated>2011-07-07T19:20:26.104-07:00</updated><category term='कविता'/><category term='मुक्ति'/><category term='छात्र राजनीति'/><category term='बिहारी छात्र'/><category term='पटना कॉलेज'/><category term='बराक हुसैन ओबामा'/><category term='मार्क्सवाद'/><category term='विकास'/><category term='दिल्ली विश्वविद्यालय'/><category term='भोजपुरी'/><category term='जे एन यू'/><category term='भय'/><category term='यू स ए राष्ट्रपति'/><category term='चुनाव परिणाम'/><category term='Patna Gandhi Maidan  Images'/><category term='साधना'/><category term='लोकतंत्र'/><title type='text'>पटना गाँधी मैदान  : Patna Gandhi Maidan</title><subtitle type='html'>पटना शहर में गंगाजी के तट पर विशाल ऐतिहासिक मैदान .वाद,विवाद ,संवाद ,पक्ष, विपक्ष , कथा ,गीत,  नृत्य ,संगीत ,मेला, ठेला और सब की आश्रय स्थली . इस ऐतिहासिक मैदान में आपका स्वागत है .</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>59</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-6962670832616135441</id><published>2010-05-14T20:16:00.000-07:00</published><updated>2010-05-14T21:14:53.773-07:00</updated><title type='text'>राजधानी पटना के एक हाई स्कूल में शिक्षा , शिक्षक और बेचारे विद्यार्थियों का हाल -  दैनिक जागरण , पटना  , से  एक  खबर</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/S-4bRLFtHtI/AAAAAAAAAKw/fMD61Xm9LyM/s1600/Nov2009_Ghar+039.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/S-4bRLFtHtI/AAAAAAAAAKw/fMD61Xm9LyM/s320/Nov2009_Ghar+039.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5471340579150175954" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/S-4azNuOL0I/AAAAAAAAAKo/5s7obTCPIy8/s1600/Nov2009_Ghar+038.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/S-4azNuOL0I/AAAAAAAAAKo/5s7obTCPIy8/s320/Nov2009_Ghar+038.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5471340064460910402" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/S-4aQ927gDI/AAAAAAAAAKg/3ovgmbmUq_c/s1600/Nov2009_Ghar+037.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/S-4aQ927gDI/AAAAAAAAAKg/3ovgmbmUq_c/s320/Nov2009_Ghar+037.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5471339476086915122" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;राजधानी पटना के एक हाई स्कूल में शिक्षा , शिक्षक और बेचारे विद्यार्थियों का हाल -   दैनिक जागरण , पटना से  एक  खबर &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; दैनिक जागरण , पटना  के हवाले ,पटना जिले के धनरुआ प्रखंड में स्थित पभेडा हाई स्कूल की एक खबर आई है.  पभेडा , पटना मसौढ़ी गया रोड के निकट एक बड़ा गाँव और बाजार है. मोबाइल और लैंड लाइन टेलिफोन की सुविधा,पभेड़ी मोड़ पटना गया उच्च पथ पर स्थित एक ठीक ठाक बाजार ,प्रखंड मुख्यालय से पभेडा गाँव महज चार किलो मीटर की दूरी . राजधानी पटना भी बीस किलो मीटर से ज्यादा दूर नहीं.मतलब  पभेडा गाँव हर मायने में आधुनिक संचार , यातायात और प्रशासनिक व्यवस्था केंद्र के  बेहद निकट अवस्थित  है..आप पढ़ कर अनुमान लगाएं की इस स्कूल में क्या हो रहा होगा.  हमने शिक्षा को किन लोगों के हवाले कर दिया है और नयी पीढ़ी को क्या पढ़ा और सिखा रहे हैं.अगर पभेडा हाई स्कूल में यह सब हो सकता है तो सुदूर देहाती स्कूलों और खास कर प्राथमिक  तथा मध्य विद्यालयों में बच्चों पर किस किस तरह के जुल्म ढाए जाते होंगें ? मन सिहर उठता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  गुस्साये शिक्षक ने छात्रों की पिटाई की, चार जख्मीMay 14, 11:46 pmबताएं &lt;br /&gt;Twitter Delicious Facebook मसौढ़ी धनरूआ प्रखंड की आदर्श पंचायत पभेड़ा स्थित श्री राम हरि उच्च विद्यालय के एक शिक्षक ने दर्जनों छात्रों को शुक्रवार को पिटाई कर दी, जिससे चार छात्र गंभीर रूप से जख्मी हो गये। बाद में उनका उपचार स्थानीय निजी क्लीनिक में कराया गया। इन छात्रों का दोष इतना था कि मुख्यमंत्री की विकास यात्रा की संभावित दौरे को लेकर शुक्रवार की सुबह योजनाओं की समीक्षा करने गये बीडीओ से ग्रामीणों ने विद्यालय की बदतर स्थिति की शिकायत की थी और इन शिकायतों की जांच करने बीडीओ विद्यालय पहुंचे थे। वहां छात्र-छात्राओं ने ग्रामीणों की शिकायत की पुष्टि भर कर दी थी। इस बीच बीडीओ ने विद्यालय की बदतर स्थिति की लिखित जानकारी एडीओ को देते हुए कार्रवाई करने का आग्रह किया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मिली जानकारी के मुताबिक धनरूआ प्रखंड की पभेड़ा पंचायत सरकार द्वारा घोषित आदर्श पंचायत है। ऐसी संभावना जतायी जा रही है कि मुख्यमंत्री अपनी विकास यात्रा को लेकर निकट भविष्य में इस पंचायत का भी दौरा करेगे। मुख्यमंत्री के इस दौरे को लेकर शुक्रवार की सुबह बीडीओ शंकर प्रसाद सिंह पभेड़ा पंचायत में क्रियान्वित योजनाओं की समीक्षा करने पहुंचे वहां ग्रामीणों ने उनसे गांव में स्थित श्री राम हरि उच्च विद्यालय की बदहाल स्थिति की शिकायत की। ग्रामीणों से मिली इन शिकायतों की जांच करने बीडीओ तुरन्त विद्यालय पहुंचे। वहां की स्थिति देख वे चकित रह गये। विद्यालय में गंदगी का अंबार लगा था और छात्र-छात्राएं खेल रहे थे। विद्यालय के कुल दस शिक्षकों में से प्रधानाध्यापक सत्य नारायण सिंह समेत नौ शिक्षक व दोनों आदेशपाल अनुपस्थित थे। हालांकि प्रधानाध्यापक ने उन्हे सेलफोन पर खुद को जिला शिक्षा पदाधिकारी के कार्यालय में कार्यवश होने को बताया। छात्र-छात्राओं ने भी बीडीओ से हमेशा अधिकांश शिक्षकों के अनुपस्थित रहने व इस कारण उनका पठन-पाठन बाधित रहने की शिकायत दर्ज करायी। उधर जांच के बाद बीडीओ के लौट जाने के करीब दो घंटे के उपरान्त विद्यालय के शिक्षक ब्रजेश कुमार, पूनम कुमारी व उपेन्द्र कुमार वहां पहुंचे। शिक्षकों को देख कक्षा नौवीं व दशमी के छात्रों ने उनसे कक्षा लेने का अनुरोध किया। बीडीओ से खुद की गयी शिकायत से पहले से ही आक्रोशित शिक्षक ब्रजेश कुमार तिलमिला उठे और उन्होंने पहले उन छात्रों के साथ अपशब्दों का प्रयोग किया और फिर उनसे बदला लेने की एक सोची समझी साजिश के तहत कक्षा लेने के बहाने उन्हे कक्षा में ले गये और वहां छात्रों को डंडा, चप्पल से पीटना शुरू कर दिया इससे छात्र चोटिल हो गये। थाना में लिखित आवेदन दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऊपर की यह खबर  जमीनी स्तर पर शिक्षा की बदहाल  व्यवस्था से साक्षात्कार कराता है . सरकारी व्यवस्था  के विपरीत हासिये पर स्थित  देहाती तबकों में शिक्षा की ललक और  व्यक्तिगत निष्ठा और समर्पण का दर्शन कराती ऊपर में  दी गयी तीन तस्वीरें धनरुआ प्रखंड के मध्य विद्यालय ननौरी की है. दिसम्बर  महीने का पहला सप्ताह , समय सुबह के साढ़े आठ बजे. गाँव के एक उतसाही आदर्शवादी व्यक्ति स्कूल खुलने के पहले गाँव के बच्चों को अपने निजी स्तर  पर प्रारभ्मिक शिक्षा  देते हैं . स्कूल भवन , पढ़ाने वाले की निष्ठा और बच्चों की स्थिती पर गौर करें .  गाँव के  bottom  ५०%   के बच्चे पढ़ना लिखना सीख रहें हैं.पढ़ने वालों में बालिकायों की संख्या पर देखें . पढ़ने और पढ़ाने की कैसी ललक है यहाँ . पर  सरकारी शिक्षा  व्यवस्था पर कैसे लोगों का कब्जा है और वो कैसे कैसे सितम ढाते हैं.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-6962670832616135441?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/6962670832616135441/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=6962670832616135441' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/6962670832616135441'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/6962670832616135441'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='राजधानी पटना के एक हाई स्कूल में शिक्षा , शिक्षक और बेचारे विद्यार्थियों का हाल -  दैनिक जागरण , पटना  , से  एक  खबर'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/S-4bRLFtHtI/AAAAAAAAAKw/fMD61Xm9LyM/s72-c/Nov2009_Ghar+039.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-847457722167358781</id><published>2010-04-02T23:57:00.000-07:00</published><updated>2010-04-03T01:22:00.824-07:00</updated><title type='text'>ताज़ी तस्वीरें- बिहार के खेत ,घर और सडकों  से</title><content type='html'> बिहार के खेत - खलिहानों ,घर - बाहर की ये  चंद तस्वीरें क्या कहती हैं  ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खेत में हार्वेस्टर कोम्बायीन &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/S7btbIath0I/AAAAAAAAAJw/3kAKlsPhHfQ/s1600/DapthunDharaut-1+010.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/S7btbIath0I/AAAAAAAAAJw/3kAKlsPhHfQ/s320/DapthunDharaut-1+010.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5455809048977704770" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टाटा की नैनो को मात देती देसी जुगाड़ जिसे लोग बाग़ &lt;strong&gt;झर झरिया गाडी &lt;/strong&gt;कह रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/S7bpO2VU1OI/AAAAAAAAAJo/TECkgE8_cuc/s1600/P1010825.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/S7bpO2VU1OI/AAAAAAAAAJo/TECkgE8_cuc/s320/P1010825.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5455804439918335202" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर&lt;br /&gt; &lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/S7b2CfIfRGI/AAAAAAAAAKI/-MWGNtSdwr0/s1600/P1010899.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/S7b2CfIfRGI/AAAAAAAAAKI/-MWGNtSdwr0/s320/P1010899.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5455818521183208546" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;घरौंदा &lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/S7bxxYytjZI/AAAAAAAAAJ4/sGhEVwFaPkg/s1600/P1010891.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/S7bxxYytjZI/AAAAAAAAAJ4/sGhEVwFaPkg/s320/P1010891.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5455813829376970130" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हुक्का&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/S7b0ufjti6I/AAAAAAAAAKA/hN9-5ZgnG8k/s1600/Huwen+Tsang+Memorial+Nalanda+076.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; 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height: 240px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/S7b4Mkjh5OI/AAAAAAAAAKY/ybSVKK73LU0/s320/P1010818.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5455820893460751586" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-847457722167358781?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/847457722167358781/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=847457722167358781' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/847457722167358781'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/847457722167358781'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='ताज़ी तस्वीरें- बिहार के खेत ,घर और सडकों  से'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/S7btbIath0I/AAAAAAAAAJw/3kAKlsPhHfQ/s72-c/DapthunDharaut-1+010.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-2571069655516662842</id><published>2010-01-22T03:25:00.000-08:00</published><updated>2010-01-22T03:41:30.250-08:00</updated><title type='text'>कुहेलिका . कुहेलिका</title><content type='html'>पूरे उत्तरी भारत में ठंढ का ऐसा आलम है की अखबार और टी वी चैनल वालों को उपयुक्त विशेषण नहीं मिल रहे हैं .अनुप्रास अलंकार की तो बात hin नहीं है .मित्र नीरज ने दिल्ली के कुहरे , ठंढक और उसमें बनते बिगड़ते मनोविज्ञान का बढ़िया खाका अपनी इस कविता में खींचा है. सुन्दर शब्द चयन और संगीतात्मकता से भरी इस कविता का आनंद उठायें. नीरज भारत सरकार में पदाधिकारी हैं. )&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुहेलिका . कुहेलिका&lt;br /&gt;हिम विदीर्ण हवा की&lt;br /&gt;कठिन यह पहेलिका .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यन्त्र रथी हुए रुद्ध&lt;br /&gt;बद्ध गमन आगमन&lt;br /&gt;जम गए जटिल क्षण&lt;br /&gt;हिमनद हुआ गगन .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्षीण स्मरण ताप से&lt;br /&gt;पिघले प्रतीक्षा&lt;br /&gt;स्वपन सहित स्वास की&lt;br /&gt;कैसी परीक्षा .&lt;br /&gt;- Niraj Kumar&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-2571069655516662842?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/2571069655516662842/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=2571069655516662842' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/2571069655516662842'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/2571069655516662842'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='कुहेलिका . कुहेलिका'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-5323651867881655691</id><published>2009-10-19T23:13:00.000-07:00</published><updated>2009-10-20T00:40:09.791-07:00</updated><title type='text'>ड़ी पी एस  आर के पुरम ,नयी दिल्ली ,से  आई आई टी में दाखिले का सुपर  हाई वे</title><content type='html'>ड़ी पी एस आर के पुरम से सीधे आई आई टी में दाखिले का सुपर हाई वे .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आई आई टी प्रवेश परीक्षा में शामिल होने के लिए निम्नतम योग्यता + २ परीक्षा में 80 या 85 % किये जाने की चर्चा है . अगर कोई विद्यार्थी +२ की बोर्ड परीक्षा में निर्धारित 80 -85 % से कम अंक लाता है तो वह आई आई टी के परीक्षा में शामिल नहीं हो सकता है.&lt;br /&gt;अगर देश भर के विभिन्न राज्यों की माध्यमिक परीक्षा बोर्डों की बात की जाय तो 80 -85 % से ऊपर अंक से +२ परीक्षा पास करने वाले छात्रों की संख्या बमुश्किल से कुछ हजार होगी. आज के हिंदुस्तान समाचार पत्र में झारखण्ड ,उत्तराखंड ,उत्तर प्रदेश और बिहार के सन्दर्भ में यह आंकडा (2009 की बोर्ड परीक्षा के आधार पर ) 35 -3700 पहुंचता है. मतलब यह की 35 करोड़ की आबादी वाले हिंदी पट्टी के ये चार राज्यों के कुल जमा चार हजार छात्र आई आई टी की प्रवेश परीक्षा में बैठ सकेंगें.हाँ कहने वाले जरूर यह कह सकते हैं की इन राज्यों के सी बी एस सी के स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों में इस प्रवेश परीक्ष में बैठने की योग्यता वाले छात्रों की संख्या राज्य माध्यमिक बोर्डों से पास होने वाले छात्रों की तुलना में अच्छी होगी .तर्क के लिए अगर मान भी लिया जाय तो भी इन चार राज्यों से परीक्षा में बैठने वाले छात्रों का आंकडा दस हजार से कतय्यी आगे नहीं जाएगा.&lt;br /&gt;हिंदी भाषी इन चार पिछडे राज्यों से अब निगाह हटायें और दिल्ली के कुलीन प्रतिष्ठित विद्यालय डीपीएस आर के पुरम को देखें.यह भारत की राजधानी दिल्ली के रसूख वाले लोगों के वारिसों का स्कूल है. 2009 की सीबीऍसई की बोर्ड परीक्षा में तक़रीबन ८०० छात्र छात्राएं 80 % से ज्यादा अंकों से पास की .विज्ञानं के तक़रीबन छः सौ छात्र आई आई टी की प्रवेश परीक्षा में शामिल होने की पात्रता रखते हैं.&lt;br /&gt;अब आप बताईये किस सामजिक आर्थिक पृष्ठभूमि वाले छात्र आई आई टी में शामिल हो सकते हैं.जब प्रवेश परीक्षा में शामिल होने में हिन् इतनी बंदिशें  तो सरकारी पैसों पर चलने वाले इन उच्च शिक्षण संस्थायों में ,हिंदुस्तान के गाँव और कस्बों छोटे शहरों के सरकारी और म्युनिसिपल स्कूलों से पढ़ने वाले बच्चे , शिक्षा प्राप्त करने का सपना  कैसे देख सकते हैं&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; जनाब यह तो सीधे सीधे संस्थागत तरीके से ग्रामीण और कस्बाई सरकारी स्कूलों के बच्चों के EXCLUSION की साजिश है.&lt;br /&gt;इसे कहते हैं संस्थागत रूप से प्रतिभा की छंटाई और प्रतिभा का सृजन .मेधा सृजन और निर्माण की यह नयी रवायत है.किसने कहा की सब को समान अवसर मिलना चाहिए . कौन कहता है की मेधा का सृजन सामजिक प्रक्रिया है .&lt;br /&gt;सनद रहे ,इक्कीसवीं सदी में हम मुक्कम्मल तौर पर भारत को मेधा -आधारित समाज और राष्ट्र बनाना चाहते हैं.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-5323651867881655691?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/5323651867881655691/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=5323651867881655691' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/5323651867881655691'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/5323651867881655691'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='ड़ी पी एस  आर के पुरम ,नयी दिल्ली ,से  आई आई टी में दाखिले का सुपर  हाई वे'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-2462651796178350359</id><published>2009-08-06T22:20:00.000-07:00</published><updated>2009-08-06T22:44:57.386-07:00</updated><title type='text'>मगध के ऐतिहासिक धरोहर की हिफाजत कौन करेगा ?</title><content type='html'>&lt;span style="color:#990000;"&gt;दैनिक जागरण , पटना के हवाले से एक खबर आई है .  नालंदा जिला , हिलसा अनुमंडल के थरथरी प्रखंड के राजबाद गाँव में तालाब की खुदाई में प्राचीन भगनाव्शेष मिलाने की खबर आई है . कहने की जरूरत नहीं की इस की मुकम्मल पुरातात्विक उत्खनन और संरक्षण की जरूरत है . यूँ पूरा मगध क्षेत्र हीं  गौतम बुद्ध की कर्म भूमि रही है ,पर &lt;strong&gt;इस क्षेत्र के गौरवमयी (बुद्ध काल ,मौर्य, गुप्त काल और पाल वंश के पांच सौ साल के शासन काल तक )  इतिहास और सांस्कृतिक धरोहर  को द्रिघ्कालीन सुदृढ़ नीति बनाकर सहेजकर रखने और विकसित करने की जरूरत है&lt;/strong&gt; .इस समाचार को विस्तार से पढें .&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;तालाब की खुदाई में मिले प्राचीन सभ्यता के अवशेष&lt;br /&gt;हिलसा (नालंदा) Aug 06, 09:42 pm&lt;br /&gt;जिले के हिलसा अनुमंडल के थरथरी प्रखंड क्षेत्र के जैतपुर पंचायत अंतर्गत राजाबाद गांव में सरकारी स्तर पर तालाब खुदाई के दौरान प्राचीन सभ्यता के अवशेष मिले है। ग्रामीणों ने समझदारी दिखाते हुए मशीनों से हो रही तालाब की खुदाई रोक दी है और खुद कुदाल व फावड़े लेकर भग्नावशेषों को बिना क्षति पहुंचाये खुदाई करने में जुट गये है। कार्य की देखरेख कर रहे ग्रामीणों ने विशेष कार्य प्रमंडल के जूनियर इंजीनियर को इस बाबत सूचित कर दिया है लेकिन भग्नावशेषों को मिले दो दिन गुजर गये, अब तक कोई भी सक्षम पदाधिकारी स्पाट पर नहीं पहुंचे है। पुरातत्व विभाग भी इस प्रकरण से अबतक अनजान है। वैसे एएसआई के निदेशक एमजे निकोसे ने कहा कि अगर तालाब खुदाई में प्राचीन स्थापत्य कला के भग्नावशेष मिले है तो वह जल्द ही विशेषज्ञों की एक टीम राजाबाद गांव भेजेंगे। जो तमाम तथ्यों का बारीकि से मुआयना करेगी।&lt;br /&gt;बता दें कि राजाबाद अवस्थित तालाब की खुदाई विशेष कार्य प्रमंडल के अधीन हो रही है। खुदाई कार्य अंतिम चरण में पहुंच चुका है। 9.75 लाख की इस कार्य योजना के तहत तालाब को 335 वर्ग फुट क्षेत्र में 7.5 फुट गहरा किया गया है। इसी क्रम में तालाब के पश्चिमी क्षेत्र में 21 फुट लंबा व 16 फुट चौड़ा चबूतरा मिला है। इस चबूतरे में लगी ईटे 14 इंच लंबी, 9 इंच चौड़ी व 2.5 इंच मोटाई की है। चबूतरा पश्चिम से पूरब की ओर झुका हुआ है। चबूतरे के उत्तर-दक्षिण लकड़ी का भीमकाय कालम भी है। इसके अलावा पानी में डूबा एक विशालकाय लकड़ी का खंभा भी है। जिसे ग्रामीणों ने मशीन के सहारे उखाड़ने की कोशिश की लेकिन खंभा टस से मस नहीं हुआ। फिलहाल इस खुदाई कार्य की देखरेख कर रहे संजय सिंह, पंचायत के पूर्व मुखिया श्यामनंदन शर्मा, ललन सिंह, बिन्दा प्रसाद व संतोष कुमार सहित कई अन्य लोगों के नेतृत्व में तालाब की खुदाई करायी जा रही है। ग्रामीणों को कुछ और महत्वपूर्ण अवशेष मिलने की संभावना नजर आ रही है।&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-2462651796178350359?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/2462651796178350359/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=2462651796178350359' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/2462651796178350359'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/2462651796178350359'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='मगध के ऐतिहासिक धरोहर की हिफाजत कौन करेगा ?'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-1714422651976189880</id><published>2009-07-25T09:51:00.000-07:00</published><updated>2009-07-25T10:04:09.476-07:00</updated><title type='text'>पटना के आला पुलिस अफसरों का तबादला : दोषियों को उचित सजा मिलना बाकी है</title><content type='html'>एक्जीविशन रोड की शर्मसार करने वाली घटना में अभी सारे दोषियों को गिरफ्तार किया जाना बाकी है .पर सरकार ने फौरी कार्रवाई करते हुए इलाके में तैनात आला पुलिस अफसरों का तबादल कर दिया है.लेकिन इतने से नहीं होगा . इस शर्मनाक घटना में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में शामिल सभी तत्वों को  &lt;strong&gt;एक्सेम्प्लारी&lt;/strong&gt; &lt;strong&gt;दंड&lt;/strong&gt; देने की आवश्यकता है . देखिये ऐसा कब तक होता है . लेकिन जितनी कारवाई अभी तक हुयी है संतोष प्रद है.समाचार विस्तार से पढें ;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;Stripping of woman: Top police brass transferred&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;AGENCIES &lt;span style="color:#990000;"&gt;25 July 2009, 08:27pm&lt;/span&gt; ISTPrint&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;PATNA&lt;/span&gt;: Bihar Chief Minister Nitish Kumar on Saturday reshuffled the state's top police brass following an alleged assault and stripping of a woman  by a group of men. The incident shocked the nation.&lt;br /&gt;Fourteen Indian Police Service (IPS) officers including the inspector general of police and the deputy inspector general have been transferred, IANS reported.&lt;br /&gt;Top police officers in Patna, including district and city police chiefs, have been removed and posted at different places.&lt;br /&gt;Fourteen deputy superintendents of police have also been transferred.&lt;br /&gt;The reshuffle of the police brass is being seen as a damage control exercise after the opposition and women's rights activists criticised the government for alleged lawlessness in the state.&lt;br /&gt;A group of men had abused, assaulted and then stripped a woman in her 20s in full public view at a busy road in the state capital Thursday evening.&lt;br /&gt;A police team was reportedly present at the site and watched the attack on the woman for nearly an hour before taking the culprits to the police station.&lt;br /&gt;Assistant sub-inspector Shiv Nath Singh, who was in charge of patrolling the area, has already been suspended for not helping the woman in time.&lt;br /&gt;The woman was identified as a resident of Jesidih, a town in the neighbouring state Jharkhand. Rakesh Kumar, a resident of Punaichak here, had lured her to Patna with a promise of providing a job to her.&lt;br /&gt;Soon after she came here, Rakesh allegedly forced her to have sex with his friends. She ran away from the hotel where she had been staying with him for the last few days. However, Rakesh and his friends caught up with her and attacked her.&lt;br /&gt;3 held for assault on girl in public&lt;br /&gt;According to PTI, three persons were on Saturday arrested in connection with alleged assault and stripping of a young woman by a group of people.&lt;br /&gt;Police said the arrested persons were Ashok Kumar, owner of the hotel where the woman allegedly engaged in flesh trade stayed, and the hotel manager besides an alleged pimp.&lt;br /&gt;DIG Police (central range) J S Gangwar said that the arrests were made after a case was registered on the basis of the woman's statement under various sections of the IPC and the Prevention of Immoral Trafficking Act.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-1714422651976189880?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/1714422651976189880/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=1714422651976189880' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/1714422651976189880'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/1714422651976189880'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/07/blog-post_25.html' title='पटना के आला पुलिस अफसरों का तबादला : दोषियों को उचित सजा मिलना बाकी है'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-5869262304949406700</id><published>2009-07-24T22:57:00.000-07:00</published><updated>2009-07-24T23:33:18.321-07:00</updated><title type='text'>शर्मसार माहौल में संवेदनशीलता और मानवता की किरण - सी आई एस एफ  के जवान और कार चालक  को सलाम</title><content type='html'>कल पटना गाँधी मैदान से सटे एक्जिविसन रोड में दिन दुपहरिया जो शर्मनाक वाकया हुआ उसकी जितनी भी भर्त्सना की जाय कम है. हम सब को मिल बैठकर सोचने की जरूरत है की ऐसी घटनायों की पुर्नावृत्ति कैसे रोकी जाय .इस तरह का वीभत्स व्यवहार तो निरा बर्बर समुदायों में ही संभव है.अब जब यह हादसा हो गया है तो इस कुकृत्य में सीधे तौर पर शामिल लोगों पर तो कार्रवाई हो ही , उन लोगों पर भी करवाई होनी चाहिए जो बतौर मूक दर्शक इसमें शामिल थे.&lt;br /&gt;हाँ संतोष इस बात का है की समाज की संवेदन शीलता ख़तम नहीं हुयी है .हम उस बहादुर जवान और कार चालक को सलाम करते हैं और उम्मीद करते हैं की उसे राजकीय सम्मान मिले . और उस महिला का चरित्र हनन करने वाले पुलिस के आला अधिकारियों को भी उचित सजा मिले.&lt;br /&gt;ये जनाब कुछ इस अंदाज में उस महिला को जिस्म फरोश कह रहे थे जैसे उनको यह अधिकार मिला है की जिस्म फरोसी में शामिल हर महिला को वे ऐसी सजा दिलवाएं .सरकार ऐसे संवेदनहीन और भ्रष्ट पुलिस वालों से तो निपटे या न निपटे हम जरूर भगवान से प्रार्थना करेंगें की प्रभु इन्हें सद्बुद्धि दें ,और इनके अपनों को इस महिला जैसा दिन कभी न देखना पड़े .&lt;br /&gt;समाचार अंश विस्तार से पढें .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सीआईएसएफ का जवान था युवती को थाने पहुंचाने वाला&lt;br /&gt;Jul 25, 12:41 am&lt;br /&gt;पटना एक्जीबिशन रोड पर भरी भीड़ से युवती को बचा कर गांधी मैदान पहुंचाने वाला केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल का जवान था। इसके अलावा डेयरी प्रोजेक्ट के निदेशक के कार चालक ने भी युवती को भीड़ से निकालने में अहम भूमिका निभाई थी।&lt;br /&gt;एक्जीबिशन रोड पर गुरुवार की शाम जब भारी भीड़ युवती के साथ बदसलूकी कर रही थी तो दो युवकों के हौसले ने मानवता को और ज्यादा शर्मसार होने से बचा लिया था। गुरुवार की शाम वरीय पुलिस अधिकारियों ने इन्हें बिहार पुलिस का जवान बताते हुये इनकी खोज किये जाने की बात कही थी। पुलिस अधिकारियों के अनुसार इनमें से एक केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल का जवान देवेंद्र था। यह एक्जीबिशन रोड स्थित एक बैंक आया हुआ था। भीड़ देख जब वह मामला जानने नजदीक गया तो उसे भरी भीड़ में युवती फंसी नजर आयी। उसने अपना परिचय देखकर राकेश व युवती को भीड़ से बाहर निकाला। इस काम में डेयरी प्रोजेक्ट के निदेशक के चालक विनीत ने भी अहम भूमिका निभाई। ये दोनों ही राकेश व युवती को लेकर गांधी मैदान पहुंचे। दोनों को आज पुलिस मुख्यालय बुला कर इनकी पीठ ठोंकी गयी। पुलिस अधिकारियों के अनुसार इन दोनों को जल्द ही सम्मानित किया जाएगा।&lt;br /&gt;: दैनिक जागरण पटना से साभार&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-5869262304949406700?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/5869262304949406700/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=5869262304949406700' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/5869262304949406700'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/5869262304949406700'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/07/blog-post_24.html' title='शर्मसार माहौल में संवेदनशीलता और मानवता की किरण - सी आई एस एफ  के जवान और कार चालक  को सलाम'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-8433081526289549207</id><published>2009-07-13T09:41:00.000-07:00</published><updated>2009-07-13T20:31:56.686-07:00</updated><title type='text'>दरवाजे पर तिरंगे में बी पी एल ,परिवार ( बिलो पावर्टी लाइन )का ठप्पा - दृश्य सोनीपत , हरियाणा  के एक गाँव से</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/Slv5sOcvOjI/AAAAAAAAAII/GooloXSZ_L8/s1600-h/sonepat_120709+037.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/Slv5sOcvOjI/AAAAAAAAAII/GooloXSZ_L8/s320/sonepat_120709+037.JPG" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5358150719875529266" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;इस तस्वीर को गौर से देखें &lt;strong&gt;.जिला सोनीपत , हरियाणा&lt;/strong&gt; के &lt;/span&gt;&lt;span id="0" class=" transl_class" title="Click to correct"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;इस&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt; गाँव में गरीबी रेखा से नीचे गुजर बसर करने वाले (बी पी एल) हर घर की चौन्खट पर यह ठप्पा लगा हुआ है . इस का प्रारूप देने वाले का सौन्दर्य बोध तो देखें , इसे तिरंगें में बनाया गया है .&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;यह ठप्पा गरीब और गरीबी की पहचान को आसन बनाता है या के गरीब और गरीबी को दागदार करता है ?&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;मैं कोई  निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाया शायद आप पहुँच जाएँ. &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-8433081526289549207?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/8433081526289549207/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=8433081526289549207' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/8433081526289549207'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/8433081526289549207'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/07/blog-post.html' title='दरवाजे पर तिरंगे में बी पी एल ,परिवार ( बिलो पावर्टी लाइन )का ठप्पा - दृश्य सोनीपत , हरियाणा  के एक गाँव से'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/Slv5sOcvOjI/AAAAAAAAAII/GooloXSZ_L8/s72-c/sonepat_120709+037.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-8847809376726769978</id><published>2009-06-28T09:36:00.000-07:00</published><updated>2009-06-28T10:18:43.061-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Patna Gandhi Maidan  Images'/><title type='text'>पटना गाँधी मैदान में जून महीने की एक शाम</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SkeiKPPaFCI/AAAAAAAAAGE/yrKZeBgZsYc/s1600-h/ghar%40june2009+018.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SkeiKPPaFCI/AAAAAAAAAGE/yrKZeBgZsYc/s320/ghar%40june2009+018.JPG" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5352424978926670882" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/Skehcf-NnII/AAAAAAAAAF8/nigw7S8SBgE/s1600-h/ghar%40june2009+017.JPG"&gt;&lt;strong&gt; पापा ,एक फोटो मेरा भी गाँधी मैदान में .&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/Skehcf-NnII/AAAAAAAAAF8/nigw7S8SBgE/s1600-h/ghar%40june2009+017.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/Skehcf-NnII/AAAAAAAAAF8/nigw7S8SBgE/s320/ghar%40june2009+017.JPG" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5352424193143970946" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SkegtpQu2OI/AAAAAAAAAF0/4dWqt2XRI3E/s1600-h/ghar%40june2009+020.JPG"&gt;&lt;strong&gt;बस यूं हीं कुछ भाग दौड हो जाय &lt;/strong&gt;.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SkegtpQu2OI/AAAAAAAAAF0/4dWqt2XRI3E/s320/ghar%40june2009+020.JPG" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5352423388183714018" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/Skefs5-P3OI/AAAAAAAAAFs/nq4pupWRomY/s1600-h/ghar%40june2009+013.JPG"&gt;&lt;strong&gt;पटना  कलेक्ट्री से घर लौटता किसान &lt;/strong&gt; .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/Skefs5-P3OI/AAAAAAAAAFs/nq4pupWRomY/s320/ghar%40june2009+013.JPG" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5352422275978091746" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SkeeWSEhGvI/AAAAAAAAAFk/IoNrjJXgJhg/s1600-h/ghar%40june2009+014.JPG"&gt;&lt;strong&gt;मैदान में क्रिकेट  .&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SkeeWSEhGvI/AAAAAAAAAFk/IoNrjJXgJhg/s1600-h/ghar%40june2009+014.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SkeeWSEhGvI/AAAAAAAAAFk/IoNrjJXgJhg/s320/ghar%40june2009+014.JPG" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5352420787798219506" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SkedOoW9CYI/AAAAAAAAAFc/INjLemH6Jeg/s1600-h/ghar%40june2009+015.JPG"&gt;&lt;strong&gt;चिन्तन अखबार के संग .&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SkedOoW9CYI/AAAAAAAAAFc/INjLemH6Jeg/s1600-h/ghar%40june2009+015.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SkedOoW9CYI/AAAAAAAAAFc/INjLemH6Jeg/s320/ghar%40june2009+015.JPG" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5352419556830546306" /&gt;&lt;strong&gt;दफ्तर से लौट कर सुस्ताते और ताश खेलते सरकारी मुलाजिम .&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;पटना गाँधी मैदान में पर्याप्त  गुन्जायिश है .&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;जून 2, 2009.&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-8847809376726769978?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/8847809376726769978/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=8847809376726769978' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/8847809376726769978'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/8847809376726769978'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/06/blog-post.html' title='पटना गाँधी मैदान में जून महीने की एक शाम'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SkeiKPPaFCI/AAAAAAAAAGE/yrKZeBgZsYc/s72-c/ghar%40june2009+018.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-8496258802613130235</id><published>2009-05-25T23:04:00.000-07:00</published><updated>2009-05-25T23:08:12.258-07:00</updated><title type='text'>कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी : आई आई टी प्रवेश परीक्षा -सुपर थर्टी , पटना और कोटा का अंतर.</title><content type='html'>कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी : आई आई टी प्रवेश परीक्षा ,सुपर थर्टी ,पटना और कोटा का अंतर .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजस्थान का कोटा शहर ,डेढ़ दो दशकों से +2 के बाद कि मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा कि तैयारी का अहम् मुकाम बना हुआ है .पचासों हजार  लडके लडकियां , हर साल ,यहाँ के नामी गिरामी कोचिंग संस्थायों में मेडिकल ,इंजीनियरिंग में दाखिला लेने के सुन्दर सपने संजोये आते हैं.बंसल क्लास्सेस और अल्लेन सरीखी संस्थायों में माध्यम वर्ग कि हैसियत से फाजिल शुल्क लगता है . कई अभिभावक पेट काट कर ऊँचे फीस वाले इन व्यवसायिक संस्थानों में अपने बच्चों को साल दर साल भेजते रहें हैं. हर साल प्रवेश परीक्षायों  में अपेक्षित सफलता इन संस्थानों को मिलती रही है . पता नहीं समानुपातिक नजरिये से देखें तो सफलता का क्या प्रतिशत बैठेगा . पर ये  कोचिंग संस्थान साल दर साल जरूर इतना कुछ कर लेते हैं कि इनके बाजार और ग्राहकों में उतरोत्तर वृद्धि  होती रहती है.जानकार बताते हैं कि कोचिंग के इर्द गिर्द अरबों रुपये का व्यवसाय कोटा में संचालित हो रहा हैऔर फलस्वरूप स्थानीय अर्थव्यवस्था फल फूल रही है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोटा के इन  व्यवासायिक कोचिंग संस्थानों कि तुलना अगर पटना के सुपर 30 (   फिलहाल श्री आनंद कुमार द्वारा प्रायोजित और पूर्व में अभयानंद जी द्वारा संयुक्त रूप से संचालित ) सुपर 50 ( अभ्यानान्दजी ) रहमानी थर्टी , अंग , मगध और नालंदा थर्टी जैसी संस्थायों से करें कुछ खास बातें सामने आती हैं.पटना और बिहार के इन संस्थानों में ये सारे प्रयास समाज के  उन मेधावी छात्रों के लिए हैं जो वंचित तबके से आते हैं.  छात्रों का चुनाव  लिखित प्रवेश परीक्षा से ये  संस्थान करते हैं.आनंद कुमार , अभयानंद तथा  समाज सेवियों ( रहमानी फौन्डेशन आदि ) के द्वारा जुटायी गयी धन राशिः से इन बच्चों के  रहने और खाने पीने कि निःशुल्क व्यवस्था होती है.  प्रवेश परीक्षा कि तैयारी इनके मार्गनिर्देशन में  होती है.इसके एवज में अभिभावकों से कोई शुल्क नहीं लिया जाता है.  यहाँ पर आठ दस महीनों में हीं इनकी मेधा का परिमार्जन कुछ इस तरह होता है कि सुपर थर्टी हर साल सफलता की नयी बुलंदी हासिल करता रहा है. इसके हमजोली अन्य सुपर ५० आदि पिछले साल शुरू किये गए और उन्हें भी  इस वर्ष काबिले तारीफ़ सफलता मिली है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समाज के बंचित तबकों कि मेधा को इस तरह कि पालिश , और वो भी निशुल्क ,देश में अन्यत्र उपलब्ध नहीं है . कोटा में भी नहीं , जहां कोचिंग का अरबों रुपये का व्यवसाय है.&lt;br /&gt; पटना में भले हीं  नए मठ , मंदिर , धर्मशाले न बने हों , पर आनंद  कुमार का सुपर थर्टी  , अभयानंद का सुपर फिफ्टी और रहमानी थर्टी  आदि  बेमिसाल संस्थाएं तो हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वंचित तबकों कि निःशुल्क मेधा सृजन का ऐसा अनोखा  पुनीत कार्य क्या बिहार में हीं संभव था ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहने का मन कर रहा है कि कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्री आनंद कुमार और अभ्यानान्दजी के जज्बे और  दृढ निश्चय को सलाम .&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-8496258802613130235?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/8496258802613130235/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=8496258802613130235' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/8496258802613130235'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/8496258802613130235'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/05/blog-post_25.html' title='कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी : आई आई टी प्रवेश परीक्षा -सुपर थर्टी , पटना और कोटा का अंतर.'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-3618228802659276627</id><published>2009-05-25T03:23:00.000-07:00</published><updated>2009-05-25T04:25:11.814-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विकास'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चुनाव परिणाम'/><title type='text'>बिहार का चुनाव परिणाम - बदलता बिहार ?</title><content type='html'>बिहार में परिवर्तन ,विकास की शक्ल अख्तियार कर रहा है .जिस किसी से बात करें वो इस की पुष्टि करेगा.ऐसा लगता है की लम्बे ठहराब के बाद पहली बार कुछ सकारात्मक होते घटते लोग बाग़ देख रहें हैं. एक सपना बुनने लगे हैं लोग.उन्हें उम्मीद की किरण दिखने लगी है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले २५-३० सालों में करोडों बिहारी रोजी रोटी  की तलाश और पढाई लिखाई के लिए बिहार से बाहर निकले. बिहारी श्रम और मस्तिष्क देश के हर कोने में हाजिर है.बाहर रहने वाले इन बिहारियों को अगर आर्थिक शरणार्थी  कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी.भारत के हालिया आर्थिक विकास में बिहारियों खास कर बिहारी श्रम का कितना योगदान है ? यह प्रश्न अलग शोध की मांग करता है . &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तक बिहार और बिहारी  नकारात्मक ढंग से ही बिहार के बाहर लिया जाता रहा है . बाहर में रहने वाले बिहारियों के लिए अक्सरहां यह संबोधन अपमानजनक लगता रहा है. ऐसी क्या बात है की किसी बंगाली को बंगाली और पंजाबी को पंजाबी संबोधन अपमान जनक नहीं लगता है ? पर आप किसी भी आप्रवासी बिहारी से बात करें ,  बाहर में बिहारी संबोधन उसे गाली जैसा बेधता है .बिहारी होना  और उसके इर्द गिर्द बनाने वाली पहचान उसे  परदेसी  जीवन की भागदौड़ और बने रहने के जद्दो जहद में  वे बजह की बाधक लगती  है. यह शब्द अपमान और तिरस्कार का बोध जगाता है. बाहर के लोग कहते &lt;br /&gt; हैं की भाई ,अगर बिहारी हो तो बिहारी कहलाने और सुनने  में कैसा अपमान और किसी लज्जा? बहुत कुछ उसी तरह ,जैसे की जातिगत अंहकार और श्रेष्ठता के दंभ &lt;br /&gt; में अक्सरहां लोग बाग़ कहते मिल जाते हैं की अगर कोई चमार है तो उसे चमार न कहा जाय तो क्या कहा जाय ? चमार कहे जाने की चुभन को तो कोई चमार ही महसूस कर सकता है.बिहारी कहे जाने पर हिय के शूल को सिर्फ प्रवासी बिहारी हीं महसूस कर सकता है ! प्रवासी बिहारी कि  परदेस में वही गति है जो हिन्दू समाज में दलितों की है . दोनों अपने भूत से भाग रहे हैं. वर्तमान दोनों के लिए दुखद है ,ये शब्द  गौरव नहीं हीनता बोध कराते है . दलित और  प्रवासी बिहारी दोनों , अपनी पहचान , छिपाने को अभिशप्त दिखाते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; जानकार विश्लेषक कह रहें हैं की बिहार बदल रहा है .हालिया चुनाव परिणाम बदलते बिहार  के नजरिये से देखा जा रहा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिहार में जो  सुखद बदलाब  आ रहा है वह किसी से छिपा नहीं है . परिवर्तन की दिशा ठीक है . परिवर्तन समग्र विकास का रूप ले . हर इलाके और समाज के हर तबकों को शामिल करे  , इस की गति तीव्र हो , भला इन बातों से किसे इनकार होगा .&lt;br /&gt;बिहार  में पिछले साठ सालों में किसी न किसी रूप में सरकारी तंत्र , शासन , विकास सब पर जातिवादी एकाधिकार , पक्षपात और लूट खसोट हावी रहा . &lt;br /&gt;राजनैतिक हुकूमत ,शासन की  आड़ में नंगा जातिवादी खेल , पचास के दशक से ही चालु है .यह अलग बात है की पासा पलटने पर कुछ तबके ज्यादा जोर से चिल्लाते रहें हैं.&lt;br /&gt;लोकतांत्रिक चेतना  के विकास के इस  दौर का तकाजा है - सामजिक न्याय के साथ विकास . जो कोई भी इस कसौटी पर खरा नहीं उतरेगा वह देर सबेर हासिये पर फ़ेंक दिया जाएगा.&lt;br /&gt;तो क्या बिहार में बरसों से जारी विकास के नाम पर लूट खसोट  और जातिवादी एकाधिकार की प्रवृत्ति की उलटी गिनती शुरू हो गयी है ?&lt;br /&gt;क्या वाकई सामजिक न्याय के साथ विकास की शुरूयात हो गयी है ?&lt;br /&gt;इस पर कुछ कहेंगें तो विमर्श आगे बढेगा.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-3618228802659276627?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/3618228802659276627/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=3618228802659276627' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/3618228802659276627'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/3618228802659276627'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/05/blog-post.html' title='बिहार का चुनाव परिणाम - बदलता बिहार ?'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-4383672633240391276</id><published>2009-05-20T20:31:00.000-07:00</published><updated>2009-05-20T20:43:28.508-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पटना कॉलेज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छात्र राजनीति'/><title type='text'>उन दिनों कैसा था पटना कॉलेज ! बिहार विमर्श -9</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;आलेख वीरेन्द्र &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;. &lt;span style="color:#990000;"&gt;कैसा था पटना का पटना कॉलेज.अपनी  ऐतिहासिक उपलब्धियों के बदौलत ,बिहार के  सिरमौर कॉलेज के रूप में ख्याति रही है इस कॉलेज की .यह अंक पटना कॉलेज कथा की नवीनतम कड़ीहै . तो आप बीती पर उनके इस लेख में जमाने की शक्ल -ओ -सूरत भी साफ़ नजर आती है.इसे पढें और बिहार विमर्श के इस आयाम को विस्तृत करें.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;पिछले अंक में मैंने आपसे वादा किया था कि मैं आपको &lt;strong&gt;पटना कॉलेज&lt;/strong&gt; के छात्रों के गैर-शैक्षणिक सरोकारों से रु-ब-रू करवाऊंगा. तो आइये मेरे साथ और देखिये यह नज़ारा और सुनिए यह गल्प.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;तो एक चक्कर लगा लें पटना कॉलेज का. &lt;strong&gt;अशोक राजपथ&lt;/strong&gt; के उत्तरी किनारे पर बना यह कॉलेज अपनी ऐतिहासिक ईमारतों के लिए आज भी मशहूर है. कहते हैं, अंग्रेजों के ज़माने में यह &lt;strong&gt;नील व्यवसाय &lt;/strong&gt;का केंद्र था और यहाँ नीलहे गोरे साहब रहा करते थे. पुराने पटना कॉलेज में ईमारतों के तीन खंड थे और तीनों बेहद ख़ूबसूरत कॉरिडोर से जुड़े हुए थे. अब यहाँ चौथा खंड भी है जिसमें मनोविज्ञान की कक्षाएं चलती हैं. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;लेकिन बिना प्रवेश द्वार पर रुके आप इस कॉलेज के गैर-शैक्षणिक सरोकारों से परिचित नहीं हो सकेंगे. अशोक राजपथ पर बने इस प्रवेश द्वार के दाहिनी तरफ रिक्शावालों ने अपना अवैध डिपो बना रखा है जबकि बायीं तरफ राजेन्द्रजी  की ख्यातिलब्ध चाय की दूकान बरसों से उसी टूटी-फूटी अवस्था में विराजमान रही है. जिन छात्रों का कॉलेज के अन्दर दबदबा होता था, वे इस दूकान पर अवश्य बैठते थे. राजेन्द्रजी की दूकान पर एक साथ ही चाय की अंगीठी और चिलम की गूल जलते रहती थी. ऐसे में यह संयोग भर नहीं था कि उनकी चाय से भी गांजे की खुशबू हवा में बिखरती रहती थी. कुछ तो उनकी उम्र की वज़ह से और बहुत कुछ उनकी दुहरी उपयोगिता की वज़ह से, उस दूकान पर आनेवाला कोई भी छात्र उनसे बेअदबी से बात नहीं करता था. उनका दावा था कि वे कई पीढियों के बीच सेतु का काम करते रहे हैं; कि आज भी उनकी जान-पहचान बड़े-बड़े अधिकारियों के साथ है. खैर, राजेन्द्रजी खुद भी गांजे का निरंतर सेवन करते थे और अपनी उदारता से नए छात्रों को भी उत्प्रेरित करते थे. उनका मानना था कि गांजा स्वस्थ्य के लिए कतई हानिकारक नहीं होता क्योंकि यह शिव का प्रसाद है. अच्छी नीयत से गांजा पीनेवाला न तो कभी किसी डॉक्टर का मोहताज होता है और न ही उसे किसी के बारे में गलत सोचने या करने की फुर्सत होती है. वह तो खुद ही शिवमय हो जाता है. &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;इस प्रवेश द्वार से पटना कॉलेज में दाखिल होते ही आप महसूस करेंगे कि अन्दर की दुनिया सिर्फ गांजे के धुँए में सराबोर नहीं है. सच कहा जाये तो पटना कॉलेज अपनी तमाम अधोगति के बावजूद अपना अपना शैक्षणिक वजूद बचाए रखने में कामयाब रहा था. यहाँ बिहार के सभी हिस्सों के वे मेधावी छात्र जो विज्ञान की पढाई नहीं कर सकते थे, इकठ्ठा होते थे. इसके अलावा, एक दस्तूर के रूप में जो बात हमारे दौर में स्थापित होती जा रही थी, वह यह थी कि प्रशासनिक सेवा में जाने का सबसे सुगम मार्ग कला विषयों के बगीचे से होकर गुजरता है.   नतीजतन, साइंस कॉलेज से पटना कॉलेज आनेवालों छात्रों की भी अच्छी खासी तादात रहती थी. पटना कॉलेज में आने का मेरा भी अघोषित उद्देश्य यही था. चूंकि मैं विज्ञान का छात्र था, इसलिए कला विषयों के बारे मैं कोई बारीक समझ नहीं रखता था. हाँ, वरिष्ठ छात्रों से पता चला था कि समाजशास्त्र सिविल सर्विसेस की परीक्षा के लिए बेहतर विषय हो सकता है. सो, मैंने समाजशास्त्र का वरण कर लिया. &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;वरण तो कर लिया किन्तु हासिल क्या हुआ? शिक्षकों की गुणवत्ता के आधार पर देखा जाये तो पटना कॉलेज का समाजशास्त्र विभाग का कोई ख़ास महत्व नहीं था. शुरू के एक-दो हफ्ते तो मुझे सबकुछ दिलचस्प लगा क्योंकि मेरे लिए यह एक नया विषय था. गोपाल बाबु, गोपी कृष्ण प्रसाद (GKP), सरदार देवनंदन सिंह (SDN) जैसे शिक्षक विभाग की शोभा बढा रहे थे. इनमें से अगर किसी एक के पास शिक्षक बनने की योग्यता और गरिमा थी तो वे थे GKP. सच कहूं तो उन्हीं की कक्षा में आभास होता था कि समाजशास्त्र में भी कुछ समझने की जरूरत है. वरना, दूसरे तो शायद ही कभी किस्सागोई की सरहद पार कर पाते थे. मिसाल के तौर पर मैं यहाँ SDN सिंह की शिक्षण-पद्धति के बारे में एक रोचक बात बताना चाहूँगा. चाहे वे मार्क्स के बारे में बताएं या मेक्स वेबर के बारे में, अंत वे खुद द्वारा ईजाद की गई एक रोचक पहेली से करते थे - &lt;strong&gt;'मार्क्स (वेबर) के विचारों को न तो प्रूव किया जा सकता है, न ही डिसप्रूव किया जा सकता है, यह अंततः अनप्रूव्ड रह जाता है.'&lt;/strong&gt; उनकी यह उक्ति इतनी बचकानी लगती थी कि मैं मन ही मन मुस्कराते रहता था. बाद में पता चला कि लालू प्रसाद यादव के शासनकाल में SDN सिंह पहले इंटरमेडीएट काउन्सिल के अध्यक्ष बने और बाद में मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरा के वाइस चांसलर. कुछ दिनों तक उन्होनें सुलभ इंटरनॅशनल को भी अपनी सेवाएं दी थीं. खैर, पढाई के मामले में खुद का ही भरोसा रहा. दीगर है कि पटना कॉलेज के होस्टलों में तब सभी विषयों के उम्दा छात्र रहते थे. उनसे बातें करके, उनसे नोट्स लेकर और उनके सुझाव सुनकर हम सबको बहुत कुछ सीखने का मौका मिल जाता था. &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;पटना कॉलेज की बात चेतकर बाबा के ज़िक्र के बगैर अधूरा ही माना जायेगा. जी, चेतकर बाबा यानी &lt;strong&gt;चेतकर&lt;/strong&gt; &lt;strong&gt;झा&lt;/strong&gt; पटना कॉलेज के प्रिंसिपल थे. वे एक बिंदास व्यक्तित्व के मालिक थे और छात्रों में काफी लोकप्रिय भी थे. धोती के ऊपर कोट पहने हुए, हाथ में छाता या छड़ी लिए, पान चबाते हुए जब वे पटना कॉलेज की मटरगश्ती करते तो एक अजीब दृश्य उपस्थित हो जाता. वे खुद किसी से न डरते थे और उनसे भी शायद ही कोई डरता था. आपको जानकर हैरत होगी कि वे राजनीतिशास्त्र के शिक्षक थे और लास्की के निर्देशन में &lt;strong&gt;लन्दन स्कूल ऑफ़ इकोनिमिक्स&lt;/strong&gt; से &lt;strong&gt;डॉक्टरेट&lt;/strong&gt; की डिग्री प्राप्त की थी. उनकी छात्रप्रियता की एक मिसाल मैं बयां करना चाहूँगा. स्नातक की परीक्षाएं चल रहीं थीं. राजनीतिशास्त्र का एक पेपर लीक से हटकर था, सो छात्रों ने उस पेपर का बहिष्कार कर दिया था. वाइस-चांसलर अडिग थे कि उस पेपर की दोबारा परीक्षा नहीं होगी. छात्र असमंजस में थे कि क्या करें, क्या न करें. लेकी जाको रखी साइयां, मार सके न कोई. सो, छात्र हार-थककर बाबा के पास पहुंचे. बाबा ने आने का कारन पूछा तो छात्रों ने बताया कि वाइस-चांसलर किसी की नहीं सुन रहा है और कह रहा है कि जिसे जो करना हो कर ले. छात्रों ने यह भी बताया कि करने के लिए तो हम उनका कुछ भी कर सकते थे, किन्तु पटना कॉलेज और आपकी आन में हम कोई बट्टा नहीं लगाना चाहते थे. बाबा खुश हुए और कह दिया कि जाओ, तयारी करो, आगे का काम मेरा है. ख़ुशी में छात्रों ने नारा लगाया, "&lt;strong&gt;राइट और रौंग, बाबा इज स्ट्रौंग'&lt;/strong&gt;. जी, ऐसे मनोहारी थे हमारे प्रिंसिपल साहब.   &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;राजनीतिक रूप से आठवें दशक की शुरुआत को संक्रमण का दौर कहा जा सकता है. पूर्ववर्ती दौर की प्रगतिशीलता अब शिथिल हो रही थी और उसकी जगह एक नई पतनशील राजनीतिक संस्कृति तेजी से अपने पाँव पसारती जा रही थी. पढ़नेवाले छात्र इस राजनीति से पूरी तरह विमुख थे और जो छात्र राजनीतिक मंचों पर चहलकदमी कर रहे थे उनका पढाई से दूर का भी कोई रिश्ता नहीं था. ऐसे में छात्र संघ का चुनाव नए राजनीतिक मुहावरों की अजीबोगरीब नुमाईश का अवसर प्रदान करता था. जातीय सभाओं का आयोजन करना सभी प्रत्याशियों के लाजिमी माना जाता था. इन्हीं जातीय सभाओं में उम्मीदवारों के चयन पर अंतिम मुहर लगाई जाती और यहीं पर तय होता कि प्रचार के दौरान क्या कुछ किया जाना है. तो आईये मैं आपको बारी-बारी से &lt;strong&gt;भूमिहार&lt;/strong&gt; और &lt;strong&gt;राजपूत &lt;/strong&gt;की सभाओं में ले चलता हूँ. &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;पटना विश्वविद्यालय का &lt;strong&gt;सीनेट हॉल&lt;/strong&gt; ऐसी जातीय सभाओं के आयोजन के लिए सबसे उपयुक्त स्थान हुआ करता था. कभी-कभी ये सभाएं किसी हॉस्टल में भी आयोजित की जाती थीं. वैसे तो जातीय सभाओं में किसी गैर-जाति के सदस्य की उपस्थिति न सिर्फ वर्जित थी, अपितु खतरनाक भी मानी जाती थी, किन्तु अगर आपका कोई भरोसेमंद दोस्त उस जाति का है तो आसानी से घपला किया जा सकता था. मैंने भी किया था- अपने खांटी भोजपुरिया दोस्त गणेश ठाकुर के साथ. गणेश ठाकुर पहले भोजपुरिया था, बाद में भूमिहार या कुछ और.  इस तरह मुझे पहली दफा एक जातीय सभा में शरीक होने का मौका मिला था. सीनेट हॉल के मंच पर भगवान परशुराम की तस्वीर राखी गयी थी. मंच पर विराजमान होनेवाले सभी नेतागण बारी-बारी से उस तस्वीर पर माल्यार्पण कर रहे थे. अब तो मुझे उन नेताओं में से ज्यादा के नाम याद नहीं हैं, लेकिन इतना ज़रूर याद है कि शम्भू सिंह (1982 के छात्र संघ चुनाव में भूमिहारों की तरफ से अध्यक्षीय उम्मीदवार थे) व अनिल शर्मा की मौजूदगी मंच की शोभा बढा रही थी. यही अनिल शर्मा आज प्रदेश में कांग्रेस के अध्यक्ष हैं. इस सभा में सभी प्रत्याशियों को अपनी उम्मीदवारी के समर्थन में तर्क प्रस्तुत करने होते थे. हर उम्मीदवार भगवान परशुराम के ऐतिहासिक कारनामों स्मरण करने के पश्चात भूमिहारों की खंडित एकता पर आंसू बहाता और संकल्प लेता कि वह अपने प्राणों की आहूति देकर भी इस धरा से एकबार फिर क्षत्रियों का समूल नाश करेगा. यह भी बताया जाता कि कैसे वह &lt;strong&gt;अपनी जाति के ठेकेदारों &lt;/strong&gt;को &lt;strong&gt;पटना विश्वविद्यालय के निर्माण कार्यों &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;में &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;शरीक कराने में सफल रहा. सभा की समाप्ति से पहले उपस्थित लोगों से अपील की गयी कि जातीय एकजूटता के संकल्प को और पुख्ता बनाने के लिए &lt;strong&gt;सब्जी बाग स्थित भगवान परशुराम के मंदिर&lt;/strong&gt; में माथा टेका जाये. मुझे पहली दफा पता चला कि सब्जी बाग में भगवान परशुराम का कोई मंदिर भी है. &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;अब चलिए &lt;strong&gt;राजपूतों की सभा&lt;/strong&gt; में. यह सभा &lt;strong&gt;विधि कॉलेज के हॉस्टल &lt;/strong&gt;में आयोजित की गयी थी. दद्दा के नाम से मशहूर अशोक सिंह इस सभा की अध्यक्षता कर रहे थे. समीर सिंह जो एक पुराने कांग्रेसी परिवार से ताल्लुक रखते थे, राजपूतों की ओर से छात्र संघ चुनाव में अध्यक्षीय उम्मीदवार थे और वे भी मंच पर विराजमान थे. लेकिन सबकी दिलचस्पी सचिव पद के उम्मीदवार सत्येन्द्र सिंह में ज्यादा दीख रही थी. कारण यह था कि पिछले दिनों बी.एन. कॉलेज में एक भूमिहार छात्र की हत्या की गयी थी और सत्येन्द्र सिंह उसके घोषित कातिल थे. वैसे तो सचिव पद के लिए दूसरे उम्मीदवार भी थे, किन्तु सत्येन्द्र सरीखा दमदार उनमें दूसरा कोई न था. समीर सिंह ने अपने भाषण की शुरुआत करते हुए राणा प्रताप को याद किया और बाद में सिलसिलेवार तरीके से बताया कि उन्हें अपनी जाति के छात्रो को कॉलेज से छात्रवृति दिलवाने में कितने पापड बेलने पड़े; &lt;strong&gt;रानीघाट से साइंस कॉलेज&lt;/strong&gt; तक जो &lt;strong&gt;सड़क&lt;/strong&gt; बनाई गयी उसका &lt;strong&gt;ठेका&lt;/strong&gt; किसी राजपूत को दिलाने में उन्हें कितना ऊंचा-नीचा करना पडा. अध्यक्ष पद के उम्मीदवारों के बोल लेने के पश्चात सचिव पद के उमीदवारों को अपनी-अपनी बात कहने का मौका मिला. अभी कोई नाम याद तो नहीं है, किन्तु इतना ज़रूर याद है कि सत्येन्द्र सिंह के अलावा सचिव पद का एक और उम्मीदवार भी था. पहले बोलने की बारी उसी की थी. उसने बोलना शुरू किया ही था कि सत्येन्द्र सिंह अचानक व्यग्र हो उठा. लोगों को अकस्मात खतरे की घंटी सुनाई पड़ने लगी. सचिव पद का दूसरा उमीदवार अचानक विनम्र हो उठा, अपनी गलती स्वीकार की और भाई सत्येन्द्र के समर्थन में तन, मन व धन से अपना योगदान देने के लिए उत्कंठित हो उठा. सभा निःशब्द हो उठी.  सत्येन्द्र ने बोलना शुरू किया. बिना किसी लाग-लपेट के उसने सभा की ओर एक सवाल उछाला. वह जानना चाहता था कि अगर सभा में उपस्थित सभी लोग असल में राजपूती बूँद हैं तो फिर मुझे बताया जाये कि मैं उस बिरादरी में कहाँ हूँ. सभा में सत्येन्द्र भैया की जिंदाबाद के नारे लगाने लगे. कहा गया कि आप से बढ़कर यहाँ कोई राजपूतों का हितैषी नहीं है. इत्ते पर भी जब सत्येन्द्र भैया को संतुष्टि नहीं हुई तो वे खड़े हो गए और लगे बोलने अपनी मातृभाषा भोजपुरी में, "&lt;/span&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;हमरा पिछला साल दुगो केस में जेल जाये के पडल, हम पूछ्तानी कि हम काहे गइलीं जेल में? हमरा बाबु के कवनो गेहूं न कटाईल रहे, ना केहू हमर माई-बहिन के बेईज्ज़त कइले रहे. हम गईल रहीं आपन भाई लोगन के ईज्ज़त बचावे खातिर. लेकिन आज एह मंच पर सब लोग एह तरह से आपन राजपूती कारनामा बतावत बा जईसे ऊ लोग ना रहित त पटना विश्वविद्यालय में ठकुररईती खत्म हो जाईत. हम पूछ्तानी कि जे लोग चुनाव लादे खातिर मुहं बईले फिरता, ऊ कबहूँ गोलियों-बन्दूक चलवले बाडन, कतहूँ बम फोडले बाडन? त भैया गोली-बन्दूक हम चलाईं, बाकि नेता कोई दोसर बने. ई कहवां के न्याय ह. हम एलान करतानी कि अबकी हमहूँ चुनाव लड़ब, जेकरा में जोर&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;em&gt;होई, ऊ सामने आई.&lt;/em&gt;'&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt; और इसी तरह की कई फब्तियां और भी सुनते रहे लोग. &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;सत्येन्द्र की बातों से असहमति तो किसी को नहीं थी, किन्तु कुछ असंतुष्ट किस्म के लोगों को आधिकारिक उम्मीदवारों के खिलाफ अपनी भंडास निकालने क मौका अवश्य मिल गया. इन्हीं में से एक थे सुनील सिंह. वे समीर सिंह के साथी थे, उन्हीं की तरह हमेशा सफ़ेद कुर्ता-पायजामा पहनते थे और नेता बनने का सपना पालते थे, इसलिए दाढी भी रखते थे. वे गुपचुप तरीके से आस लगाये बैठे थे कि इसबार उन्हें राजपूत समाज चुनाव लड़ने का मौका देगा. लेकिन किस्मत के ओछे थे, और उनकी मानें तो समीर सिंह ने ही उनका पत्ता काट दिया था.  सभा के समापन के पश्चात उनसे मिलना हुआ तो वे अनायास ही फूट पड़े. लगे, कहने  लगे, "वीरेन्द्रजी, आप ही बताइए कि जिस माली ने एक छोटे से पौधे को दिन-रात रखवाली करके धूल-धूप और आंधी से बचाया हो, वही पौधा बड़ा होकर अपनी छाया से माली को ही वंचित कर दे, तो उसे कैसा लगेगा?" मैंने फ़ौरन कहा कि यह तो बेअदबी होगी और हमारे समाज में इस बेअदबी को पसंद नहीं किया जाता. वे आश्वस्त हुए और बताने लगे कि समीर सिंह ने उनकी पीठ में छुरा कैसे भोंका है. मैंने किसी तरह उन्हें शांत किया और विशवास दिलाया कि अगली दफा उनको ज़रूर टिकट मिलेगा. पता नहीं, क्या सोचकर वे सचमुच शांत हो गए और फिर करने लगे इधर-उधर की अनेक बातें. &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;ऊपर की बातें सुनकर कोई सहज ही अनुमान लगा सकता है कि आठवें दशक का पटना कॉलेज सिर्फ लम्पटों-लुहेडों का जमघट भर था. लेकिन यह इतना छोटा सत्य होगा कि उसकी अनदेखी कर देने में कोई बड़ा गुनाह नहीं हो जायेगा. बिहार के छात्रों के लिए पटना विश्विद्यालय &lt;strong&gt;प्रतिभाओं का ऐसा महाकुंड &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;था&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt; जिसमें स्नान कर लेने भर से ही काया में कांति पैदा हो जाए. शिक्षक हों न हों, बुरे हों या अच्छे हों, कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि पढाई तो छात्र आपस में एक दूसरे की मदद कर पूरी कर लेते थे. यह अजब भले लगे, किन्तु है सच कि पटना कॉलेज में आकर कई निपट देहाती छात्र भी अंग्रेजी बोलने लगते थे या कम से कम में अंग्रेजी में पढ़ने और लिखने लगते थे. हॉस्टल के छात्र आपस में जिन मुद्दों पर बातचीत करते, उनमें तर्क और अनुभव की ऊष्मा मौजूद रहती. जो छात्र देखने में निहायत ही लम्पट जान पड़ते, वे भी गज़ब के सृजनशील होते. मेरा तो मानना है कि लम्पटई (गूंदागर्दी नहीं) के लिए जितनी बुद्धिमत्ता और परिहास बुद्धि की ज़रुरत होती है, उतनी किसी कक्षा में अव्वल आने के लिए भी नहीं होती. पटना कॉलेज के ज़्यादातर लम्पट सृजनशील प्रकृति के थे. यह अलग बात है कि उनकी प्रतिभा के प्रस्फूटन के लिए वहां कोई मुक्कमल रास्ता नहीं था. मैंने महसूस किया है कि अगर उनमें अपने लिए थोडा और प्यार होता, थोडा और अनुशासन होता तो उनमें से कई आज साहित्य और फिल्म की दुनिया में अपना नाम रौशन कर रहे होते.    &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;आज जब पलटकर देखता हूँ तो भी पटना कॉलेज के बारे में मुझे कुछ भी बुरा नहीं लगता है. एक अजीब मोहकार्षण आज भी दिल पर तारी हो जाता है. हॉस्टल में पंडीजी के मेस में जो खाना पकता था, उसे देखकर भले ही किसी अज़नबी को वितृष्णा हो जाये, किन्तु हमें वह ज्यादा कुछ बुरा नहीं लगता था. मज़े की बात देखिये कि आरा में पढ़नेवाले मेरे मित्र जब कभी पटना आते तो इसी खाने को देखकर लार टपकाने लगते और हमें एहसास करा जाते कि हम नाहक ही अपनी नियति का रोना रोते रहते हैं. बात बात में वे अपने पंडीजी को गालियाँ देते कि इतना पैसा लेकर भी वह हमें गर्मी भर 'ललका साग' और रोटी खिलाता है. सच ही, पटना कॉलेज अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद हम सबके लिए एक मोहक और रमणीक स्थल था जहाँ जीवन का हर रंग अपनी बेबाकी में मौलिक और मोहक प्रतीत होता था. मुझे पटना कॉलेज से मोह है और इसीलिए हमेशा दुआ करता रहता हूँ कि कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;वीरेन्द्र      &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-4383672633240391276?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/4383672633240391276/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=4383672633240391276' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/4383672633240391276'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/4383672633240391276'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/05/9.html' title='उन दिनों कैसा था पटना कॉलेज ! बिहार विमर्श -9'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-70438031806814575</id><published>2009-05-01T20:55:00.000-07:00</published><updated>2009-05-01T21:21:38.752-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पटना कॉलेज'/><title type='text'>बिहार विमर्श - 8 : पटना कॉलेज की यादें  II</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;आलेख - वीरेन्द्र &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;मैं पहले ही बता चूका हूँ कि पटना कॉलेज में मेरा कैसा भव्य (या कह लीजिये धमाकेदार) प्रवेश हुआ था. आज भी मैं तय नहीं कर पाता कि इस प्रवेश प्रकरण को '&lt;strong&gt;प्रथम ग्रासे, मच्चिको पातः&lt;/strong&gt;' के रूप में याद करुँ या &lt;/span&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;'&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;बिल्ली के भाग्य से छीकें के टूटन&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;े'&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;के रूप में.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;शुरू के दिनों में &lt;strong&gt;पटना शहर&lt;/strong&gt; को ज्यादा से ज्यादा देखने (माफ कीजियेगा, समझने की नहीं) की तमन्ना दिलोंजान पर इस तरह तारी रही कि अपने साथ कौन, क्यों, कैसे और क्या कर रहा है सोच ही नहीं पाया. जो भी हो, इसका एक फायदा यह हुआ कि मैं फोकट में, किन्तु बिना सवारी के नहीं, पूरे शहर को रौंदने में सफल हो गया. यहाँ फोकट का अर्थ बताना ज़रूरी है. तब हम सवारी के रूप में  &lt;strong&gt;यूनिवर्सिटी बस&lt;/strong&gt; का इस्तेमाल करते थे. इसके दो तात्कालिक फायदे थे. एक, यह विशवास पुख्ता होता था कि फोकटिया अर्थ-व्यवस्था के वारिस अकेले सिपाही नहीं होते, छात्र भी होते हैं अथवा हो सकते हैं. जब कभी कंडक्टर किसी छात्र से टिकट मांगता तो हम उसे बेवकूफ कह देते या फिर पूछ बैठते कि कहीं तुम्हारा दिमाग तो नहीं ख़राब हो गया? ऐसी बात सुनकर वह सिर्फ मुस्करा देता, कहता कुछ नहीं. सिपाही की तरह पटना के छात्र भी सौदा-बाज़ार करते समय अपने हिसाब से दाम में कटौती कर लेते.  दूसरा सबसे बड़ा फयदा यह था कि पटना के नामी-गिरामी मोहल्लों की नफीस लड़कियों को देखने और मर्यादा-अमर्यादा के बीच की भाषा में उनसे कुछ चुहल करने की गुंजाईश बन जाती. लड़कियाँ भी क्या छुई-मुई, इत्ता कुछ सुनने के बाद भी चूं नहीं करतीं. गोया, ईश्वर ने उन्हें ज़बान ही नहीं दी. इस यायावरी में तकरीबन दो महीने बीत गए.  &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;समय आ गया था कि मैं गोपाल बाबु को उनके वायदे का स्मरण कराऊं. मेरी तबियत &lt;/span&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;न्यू हॉस्टल&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt; से उचटने लगी थी. रह रह कर मुझे आभास होता कि मैं जो कर पा रहा हूँ, वह नाकाफी है; कि अगर और देर हुई तो उस कीचड से निकलना मेरे लिए असंभव हो जायेगा. मैंने एक आवेदन-पत्र लिखा और उसे लेकर सीधे गोपाल बाबु के सरकारी मकान में दाखिल हो गया.  गोपाल बाबु मुझे निजी तौर पर जानते थे क्योंकि &lt;strong&gt;छपरा&lt;/strong&gt; से पटना आते वक़्त मैं &lt;strong&gt;राजेंद्र कॉलेज&lt;/strong&gt; में कार्यरत उनके मित्र वेदा बाबु की सिफारिशी चिट्ठी लेकर आया था.  उन्होनें तुरत मेरी बात मान ली और मैं &lt;/span&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;मिन्टो हॉस्टल&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt; में आ गया. लेकिन आने से पहले घटी एक बात का ज़िक्र मैं यहाँ करना चाहूँगा. गोपाल बाबु ने बताया कि वैसे तो मेरे अंक मेरे बैच के दूसरे सभी छात्रों से अधिक हैं, किन्तु कतिपय समाजशास्त्रीय कारणों से वे मुझे हॉस्टल का प्रीफेक्ट नहीं बनायेंगे. प्रीफेक्ट बनने में मेरी कोई रूचि नहीं थी, इसलिए मैंने  कोई प्रतिवाद नहीं किया. बाद में मंडली के साथियों ने बताया कि गोपाल बाबु माहिर राजनीतिज्ञ हैं और भूमिहार हैं. वे कभी भी किसी गैर-भूमिहार को प्रीफेक्ट नहीं बनने देंगे. &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;साथियों का मानना था कि यह घटना राजपूती सम्मान को चोट पहुंचानेवाली है अतः इसका पुरजोर विरोध किया जाना चाहिए. लेकिन मेरी प्रत्यक्ष अरुचि की वज़ह से मामले को ज्यादा तूल नहीं दिया जा सका. बात आयी गयी हो गयी. यहाँ साफ कर दूं कि गोपाल बाबु के बारे में गैर-भूमिहार छात्रों की राय न केवल तथ्य से परे थी, अपितु उनके अपने जातीय पूर्वाग्रह को भी व्यंजित करती थी. सच तो यह है कि मैं गोपाल बाबु की समाजशास्त्रीय समझ का सबसे बड़ा मुरीद था. बानगी के तौर पर मैं यहाँ एक घटना का ज़िक्र करना चाहूँगा. मिन्टो हॉस्टल में दाखिला लेने के दो-चार दिनों बाद मैं न्यू हॉस्टल से स्थान्तरित होनेवाला था. मुझे अबतक पता न था कि मुझे मिन्टो हॉस्टल में कौन-सा कमरा आवंटित हुआ है. मैं गोपाल बाबु के घर फिर हाज़िर हुआ. वे समझ गए, बैठने का इशारा किया और खुद मेरे सामने आकर बैठ गए. उन्होनें बताया, " जो कमरा मैंने आपके लिए अनुकूल माना है, उसमें पहले से तीन छात्र रहते हैं - एक भूमिहार, एक यादव और एक दलित. आप चौथे होंगे और ठाकुर हैं. इस तरह कमरे में जातीय संतुलन बना रहेगा और कोई भी जाति के आधार पर उन्मादी बयान देने अथवा बहसबाजी करने से स्वभावतः गुरेज़ करेगा'. उनकी यह बात बाद के दिनों में सोलहों आने सच साबित हुई.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;लेकिन, दुर्भाग्य ने यहाँ भी मेरा पीछा नहीं छोडा. जिसका डर था, बेदर्दी वही बात हो गई. पलक झपकते ही मैं मिन्टो हॉस्टल में राजपूतों का नेता मान लिया गया.  पटना कॉलेज परिसर में तीन हॉस्टल थे - &lt;/span&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;जैक्सन हॉस्टल,&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt; &lt;strong&gt;मिन्टो हॉस्टल&lt;/strong&gt; और &lt;strong&gt;न्यू हॉस्टल&lt;/strong&gt;. मैं तीनों होस्टलों के मामले में नेता मान लिया गया था. उस समय पटना की शैक्षणिक संस्थाओं में जैसा माहौल था, उसमें इस बातकी  सदैवसंभावना बनी रहती थी कि कहीं किसी यादव-कुर्मी अथवा भूमिहार-राजपूत में भिडंत हो जाये. राजपूत से सम्बंधित झगडों में मुझे अक्सर पंच मान लिया जाता और मैं राजपूत और भूमिहार दोनों के लिए विशेष पदवी का हक़दार हो जाता. मुझे आज यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं है कि अपनी प्रत्यक्ष अरुचि के बावजूद ऐसी पंचायती करने में मुझे  एक अजीब-सा शिशुवत शुकून मिलता था. &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;दरअसल, मेरे लिए यह एक ऐसा सौदा था जिसमें लाभ ही लाभ था यानी 'हर्रे लगे न फिटकिरी, रंग चोखा होए'. वह तो बाद में पता चला कि इस सौदे में सिर्फ लाभ ही लाभ नहीं, नुकसान भी थे. अपने नुकसान की बात तो फिर कभी बाद में बताऊंगा, लाभ कि अभी बताये देता हूँ. पहला और सबसे बड़ा लाभ तो यह था कि मुझे दुनिया के तमाम मुदों पर अपनी दृष्टि साफ करने के लिए लगभग मुर्ख, किन्तु परोपकारी और कर्तव्यपरायण श्रोता समूह मिल जाता था. सच कहूं तो इस फायदे के बारे में भी मेरा अनुमान बिल्कूल नया है. सोचने पर लगता है कि इस फायदे का भान मुझे भले अब हुआ हो, लेकिन यह फायदा मुझे फायदा पहले ही पहुंचा चूका था. आज अगर मैं किसी मुद्दे पर पढ़े-ज्यादा पढ़े लोगों के बीच कुछ कहने में घबराता नहीं हूँ तो इसीलिए कि इस कला का अभ्यास करने का मौका मुझे युद्ध-भूमि में मिला था. सचमुच, पटना कॉलेज के उस कुनाबाई मित्र-मंडली के साथ जीना युद्ध भूमि में जीने जैसा था. &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;दिन के चौबीस घंटे और उनके जीवन में एक भी घंटा ऐसा नहीं जिसमें वे जीवन, जगत, करम-धरम या किसी और चीज के बारे में सोचते हों. उनपर हमेशा एक ही नशा तारी रहता " कैसे आनंद मनाएं, कैसे मज़ा लें और क्या करें कि बस बल्ले...बल्ले....नित्य-क्रिया निवृति के पश्चात वे जलेबा खाने &lt;strong&gt;रमना रोड&lt;/strong&gt; के मुहाने पर स्थित हलवाई की दूकान पर जाते, वहीं खड़े-खड़े दो-तीन कप चाय पीते और सबसे अंत में आठ - साढे आठ बजे पान चबाते हुए हॉस्टल में   लौट आते.  फिर नहाते, खाते और 9:20  की  आनर्स   क्लास  अटेंड  करने कॉलेज पहुँच जाते. उनकी दिनचर्या  खत्म होती 11 और साढे ग्यारह बजे रात में जब  वे मेस में खाना खाकर सोने के लिए अपने कमरे में वापस आते. लेकिन बता दूं कि मंडली के सभी मित्र इस साधना में बराबर निपुण नहीं थे और न ही सबमें इस रूटीन के प्रति बराबर की दिलचस्पी थी.  तो क्या यह मंडली एकजूट नहीं थी? बिल्कुल थी, तथापि मंडली के प्रत्येक सदस्य को यह अधिकार था कि वह मंडली के इत्तर भी अपनी रूचि और सामर्थ्य के हिसाब से रिश्ते बना ले. इस लोकतान्त्रिक संस्कृति का असर यह हुआ कि सब साथ-साथ रहते हुए भी अलग-अलग समय पर अलग-अलग समूह में शामिल हो लेते थे. कुछ धूर सदस्यों की बात छोड़ दी जाये तो प्रत्येक सदस्य की एक अलग मंडली भी हुआ करती थी. सच तो यह है कि मंडली की एकजूटता खास कामों में ही दीखती थी. ये खास काम थे - बिना नागा हुए रोज़ शाम में करीब 5-6 बजे &lt;strong&gt;पटना मार्केट&lt;/strong&gt; जाना, साप्ताहिक आधार पर सामूहिक रूप से फिल्म देखने जाना, सुबह-शाम &lt;/span&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;गणेशदत्त हॉस्टल&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt; के चक्कर लगाना और लगभग धार्मिक अनुष्ठान की तरह रोज़ कम से कम एक घंटे के लिए न्यू हॉस्टल के पिछवाडे की दीवार पर बेअदबी का सामूहिक अभ्यास करना. इनके अलावा सबकी अलग पहचान थी, सबके अलग मक़सद थे. मंडली में एक-दूसरे को नसीहत देने की सख्त मनाही थी. सिर्फ संकट ही सामूहिक मानी गयी थी, बाकी सबकुछ निजी. कोई पढ़े, न पढ़े अपनी बला से.  &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;मिन्टो हॉस्टल में आना मेरे लिए वास्तव में वरदान साबित हुआ. मेरी मंडली के ज़्यादातर सदस्य मिन्टो हॉस्टल में आने से कतराते थे, क्योंकि वे मानते थे कि इस हॉस्टल में रहनेवाले छात्र मर्दानगी के मामले में थोड़े कमज़ोर होते हैं. लेकिन सच यह है कि वे कतराते नहीं, घबराते थे कि कहीं कोई पढाई-लिखाई की बात न छेड़ दे. खुदा न खास्ता अगर गोपाल बाबु मिल गए तो बेडा गर्क ही मानिए. नसीहत देना उनका शौक भी था और पेशा भी. उनके बारे में कोई कुछ भी कहे, वे वही कहते थे जो उनको किसी छात्र के लिए बेहतर लगता. खैर, मिन्टो हॉस्टल में आकर नए-नए लोगों से मेरे नए-नए रिश्ते बने. यहीं आकर मुझे क्रांतिकारी रुझान के  मार्क्सवादियों से मिलने का मौका मिला और यहीं आकर मेरी छवि लोफर के बजाय एक मेधावी छात्र की बनी. हॉस्टल के वरिष्ठ अन्तेवासी भी मुझे तवज्जो देते क्योंकि मैं अपने बिंदास अंदाज़ और हंसोड़ प्रकृति की वज़ह से हमेशा सामूहिक चर्चा का केंद्र बना रहता था. मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि अन्तेवासियों के बीच जाति के आधार पर कोई ख़ास खेमाबन्दी थी. दरअसल, जाति के सवाल को वही छात्र ज्यादा प्रचारित-प्रसारित करते थे जिनका छात्र के रूप में कोई खास वजूद नहीं होता था. मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि जो छात्र अपनी-अपनी जाति के नेता थे या बिना होते हुए मेरी तरह मान लिए गए थे, वे वास्तव में उम्दा इंसान थे. उनमें मेरे कई ऐसे दोस्त थे जो अपनी इस नियति पर कल भी हंसते थे और आज भी हंसते हैं. &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;(अगले अंकों में मैं आपको हॉस्टल से निकालकर पटना कॉलेज और उसके आस-पास के मुख्य सरकारों से परिचित करवाने की कोशिश करूंगा. तबतक के लिए धीरज रखिये,)&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;वीरेन्द्र&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt; &lt;br /&gt;    &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-70438031806814575?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/70438031806814575/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=70438031806814575' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/70438031806814575'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/70438031806814575'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/05/8-ii.html' title='बिहार विमर्श - 8 : पटना कॉलेज की यादें  II'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-6727282072281510568</id><published>2009-04-27T19:50:00.000-07:00</published><updated>2009-04-27T20:16:08.782-07:00</updated><title type='text'>बिहार विमर्श - 7 : अथ स्कूल कथा : उडी जहाज को पंछी फिर जहाज पै आवै</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;उडी जहाज को पंछी, फिर जहाज पै आवै &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;आलेख - वीरेन्द्र &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;'अथ स्कूल कथा' के नाम से जो संस्मरण लेकर मैं आपके सामने उपस्थित हुआ था, वह खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है. प्राईमरी स्कूल के बारे में तो जैसे-तैसे बात पूरी हो गयी है, किन्तु हाई स्कूल की चर्चा में अभी भी बहुत कुछ बाकी है. दरअसल, आरा का हरप्रसाद दास जैन स्कूल मेरे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ था जिसकी चर्चा किये बगैर मेरे लिए यह बताना संभव नहीं हो पायेगा कि स्कूल हमारे जीवन में इतने महत्वपूर्ण क्यों माने गए हैं. &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;सन् 1974 में &lt;strong&gt;राष्ट्रीय ग्रामीण छात्रवृति प्रतियोगिता&lt;/strong&gt; में  जैसे ही मेरा चयन हुआ, वैसे ही यह तय हो गया कि अब हाई स्कूल की पढाई के लिए मुझे अपना गाँव छोड़ना होगा. वैसे तो इस प्रतियोगिता का सफल छात्र जिले की तीन चयनित स्कूलों में से किसी भी स्कूल में दाखिला ले सकता था, किन्तु &lt;strong&gt;जैन स्कूल &lt;/strong&gt;की बात ही कुछ और थी. इस स्कूल में पिछले 5 वर्षों में किसी भी छात्र को द्वितीय श्रेणी नहीं मिली थी और न ही कोई बोर्ड की परीक्षा में असफल हुआ था. यानी, सफलता का महाकुंड. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;स्कूल के बारे इतना जानना ही काफी था, इसलिए बिना विलंब किये मैं अपने बड़े भाई के साथ आरा के जैन स्कूल में दाखिला लेने आरा आ गया. बड़ा भाई तब &lt;strong&gt;पटना कॉलेज&lt;/strong&gt; में  पढ़ते थे  और सामान्य छात्रों की तुलना में ज्यादा स्मार्ट दिखते थे .  गाँव से चला तो मन में एक अजीब उत्साह था, किन्तु दाखिला लेते ही उत्साह की जगह निराशा ने मन में डेरा ड़ाल दिया. दाखिले के बाद बड़ा भाई पटना लौट गया और मैं स्कूल के हॉस्टल में. चूंकि यह मेरा पहला दिन था, इसलिए मुझे स्कूल के क्लासेज़ अटेंड नहीं करने पड़े. उल्टे, प्राचार्य ने एक चपरासी के साथ मुझे हॉस्टल में भेज दिया. वार्डेन थे रमाकांत जी - हिंदी के मर्मज्ञ विद्वान् और अनुशासन के पक्के. एक बही पर मेरा नाम लिखने के बाद उनने कहा कि कल से मुझे भी सही समय पर स्कूल जाना होगा; कि आज मुझे एक बीमार अन्तेवासी के साथ दिन भर हॉस्टल में ही रहना होगा. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;न तो मैंने अबतक इतना बड़ा स्कूल देखा था और न ही हॉस्टल जैसा सुन्दर भवन. हमारा हॉस्टल आरा के ऐतिहासिक रमना मैदान के दक्षिण-पूर्वी कोने पर, शहीद भवन के ठीक सामने बना था. यह आरा के किसी पुराने रईस की हवेली थी जिसे स्कूल ने किराये पर उठा लिया था. यूं तो किसी शहर में यह मेरा पहला दिन था, किन्तु मुझे वहां कुछ भी आकर्षक नहीं लग रहा था.  मन में कई-कई तरह के ख़याल उमड़-घूमड़ रहे थे. गाँव-घर, साथी-संगी, घर-परिवार को याद करके मन दुखी हो रहा था. आँखों से बरबस आंसू निकले पड़ते थे. कि तभी दोपहर के दो बजे, और मैं हॉस्टल की खिड़की से बाहर देखने लगा. अचानक मुखे शहीद भवन के परिसर में योगीन्द्र बस खड़ी  दीखी. यानी, डूबते को तिनके का सहारा. यह बस शाम  में आरा से सन्देश जाती थी और सुबह में सन्देश से आरा आती थी. मैंने फ़ौरन फैसला कर लिया कि चार बजने से पहले मैं हॉस्टल से भागकर बस में सवार  हो जाऊंगा. भाई पटना वापस लौट गए थे और गाँव में मां के अलावा कोई पूछताछ करनेवाला भी नहीं था. यानी, खुद ही भयो कोतवाल, अब डर काहे का. इधर तीन सवा तीन बजे का समय हुआ और उधर मैं अपनी गठरी लेकर फुर्र. जा पहुंचा योगीन्द्र बस में.  विजय जो उस बस का  कंडक्टर हुआ करता था, वह मेरे गाँव के सभी लोगों को जानता था. मैंने खतरा महसूस किया कि हो न हो यह आदमी मेरे किये-कराये पर पानी फेर देगा. मैं उससे तबतक आंखमिचौली करता रहा जबतक बस ने खुलने से पहले की अंतिम सिटी नहीं बजा दी. फिर बड़े इत्मीनान से पीछे की एक सीट पर जा बैठा और शाम होते-होते अपने गाँव अह्पुरा पहुँच गया. &lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;मां ने इतनी जल्दी लौट आने का कारण पूछा तो मैंने कह दिया कि स्कूल एक हफ्ते के लिए बंद हो गया है. यह एक हफ्ता बढ़ते-बढ़ते कब और कैसे पांच महीने के बराबर हो गया, पता ही नहीं चला. स्कूल से गायब हुए मुझे अब पांच महीने हो गए थे. छमाही परीक्षा की तिथियाँ घोषित हुईं और एक दिन स्कूल का वही चपरासी जो मुझे स्कूल से हॉस्टल लेकर आया था, प्राचार्य का सम्मन-पत्र लिए मेरे गाँव आ धमका. उसका नाम रामपुकार था और वह शरीर से काफी कट्ठा -कट्ठा भी था. उसने मां को सबकुछ बता दिया. जीवन में शायद पहली दफा मां से मुझे तभी डांट खानी पड़ी थी. इस तरह मैं एकबार फिर उसी जहाज पर आ गया जिसे छोड़कर फुर्र हुआ था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;छमाही की परीक्षाएं एक हफ्ते बाद होनी थीं और मेरे पास अभीतक सभी किताबें भी नहीं थी. मन एक अजीब अपराध-बोध से पीड़ित था. डर लगने लगा कि कहीं परीक्षा में फेल न हो जाऊं. समय इतना कम था कि चाहकर भी सभी विषयों की तैयारी संभव नहीं थी. गणित, रसायनशास्त्र और भौतिकी की किताबें कहीं से भी पल्ले नहीं पड़ रही थीं. यानी करिया अच्छर भैंस बराबर. लेकिन अब उपाय ही क्या था? परीक्षाएं शुरू हुईं और जैसे-तैसे मैंने भी उसमें अपनी उपस्थिति दर्ज करा ली. जो परिणाम निकला, वह चौंकानेवाला नहीं था, अपितु डरानेवाला था. विज्ञान और गणित में इतने कम अंक आये थे कि मैं उसे किसी भी सूरत में अपनेभाईअथवा पिताजी को नहीं दिखा सकता था. अब बता दूं कि इन विषयों में मेरे अंक वितरण कैसे थे. गणित के प्रथम पत्र जिसमें सिर्फ अंकगणित के प्रश्न होते थे, मैं खींच-खांचकर 100 में से 30 अंक प्राप्त करने में सफल हो गया. लेकिन, ऊच्च गणित, रसायनशास्त्र और भौतिकी में शून्य से ही संतोष करना पड़ा. वर्ग शिक्षक ने मेरी प्रगति रिपोर्ट पर टिपण्णी जड़ दी थी कि मैं विज्ञान की पढाई नहीं कर सकता; कि अगले वर्ष मुझे कला संकाय में ही पढ़ना होगा. सिर्फ ईश्वर जानता है कि मैं उस दिन कितना रोया था. रात भर नींद नहीं आयी, रात भर यही सोचता रहा कि अब मां, पिताजी, भाई तथा संगी-साथियों को अपना मुहं कैसे दिखाऊंगा.  इलाके में शोर था कि पहलवान साहब का यह बेटा एक दिन जरूर उनका नाम रौशन करेगा. लेकिन, होनी को कौन टाल सकता है! खैर, मैंने उनकी नाक नहीं कटने दी और बाएँ हाथ से प्रगति रिपोर्ट पर पिताजी का नाम लिखकर स्कूल में जमा कर दिया. रिजल्ट देखकर मन इतना दुखी था कि किसी से बात करने की भी ईच्छा नहीं हो रही थी. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;स्कूल की छुट्टी हुई और मैं अपने बेड पर आकर निढाल हो गया. मेरे बेड से सटा हुआ बेड जिस लडके का था, उसका नाम अनुग्रह था. उसके व्यक्तित्व में एक अजब तरह की रवानी थी. उसके कपडे-लत्ते देखकर सहज अनुमान लगाया जा सकता था कि वह गुदरी का लाल है. पूरे हॉस्टल में वह एकमात्र ऐसा छात्र था जिसे किसी ने कभी उदास नहीं देखा. उसमें  हंसने-हँसाने की अद्भूत काबिलियत थी. लेकिन जो चीज उसके व्यक्तित्व को ईश्वरीय आभा प्रदान करती थी, वह थी उसकी संवेदनशीलता. उसने ताड़ लिया कि मैं बहुत दुखी हूँ; कि मुझे एक अदद साथी की ज़रुरत है. उसने चुहल भरे अंदाज़ में पूछा, "&lt;strong&gt;क्या हुआ? किसी ने तुम्हारी पिटाई तो नहीं कर दी?&lt;/strong&gt; &lt;strong&gt;चलो, साले&lt;/strong&gt; &lt;strong&gt;की अभी और यहीं ऐसी-तैसी कर दूं&lt;/strong&gt;." &lt;strong&gt;उसकी बातें मुझे इतनी बचकानी लगीं कि मैं अनायास हंस पड़ा. वह&lt;/strong&gt; &lt;/span&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;भी खिलखिलाने लगा.&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt; बिना देर किये मैं पूछ बैठा कि क्या मैं सचमुच विज्ञान नहीं पढ़ सकता? उसके होंठों पर एक स्मित मुस्कान खिल उठी. उसकी इस निर्मल हंसी ने मेरे मन की पीडा हर ली. ढांढस बंधाते हुए उसने सहज लहजे में कहा, "तुम्हें ऐसा क्यों लगता है? विज्ञान पढ़ने से ज्यादा आसान  कोई चीज नहीं होती. अबतक जितनी पढाई हो चुकी है, उसे मैं तुम्हें एक हफ्ते में पढा दूंगा." अचानक मेरा मन भी निर्मल हो गया. मैंने मन ही मन ठान लिया की अब पढूंगा तो विज्ञान ही, वरना कुछ नहीं. शुरुआत हुई उच्च गणित से. अनुग्रह ने मुझे दो अध्याय पढाया. मुझे लगने लगा कि गणित कोई मुश्किल काम नहीं है. वास्तव में मैं इतना उत्प्रेरित हो गया कि रात में सोने के बजे मैं उच्च गणित के सवाल हल करने लगा. सुबह चार बजे तक मैं पूरी किताब ख़त्म हो गयी. इसी तरह मैंने रसायनशास्त्र, भौतिकी और अंकगणित किताबें भी हल कर डाली. नतीजा चौंकानेवाला साबित हुआ. सालाना इम्तहान में मुझे गणित सहित विज्ञान के सभी विषयों में अव्वल अंक मिले और मैं अपनी कक्षा में द्वितीय स्थान प्राप्त कर सका. इतना आत्मविश्वास मेरे जीवन में दुबारा कभी नहीं आया. धन्य है वह मित्र और धन्य वह स्कूल! सोचता हूँ कि अगर रामपुकार मुझे गाँव से पकड़कर दुबारा स्कूल में नहीं लाया होता और स्कूल में अनुग्रह जैसा दोस्त न मिला होता तो मैं क्या होता? &lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;आज जब पलटकर पीछे के जीवन को याद करता हूँ तो लगता है कि &lt;strong&gt;अनुग्रह&lt;/strong&gt; सिर्फ मेरी सहायता के लिए जैन स्कूल आरा में आया था. वह मेधावी था, किन्तु अत्यंत गरीब भी था. नवीं कक्षा में उसकी शादी हुई. हॉस्टल के दोस्तों में मैं अकेला था जो उसकी शादी में शरीक हुआ था. &lt;strong&gt;बनाही स्टेशन&lt;/strong&gt; से करीब तीन मील पश्चिम उसका गाँव था. वह जाति का कुम्हार था और उसके पिता गाँव के दूसरे खेतिहर किसान की बनिहारी करते थे. मुझे आज भी वह दृश्य याद है जब मैं अनुग्रह के साथ उसके गाँव पहुंचा था. उसके पिता ने खड़े होकर मेरी आवभगत की थी और अपनी बेटी को सख्त हिदायत दी थी कि मेरे लिए अलग से स्वादिष्ट खाना पकाए. मैं इस स्वागत से विभोर था. मैंने पूरी विनम्रता से उनके इस आदेश को नामंजूर कर दिया और जिद्द कर बैठा कि मैं भी वही खाऊँगा जो सभी खायेंगे. शादी का घर और भोजन के रूप में सत्तू का आहार! सच ही, गरीबी क्या जाने कि उत्सव! अब मैं पक्के यकीन के साथ कह सकता हूँ कि कृष्ण को विदूर की साग-रोटी क्यों अच्छी लगती होगी. स्कूल की पढाई तो अनुग्रह ने जैसे-तैसे पूरी कर ली, किन्तु गरीबी ने उसे कॉलेज की पढाई नहीं करने दी. प्रथम श्रेणी में मैट्रिक  की परीक्षा उतीर्ण की थी उसने और उसे अंक भी अच्चे भले मिले थे. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;बाद में पता चला कि वह &lt;strong&gt;एयर फोर्स में सिपाही&lt;/strong&gt; हो गया है. स्कूल छोड़ने के बाद सिर्फ एकबार ही मैं उससे मिल सका. वह भी आरा स्टेशन पर. मैंने जिद्द कर डाली और उसके साथ तीन दिनों के लिए उसके गाँव पहुँच गया. तबतक उसके घर की गरीबी ढह &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;चुकी थी और घर में नए जीवन का संचार हो चूका था. उसकी पत्नी रमावती एक कुशल गृहणी के रूप में उसके दो बच्चों (एक बेटा, एक बेटी) की बड़े अच्छे ढंग से परवरिश कर रही थी और पिता ने बनिहारी छोड़कर गाँव में ही नून-तेल की दूकान खोल ली थी. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;काश, कभी फिर मिलना हो उससे!&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;strong&gt;यह कृष्ण-सुदामा की दोस्ती नहीं थी, बल्कि दो सुदामाओं की दोस्ती थी.&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;strong&gt;खुदा उसे और उसकी निर्मल हंसी को सलामत रखे. &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;('अथ स्कूल कथा' की अगली तीन कडियाँ क्रमशः मित्र कौशल के सिपुर्द की जाएँगी  वे उन्हें अपने ब्लॉग पर बिठाते रहेंगे. तबतक के लिए खुदा हाफिज़.) &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;वीरेन्द्र &lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-6727282072281510568?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/6727282072281510568/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=6727282072281510568' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/6727282072281510568'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/6727282072281510568'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/04/7.html' title='बिहार विमर्श - 7 : अथ स्कूल कथा : उडी जहाज को पंछी फिर जहाज पै आवै'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-6232340828458743894</id><published>2009-04-25T09:37:00.000-07:00</published><updated>2009-04-25T09:56:19.995-07:00</updated><title type='text'>बिहार विमर्श : 6 : पटना कॉलेज के शुरूआती अनुभव</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;वीरेन्द्र पटना कॉलेज में दाखिले के बाद के शुरूआती  अनुभव बता रहें हैं .पढें और इस विमर्श को आगे बढायें. &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;'&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;अथ स्कूल कथा'&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt; से आगे की दास्तां पहले &lt;strong&gt;छपरा&lt;/strong&gt; और बाद में &lt;strong&gt;पटना&lt;/strong&gt; में शुरू हुई. स्कूल की पढाई पूरी करने के बाद मैं पहले छपरा गया जहाँ के नामी-गिरामी &lt;strong&gt;राजेंद्र कॉलेज&lt;/strong&gt; में मेरे बड़े भाई की नियुक्ति व्याख्याता के पद पर हुई थी. आर्थिक तंगी और पारिवारिक खर्चे में क़तर-ब्योंत की मजबूरी ही मुझे छपरा ले आई थी, वरना ईच्छा तो मेरी शुरू से ही &lt;strong&gt;पटना के साइंस&lt;/strong&gt; अथवा &lt;strong&gt;पटना कॉलेज &lt;/strong&gt;में पढ़ने की थी. खैर, छपरा कई कारणों से मेरी रूचि का केंद्र नहीं बन सका और इसीलिए वहां के अनुभवों का न तो मेरे पास कोई मुकम्मल फेहरिस्त है और न ही कोई ऐसी मिसाल जिसका ज़िक्र करना मुझे लाजिमी लगे. जैसे-तैसे करके दो साल गुज़र गए और मैं विज्ञानं में इंटर की डिग्री हासिल करने में सफल हो गया. अलबत्ता, इन दो सालों में मेरा कायाकल्प हो गया था. स्कूल में मैं विज्ञान का एक मेधावी छात्र हुआ करता था, किन्तु छपरा प्रवास के दौरान यही मेधा सबसे ज्यादा कुन्द हुई. अब मैं चाहकर भी इंजिनियर बनने का ख्वाब नहीं पाल सकता था.  ले-देकर मेरे सामने एक ही विकल्प रह गया था कि किसी तरह पटना कॉलेज में नामांकन लूं और प्रशासनिक सेवा में जाने की भरपूर कोशिश करुँ.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;और इस तरह मैं सन् &lt;strong&gt;१९८१&lt;/strong&gt; में &lt;/span&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;समाजशास्त&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;्र&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt; के छात्र के रूप में पटना के &lt;strong&gt;पटना कॉलेज &lt;/strong&gt;में दाखिल हो गया. बता दूं की पटना कॉलेज मेरे लिए कतई अजाना नहीं था. मेरे बड़े भाई इसी कॉलेज से राजनीतिशास्त्र में सन् १९७८ में ही स्नातक हो चुके थे. इसके अलावा, भैया के कई दोस्तों के छोटे भाई भी तबतक पटना कॉलेज में दाखिला ले चुके थे. गरज फ़क़त इतनी है कि पटना कॉलेज में आते ही मुझे विरासत के रूप में पूरा का पूरा कुनबा हासिल हो गया था. चूंकि मसाला कुनबे का था, इसलिए उसमें किसी गैर-जातीय की उपस्थिति लगभग गायब थी. अलबत्ता, एक-दो ऐसे परिचित भी थे जो मेरी जाति  के नहीं थे. खैर, इस मंडली के निर्माण में मेरी कोई भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भागीदारी नहीं थी और इसीलिए मुझे न तो उसका मलाल था, न ही फक्र. मेरे लिए उनके लिए, सबके लिए ऐसी मित्र-मंडलियाँ प्रकारांतर से सुरक्षा कवच मुहय्या कराने का भ्रम पैदा कराती थीं.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;अजब न होगा अगर कहूं कि पटना कॉलेज मेरे लिए अपने टूटे-अधटूटे सपनों को फिर से जोड़ने का एक अदद मुकाम बनकर आया था. सुनते आया था कि पटना कॉलेज से स्नात्तक की डिग्री कोई मामूली चीज़ नहीं होती, क्योंकि यह कॉलेज बिहार का ऑक्सफोर्ड माना जाता था.   कॉलेज में दाखिला लेने के साथ ही छात्रावास में कमरा पाने की ललक और ज़रुरत सामने आन पड़ी. इंटर में मुझे जितने अंक मिले थे, उसके आधार पर मुझे आसानी से &lt;strong&gt;जैक्सन&lt;/strong&gt; अथवा &lt;strong&gt;मिन्टो हॉस्ट&lt;/strong&gt;ल मिल जाता, किन्तु ऐसा हो न सका. मिन्टो हॉस्टल के वार्डेन गोपाल बाबु ने सुझाया कि पहले मैं न्यू हॉस्टल में दाखिला ले लूं; फिर एक-दो महीने बाद वे मिन्टो हॉस्टल में मेरी भर्ती कर लेंगे. न्यू हॉस्टल तबतक बैकवर्ड -फारवर्ड संघर्ष का केंद्र बन चूका था. वहां रहनेवाले छात्र पढाई के लिए कम और लडाई के लिए ज्यादा जाने जाते थे. मुझसे भी कहा गया कि मैं आग में न कुदूं. लेकिन न कूदता तो रहता कहाँ? वैसे मेरे रहने के लिए मंडली के पास फोकटिया व्यवस्था मौजूद थी. जैक्सन हॉस्टल का तीन कमरों का &lt;strong&gt;आउट हाउस&lt;/strong&gt; मित्र-मंडली के कब्जे में विगत कई सालों से था. कब्ज़ा जमाने में चूंकि मेरे बड़े भाई का भी यथेष्ठ योगदान था, इसलिए मेरी उपस्थिति किसी को नागवार नहीं गुज़रती.   इसके अलावा, न्यू हॉस्टल का पांच कमरों का आउट हाउस भी मेरे कुनबे के पास था. फिर भी, मैं चाहता था कि मैं अलग रहूँ. यही सोचकर मैं अस्थायी रहवासी के तौर पर न्यू हॉस्टल में जाने के लिए तैयार हो गया.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;तैयार तो हो गया लेकिन हॉस्टल में प्रवेश पाने के लिए इतना काफी नहीं था. कहा गया कि बेहतर यही होगा कि जो कमरा मुझे आवंटित किया गया है, उसके पुराने रहवासियों की पूर्व-सहमति ले लूं ताकि बाद में पछताना नहीं पड़े. शाम के वक़्त मैं अपने एक साथी के साथ अपने आवंटित कमरे के एक पुराने रहवासी से मिला और फरियाद की कि मुझे तत्काल रहने की ईजाज़त दी जाये. जी हाँ, उनका नाम योगीन्द्र सर था और वे भी राजपूत थे. फॉरवर्ड ब्लाक में उनकी तूती बोलती थी, उनके कृपापात्र हुए बगैर किसी की औकात नहीं थी कि वह हॉस्टल में रहवासी बन सके. उनने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा और पूछा कि क्या मुझे किसी ने बताया नहीं कि उनके कमरे में अब कोई ज़गह नहीं है. प्रत्युत्तर में मैंने कहा कि आपका कमरा तो चार छात्रों के लिए है और अभी उसमें सिर्फ दो ही हैं. मेरी बेवकूफी पर वे ठठाकर हंस पड़े और पूरे मसले को अपने मित्र के हवाले कर दिया. पहला करेला, दूजा नीम  और दोनों के बीच दांत काटे की रोटी का रिश्ता. उनके मित्र ने साफ शब्दों में कह दिया कि इस कमरे में तो वे सिर्फ दो ही रहेंगे और मैं किसी और कमरे में अपना इन्तेजाम कर लूं. मेरी सूरत देखने लायक थी. लेकिन मेरी मंडली के मित्र के चहरे पर कोई शिकन नहीं आयी. उसने चलते हुए सिर्फ इतना कहा कि ठीक है, हम शाम में फिर आयेंगे.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;दरअसल, मुझसे एक गलती हो गयी थी. छूटते ही मुझे बता देना चाहिए था कि मैं भी एक ठाकुर हूँ और मेरी भी यहाँ एक मंडली है. शाम को मैं राजेंद्र भैया के साथ फिर न्यू हॉस्टल पहुंचा और सीधे अपने आवंटित कमरे के दरवाज़े पर दस्तक दे दी. योगीन्द्र सर कमरे से बाहर निकले और अनिद्रा में ही राजेंद्र भैया को देखकर ठिठक गए. राजेंद्र भैया ने मुझसे कहा कि मैं इस कमरे के पुराने रहवासियों के सामान निकाल कर बाहर फ़ेंक दूं और अपना बोरिया बिस्तर किसी एक बेड पर लगा लूं. योगीन्द्र सर को शुरू में इस जवाबी हमले की उम्मीद नहीं थी. वे गिरगिराने लगे और कहने लगे कि मैं कितना भोला हूँ; यह भी न बताया कि मैं राजेंद्र भैया का करीबी हूँ. इत्तेफाक देखिये कि हॉस्टल में आते ही मैं मशहूर हो गया. कानों कान खबर फैल गयी कि मैं कोई मामूली शख्स नहीं हूँ, कि मुझसे पंगा लेना खतरे से खाली नहीं होगा. बिन चाहे, लम्पटों की ज़मात का सिरमौर मान लिया गया. ऊपर से तुर्रा यह कि न्यू हॉस्टल में दाखिला लेनेवालों में मेरे अंक सबसे ज्यादा थे, सो मैं हॉस्टल का आधिकारिक बॉस भी बना दिया गया. यानी, दो नावों पर सवारी करने का जोखम.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;बाद के दिनों में योगीन्द्र सर मेरे सबसे बड़े शुभचिंतक साबित हुए. उन्हीं की सोहबत में मैं न्यू हॉस्टल के पिछवाडे की टूटी दीवारों पर बैठकर शाम का वक़्त गुजारता, &lt;strong&gt;गणेश दत्त हॉस्टल &lt;/strong&gt;से आनेवाली और जानेवाली लड़कियों को लालची निगाहों से निहारता. वक़्त-बे-वक़्त उन लड़कियों को हम बड़ी बेअदबी से भाभी का संबोधन देते और अगर वे इस संबोधन पर गुस्सा करतीं तो हम उनकी ऐसी-तैसी करने में भी कोई गुरेज़ नहीं करते. नतीजा यह हुआ कि  लड़कियों से दोस्ती की संभावना सदा-सदा के लिए निर्मूल हो गयी. योगीन्द्र सर मेरे हनुमान थे और बिन बुलाए मेरी ओर से किसी के साथ लम्पटई करने पर उतारू हो जाते थे. वे जानते थे कि मेरी दिलचस्पी पढाई में है, सो वे पूरी कोशिश करते कि कोई मुझे किसी तरह पढ़ने में बाधा न पहुंचाए. यहाँ राज़ की एक बात और बता दूं. योगीन्द्र सर अपने जुराब में हमेशा चिलम छुपाये रखते थे और कमीज़ के पॉकेट में गांजे की पुडिया. सबसे पहले मैंने गांजा उन्हीं के साथ पी थी. कभी-कभी वे मुझे शराब भी पिलाते थे लेकिन इस हिदायत के साथ कि शराब पीना अच्छे विद्यार्थी के लिए अच्छी बात नहीं होती. मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि योगीन्द्र सर से ज्यादा मुहंफट और बेअदबी आदमी मैंने आजतक नहीं देखा है. जिस विश्वास के साथ वे लड़कियों को गाली दे लेते थे, हाथापाई करने पर उतारू हो जाते थे वह सबके बूते की बात नहीं थी. वे मानते थे कि अगर लड़कियाँ कॉलेज में पढ़ेंगी तो लडके छेड़खानी करेंगे ही. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;आज इतना ही. पटना कॉलेज के अनुभव, क्या कहिये, हरि अनंत हरि कथा अनंता. आगे की कड़ी का इंतज़ार आपकी तरह मुझे भी रहेगा. तबतक के लिए इसी से संतोष करें. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;वीरेन्द्र &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-6232340828458743894?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/6232340828458743894/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=6232340828458743894' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/6232340828458743894'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/6232340828458743894'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/04/6.html' title='बिहार विमर्श : 6 : पटना कॉलेज के शुरूआती अनुभव'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-3624237928876099130</id><published>2009-04-24T00:21:00.000-07:00</published><updated>2009-04-24T00:31:49.217-07:00</updated><title type='text'>चल रे मन कहीं और चल .</title><content type='html'>&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;strong&gt;चल रे मन कहीं और चल &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;ले चल मुझे सावन के फुन्हारों के बीच &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;पूर्वा हवा और सफ़ेद दीवाल बना ,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;आता हुआ बारिस का झोंका .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;कुएं के पास की दीवाल पर चढ़ , &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;पेड़ के पके अमरुद के पास &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;कि झट पट खायूँ ,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;उतरूं और भागूं घर की ओर .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;strong&gt;बारिस से बचते - बचाते हुए&lt;/strong&gt; .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;strong&gt;चल रे मन , कहीं और चल&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;भादो - आसीन के धान के खेतों से गुजरते रास्तों पर चल .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;गदराते धान के खेत , &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;और उससे गुजरती आरियों पर , &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;साफ़ पानी से भरे हुए धान के खेत ,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;पयीन ,अहरी और उसमें स्वछन्द तैरती अनगिनत छोटी मछलियों के बीच &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;पकड़ने दे उन्हें अपनी नन्हीं अँगुलियों से .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;strong&gt;चल रे मन कहीं और चल &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;फगुनाहट की मस्त हवा ,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;रस्ते के बगीचे में &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;आम के मंजर की भीनी खुसबू &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;पेडों पर कूकती कोयल &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;strong&gt;माँ के संग कहानी सुनते सुनते स्कूल जाते हुए&lt;/strong&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;strong&gt;चल रे मन कहीं और चल .&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;दादी के साथ &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;चाँदनी रात में गाते - खाते हुए &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;strong&gt;गंगा मईया के गीतों को सुनते - सोते हुए .&lt;br /&gt;चल रे मन कहीं और चल&lt;/strong&gt; .&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-3624237928876099130?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/3624237928876099130/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=3624237928876099130' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/3624237928876099130'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/3624237928876099130'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/04/blog-post_24.html' title='चल रे मन कहीं और चल .'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-6398383504982972144</id><published>2009-04-18T23:53:00.000-07:00</published><updated>2009-04-19T01:01:21.488-07:00</updated><title type='text'>मेरे हमउम्र मुस्लिम लड़के कहाँ थे ?</title><content type='html'>&lt;p&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;1970 से लेकर 1990-91 तक के मेरे विद्यार्थी काल में मेरे हम उम्र  मुस्लिम लड़के कहाँ थे ?&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;मेरा यह मानना है के अगर समाज अपनी बुनावट में सतरंगी है तो सातो रंग  , हर सामाजिक इकाई में दिखें ,यही स्वाभाविक कहा जायेगा . और अगर मेरी  इस मान्यता को सुधी और गुणी जन सही मानते हैं तो यह प्रश्न वाजिब है की अपने दौर के उस जमात के लड़कों की खोज की जाय .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;मेरी पैदाईस जिस गाँव में हुई वह सन 1947 के पहले मुस्लिम बहुल  गाँव था . &lt;br /&gt;1946 के सितम्बर महीने में यूं तो पूरे देश में सांप्रदायिक राजनीति , घृणा और दंगे पूरे  उफान पर था  पर बिहार का मगध क्षेत्र ख़ास कर पटना और बिहार शरीफ का इलाका धू - धू कर जल रहा था .बिहार के इस इलाके में साम्प्रदायिकता की  आग को  फौरी तौर पर मुस्लिम लीग के द्वारा  प्रायोजित डायरेक्ट एक्शन डे और कलकत्ता और नोआखाली के दंगों की प्रतिक्रिया लोग बाग कहते रहे हैं .खैर कारण जो भी रहें हों उन दंगों ने इस इलाके के सांस्कृतिक भूगोल और सामजिक ताने बाने को पूरी तौर से बदल दिया .मुस्लिम गाँव लुटे और जलाए  गए . सामूहिक नरसंहार की स्मृतियाँ आज भी पटना और नालंदा जिले के सामुदायिक स्मृति में कायम है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्रामीण जन आज भी काल गणना के लिए तीन सन्दर्भों का उपयोग करते हैं- १९३४ का भूकम्प - &lt;strong&gt;भुईआं डोल &lt;/strong&gt;,  सितम्बर 1946 का दंगा - &lt;strong&gt;राईट&lt;/strong&gt; या मियाँ मारी और 1966 का अकाल - &lt;strong&gt;सुखाड़ &lt;/strong&gt;. मेरा गाँव उस पुरे इलाके के चंद गाँव में से एक था जहां बाहरी लोग लूट मार करने में सफल नहीं हो पाए. बाद में  शांति बहाल होने पर इलाके की मुस्लिम जनता गाँव को छोड़ कर शहरों - बिहारशरीफ, हिलसा , इस्लाम पुर ,पटना / पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान का रुख कर गयी.मुसलमानों के घर और खेत को लोग खरीदने और हथियाने लगे . &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा गाँव भी मुस्लिम परिवारों से खाली होने लगा .मेरे होश में  गाँव में दो तीन घर ही मुसलमान बचे थे.एक मेरे पडोसी मूसा मियाँ का परिवार .मुसा मियां घर के सामने की मस्जिद में अजान देते थे  और  इलाके भर के लिए झाड़ फूँक का काम भी करते थे . साईं के तौर पर फसल कटाई के समय खेत खेत घूमते थे ,किसान श्रधा पूर्वक फसल का कुछ हिस्सा दे देते थे. रोजी रोटी का बाकी मसला परचून की एक दूकान और बीडी बना कर चलाते थे.&lt;br /&gt;मूसा मियाँ मेरे उर्दू शिक्षक भी थे. मैं और मेरे हम उम्र उनका लडक इसा एक साथ उर्दू पढ़ते थे. इसा  मेरे साथ  पांचवी छठी तक  हीं पढा ,बाद में वह कम उम्र में सिलाई का काम सिखाने के लिए अपने बड़े भाई के पास मसौढी चला गया .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मां के स्कूल से सातवीं पास कर मैं &lt;strong&gt;पटना कौलेजीअट  स्कूल&lt;/strong&gt; आ गया . १९७५ में  कौलेजीअट स्कूल में सौ डेढ़ सौ छात्रों में , जहां तक स्मरण है तीन चार मुस्लिम लडके भी नहीं थे .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाद में &lt;strong&gt;नैनीताल के आवासीय विद्यालय &lt;/strong&gt;में एक गोरखपुर का मुस्लिम सहपाठी से मुलाकात हुई  .खुर्शीद अहमद रिजवी . उसने दसवीं क्लास में एक नाटक लिखा था . मेरे हाउस मास्टर की प्रेरणा से उस नाटक का  स्कूल ऑडिटोरियम में सफल मंचन हुआ था . रिजवी  दसवीं के बाद स्कूल से वापस गोरखपुर चला गया .  पूरे स्कूल में 550 छात्रों में बीस पच्चीस मुस्लिम छात्र थे . उसमें भी ज्यादा तर बिहार के .बाबर सुलतान , जो गया का रहने वाला था , 1982 में अपनी प्रतिभा के बदौलत स्कूल का हेड बॉय बना .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थोडा और आगे  चलते हैं &lt;strong&gt;दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कॉलेज &lt;/strong&gt;और खास कर होटल में - हॉस्टल के  175 छात्रों में एक भी मुसलमान नहीं .जहाँ तक स्मरण है इकोनोमिक्स  ओनर्स के क्लास में एक भी मुसलमान नहीं  छात्र या छात्र नहीं . चलिए थोडा और आगे बढा जाय .&lt;br /&gt; दिल्ली विश्वविद्यालय का &lt;strong&gt;दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनोमिक्स &lt;/strong&gt;-    &lt;/span&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;एम् ए   अर्थशाश्त्र&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;में हम सब कुल  १५० छात्र छात्राएं .पर एक भी मुसलमान नहीं .  उसके बाद फिर जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में जाना हुआ और वहाँ मुस्लिम छात्रों की अछि तायदाद थी . पर वहाँ भी ज्यादा संख्या में उर्दू फारसी और अरबी पढ़ने वाले. और अधिकतर बरास्ता अलीगढ विश्वविद्यालय  , &lt;strong&gt;जे एन यू  &lt;/strong&gt;पहुंचे थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;पंद्रह - सत्रह सालों के इस सफ़र में इस तरह चंद मुस्लिम सहपाठी मिले.&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;जानने का मन करता है के  इस मजहबी जमात के मेरे हमउमर कहाँ थे और क्या कर रहे थे ?&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-6398383504982972144?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/6398383504982972144/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=6398383504982972144' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/6398383504982972144'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/6398383504982972144'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/04/blog-post_18.html' title='मेरे हमउम्र मुस्लिम लड़के कहाँ थे ?'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-5035982767459262042</id><published>2009-04-17T10:37:00.000-07:00</published><updated>2009-04-18T10:16:46.251-07:00</updated><title type='text'>बहुत कठिन थी डगर पनघट की</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;सुजीत चौधरी : अपने नए संपादित पोस्ट में मित्र सुजीत पटना शहर और कॉलेज के शुरुयाती अनुभव को विस्तार से बता रहें हैं.बातें आप बीती हैं पर जमाने के दर्द और हसरतों को समेटे हुए.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;( मित्र कौशल ने बिहारी विद्यार्थियों के दिल्ली जाने के शुरुआती दौर , उस समय के बिहार के (खासकर पटना के) कॉलेज और पटना विश्वविद्यालय की स्थिति और विशिस्ट सामाजिक - आर्थिक और राजनीतिक कारणों की चर्चा कर एक विचार-विमर्श का प्रारंभ किया है. मैंने भी पटना में स्नातक की पढ़ाई की है इसीलिये कौशल जी ने मेरे अनुभवों को पोस्ट करने को कहा. मैं अपने B. N. College के अनुभवों को लिख रहा हूँ. )&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;मैंने १९८१ में रांची से intermediate (विज्ञान) किया . उसी दौरान मेरी रूचि सामाजिक विज्ञान की और बढ़ी और समाजशास्त्र (sociology) पदने के लिए पटना गया. सच कहूं तो मुझे रांची छोड़ना था और मैंने ऐसा विषय चुना जिसकी पढाई रांची विश्वविद्यालय में नहीं थी. पटना में सिर्फ एक ही करीबी दोस्त था जो बिहार इंजीनियरिंग कॉलेज में mechanical इंजीनियरिंग पढ़ रहा था. उसने उसी समय admission लिया था और मुस्सलह पुर हाट के एक लौज में रहता था. मेरा दोस्त पटना में दो साल गुजार चुका था क्योंकि वह मुझसे सीनियर था और I.Sc. की पढ़ाई उसने साइंस कॉलेज से की थी हालाँकि वह लौज में ही रहता था. उसने मुझे पटना दिखाया -घुमाया. अशोक राजपथ, बोरिंग कैनाल रोड, , गाँधी मैदान, गोल घर, गंगा घाट, सिनेमा घर, आदि आदि.&lt;br /&gt;गाँधी मैदान का एक खास आकर्षण था : रोज़ शाम को एक आदमी अपना मजमा लगता था. उसके चारो तरफ हरेक उम्र के लोग कौतुहल और विमुग्ध होकर उसकी बातें सुनते थे. वह काफी हँसता -हँसाता था . वह एक खास नुस्खे की दवा बेचता था : योन शक्ति बढ़ने की दवा. उसका दावा था की उस दवा के ताकत से बूढा अधमरा व्यक्ति भी खटिया तोड़ सकता है. हमें तो उस दवा की जरूरत तो थी नहीं, जरूरत थी उस योंन मायालोक के तिलस्मी मनोरंजन की .&lt;br /&gt;कभी-कभी हम नाश्ते के लिए अशोक राजपथ जाते थे. हम collegiate गली के समोसे और जलेबा (जलेबी स्त्रीलिंग तो जलेबा अपनी विराटता के लिए जलेबा) के मुरीद थे. वहां विद्यार्थियों का हुजूम लगा रहता था खासकर पटना में कोचिंग लेने वाले विद्यार्थ्यीयों से. उस वक्त कोचिंग स्कूल्स का व्यवसाय जोरों से शुरू हुआ था क्योंकि हमारे हमउम्र के विद्यार्थियों का और खासकर उनके अभिभावकों का सपना होता था : मेडिकल या इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला. यह शिक्षा के व्यापक व्यवसायीकरण का शुरुआती दौर था.&lt;br /&gt;पटना में उस समय B. A. का admission शुरू नहीं हुआ था. खैर एक दो महीने के बाद मेरे दोस्त को हॉस्टल मिल गया जो law college के पास था और मजबूरन मुझे भी उसके साथ वहां रहना पड़ा. हॉस्टल में आकर पता चला की वह हॉस्टल तथाकतित scheduled castes और Backward castes के लिए अनौपचारिक रूप से आरक्षित था. law college पर उसी तरह ऊँचे वर्णों का वर्चस्व था. धीरे धीरे जाति, जातिय समीकरण और छात्रालयों में उनकी प्रभुता या प्रभुत्व जमाने की होड़. मुझे पता चला की फॉरवर्ड जाति-वर्ग में राजपूत और भूमिहार के बीच नहीं पटती. संक्षिप्त में कहा जाये तो एक और राजपूत-भूमिहार के बीच का दरार और उससे उपजी हिंसा तो दूसरी तरफ फोर्वार्ड और बैक्वार्ड जातियों का उभरता हुआ ध्रुवीकरण.&lt;br /&gt;मजे की बात यह की मेरा दोस्त Backward जाति का था और हम दोनों में जातिगत कोई भावना ही नहीं थी लेकिन उसने मुझे अपने हॉस्टल में 'Backward' घोषित कर दिया. मेरे survival के लिए यह एक मामूली सा समझौता था जो मुझे कभी अखरा भी नहीं और मेरा surname भी इतना सर्वव्यापी था की किसीको कोई शक नहीं हुआ. उस हॉस्टल के मुखिया थे वीर सिंह (नाम बदला है ) उसे मेरी ग़ज़लें पसंद थी . वह एक बुद्धिमान और प्रतिभाशाली विद्यार्थी था जो धीरे-धीरे जातिगत हिंसा के दलदल में फंसता जा रहा था. वर्तमान में मिलने वाला दबदबा उसकी हौसला-आफज़ाई कर रहा था. उसने एक दिन मुझे देसी तमंचा दिखाया और एक दिन जब सिर्फ हम दोनों अकेले थे तो उसने कहा मैं जानता हूँ तुम Backward नहीं हो लेकिन यह राज राज ही रहे. उसदिन के बाद मैं और मेरा दोस्त काफी सहमे रहते थे की किसी तरह मेरा राज न खुल जाए .&lt;br /&gt;खैर थोड़े दिनों में मुझे B. N. college के हॉस्टल में दाखिला मिल गया. मैंने B. N. college में इस लिए दाखिला लिया था क्योंकि कुछ सीनियर विद्यार्थिओं के सुझाव के मुताबिक, वहां का sociology विभाग पटना college से बेहतर था. हॉस्टल काफी भब्य था बिलकुल college के पास. हॉस्टल के वार्डेन जो मेरे विभागाद्ययक्ष भी थे मेरे पिताजी को जानते थे और उन्होंने एक अच्छा (?) सा कमरा allot कर दिया. पहले ही दिन जब मैंने अपना सामान रखकर बड़े से गोदरेज ताले से कमरा बंद कर गाँधी मैदान जाकर और वहां की घास पर लेटकर वापस लौटा तो पाया की कमरे की चाभी गाँधी मैदान में खो गयी है. वापस मैदान में ढूँढने की कोशिश नाकाम रही. लाचार होकर सब्जी बाग़ गया और लोहा काटने का ब्लेड खरीदा और दो घंटे लगे , गोदरेज का ताला काटने में. हॉस्टल में मैं किसीको नहीं जानता था. दो-तीन बाद एक नया रूममेट आया , जाति का राजपूत, उद्दंड स्वाभाव और राजधानी के मौजूदा फैशन से कदम से कदम मिलाने वाला. हालाँकि, अपने क्लास में कुछ day scholars से मित्रता बढ़ी और अकेलापन कम होने लगा. मेस में कुछ और मित्र बने.&lt;br /&gt;मेस में मैथिल बावर्ची और कर्मचारी थे. मेरे कमरे की खिड़की मेस की ओर खुलता था. अपना कम खतम कर वे गांजा -बीडी पीते और जोर जोर से बतियाते थे जो मेरे पोस्ट-लंच siesta में खलल डालता था. मेरी काफी झड़पे होती थीं. मेस का एक आकर्षण था : आलू का कुरकुरा ( छना हुआ ) भुंजिया , जो सभी काफी चटक से खाते थे. कुछ मित्र अपने साथ अचार और घी लाते थे . हाँ, एक चीज़ मेरी नज़र में पड़ी की कुछ खास लोगों के लिए खास खाना banta था और उन्हें रूम-सर्विस की सुविधा थी. कौन थे वे लोग ?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;थोड़े दिनों में पता चला की हॉस्टल के तीन blocks तीन जाति वर्गों पर आधारित थे. एक ब्लाक पर राजपूतों का वर्चस्व था तो दुसरे पर भूमिहारों का कब्ज़ा. मेरा ब्लाक थोडा मिश्रित था तब पता चला वार्डेन ने मुझे उस ब्लाक में क्यों कमरा क्यों दिया. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;हॉस्टल के पास अशोक राजपथ के कोने पर एक पान की दूकान था  जहाँ राजपूतों का नेता खादी का कुरता पजामा पहन अपना अड्डा लगाता था. देखने में वह शालीन था और दाढी के कारण उसमे एक गाम्भीर्य था. मैंने सुना था कि वह रात में रिक्शा लेकर (बगल में ही रिक्शे वालों का पडाव था) और रिक्शा चालक के भेष में प्रिया सिनेमा जाता था और सिर्फ लड़कियों या कमउम्र महिलाओं को उनके घर छोड़ता था. सवारी करते करते वह शुद्ध हिंदी या अंग्रेजी में बातें करता. आश्चर्यचकित सवार हुई महिलाओं या लड़कियों से पूछे जाने पर बताता की वह एक गरीब विद्यार्थी है जो दिन में पदाई करता है और रात को रिक्सा चलाता है. यह दिल जीतने और दिलफरेबी का नायब नमूना था. मैंने यह भी सुना था की वह बुरका पहन सब्जी बाग के उस हिस्से में घूमता था जहाँ महिलाएं होती थीं.&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;हमारा कॉलेज co-ed नहीं होने के कारन 'हीन भावना' से ग्रस्त था जो विभिन्न रूपों में परिलक्षित होता था. कुछ लोग स्टुडेंट स्पेशल बसों में छेड़खानी करते या सड़क के पास फब्तियां कसते. होली जब करीब आती तो रिक्सा =बसों से सफ़र करती लड़कियों पर गुलाला भी  फेंका जाता.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;झुंड-मानशिकता से अलग एक और घटना याद आती है. मेरा एक दोस्त जो अंग्रेजी साहित्य का विद्यार्थी था , सेक्स से काफी obsessed था . वह गोविन्द मित्र रोड के पास एक lodge में रहता था. एकदिन सबेरे-सबेरे उसने मेरा दरवाज़ा खटखटाया , चेहरा फुला और खूनी खरोंचों से भरा. पता चला उस lodge में ज्यादातर मेडिकल स्टूडेंट्स रहते थे . हमारे मित्र के कमरे के बगल में एक मेडिकल विद्यार्थी थे जिनकी नयी नयी शादी हुई थी और उन्होंने अपनी नयी नवेली पत्नी को lodge में कुछ दिनों के लिए लाया था. मेरे मित्र सारी रात प्रेम और काम क्रीडा की कल्पना करता रहा और जब उसे और सब्र नहीं रहा तो वह गर्मियों के मौसम के उस रात में उसने अधखुली खिड़की से अन्दर झाँकने की कोशिश में लग गया . उस विद्यार्थी ने उसे देख लिया और उसकी जम कर पिटाई की. मुझे अपने मित्र पर दया आयी मगर मैं यह नहीं समझ नहीं पाया की जो लड़का एक ओर नुक्कड़ नाटक करता है और मुझसे वोर्द्स्वोथ और मिल्टन की बातें करता है वह उत्सुकतावश ऐसी हरकत भी कर सकता है. शायद दोष उसका नहीं उस सामाजिक वातावरण का था.&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;हमारे कॉलेज के पास गंगा घाट भी था. छट पर्व के दिन हम रास्ते पर बाकायदा चादर बिछा देते औरप्रसाद का  ठेकुयाँ मांगते. यह तकरीबन एक सप्ताह तक हमारे नाश्ते में काम आता.&lt;br /&gt;उसी दौरान क्रिकेट और टीवी का प्रवेश हुआ . भारत ने कपिलदेव के नेतृत्व में विश्व कप जीता और आधी रात को मेरे एक मित्र ने (जो अब railways में उच्चाधिकारी हैं ) भारत के गर्व से गौरवान्वित होकर अपना वस्त्र उतार , बिलकुल नग्न होकर गाँधी मैदान तक की दौड़ लगाकर एक नयी मिसाल कायम की.&lt;br /&gt;कुछ विद्यार्थी प्रगतिशील विचारधारा से प्रभावित होकर नुक्कड़ नाटक करते थे. मैंने भी एक लघु पत्रिका में गोविन्द निहलानी निर्देशित फिल्म " आक्रोश " पर एक लेख लिखा था .&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;इन सब नवयुवक सुलभ बातों-व्यवहारों के बीच हिंसा की पौध भी पनप रही थी. रंगदार विद्यार्थियों का एक झुंड अशोक राजपथ के दूकानों से बिना पैसा दिए सामान ले लेता था. उसी दौरान हमारे हॉस्टल में राजपूत और भूमिहार गुटों के बीच घमासान संघर्ष शुरू हुआ. यह एक लम्बा सिलसिला था. शाम को जब वापस हॉस्टल आता तो पता चलता की बमबारी हुई है और विद्यार्थीयों की जगह पुलिस दिखाई देते. हॉस्टल खाली करा दिया जाता और पहली बार एक नया शब्द सुना: sine die . हॉस्टल में पुलिस की बंदोबस्त होने लगी. ऐसा कई बार होने लगा. फिर मैंने सुना की बैकॅवाङ - फॉरवर्ड के संघर्ष में वीर सिंह बुरी तरह जख्मी हो गया . मुश्किल से जान बची.&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;मैं उससे मिलने PMCH भी गया.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;br /&gt;इन्ही परिस्थितियों के बीच हमारी पढाई हो रही थी. हमारी B. A. (Hons) की परीक्षा करीब आ गयी . इतर गिता हमारे और पटना कॉलेज के बीच थी. हमलोग अपने सूत्रों से यह पता लगाने की कोशिश करते की पटना कॉलेज में Topper होने का कौन दावेदार है. सच कहूं तो मित्र बीरू का नाम पता चला. उनसे मेरे कभी मुलाकात नहीं हुई हाँ वर्षों बाद वे जेएनयू में मेरे मित्र बने और अभी भी मित्र हैं.&lt;br /&gt;पुलिस बंदोबस्त के बीच परीक्षा हुई और नतीजा भी आया . मैं प्रथम श्रेणी में द्वितीय स्थान पर था और प्रथम स्थान पर एक ऐसा विद्यार्थी था जिसे कोइ जानता भी नहीं था. सुना की वह कुलपति या उपकुलपति का दामाद था . उसकी बहुत ऊँची पहुँच थी और वह बना topper!&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;आज इतने वर्षों के बाद उन बातों को याद कर एक मिश्रित भावना उमगती है .&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;अगर मैं राजपूत, भूमिहार या अन्य जातीय गुट में शामिल होने को मजबूर होता तो क्या होता ?&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;कितना संकीर्ण फासला था सही या गलत रास्तों में .&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;उस उम्र में कितनी वैचारिक परिपक्वता थी , सही और गलत के फर्क समझने में.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;" बहुत कठिन थी डगर पनघट की."&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-5035982767459262042?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/5035982767459262042/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=5035982767459262042' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/5035982767459262042'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/5035982767459262042'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/04/blog-post_17.html' title='बहुत कठिन थी डगर पनघट की'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-5701315380492255599</id><published>2009-04-16T20:35:00.001-07:00</published><updated>2009-04-16T21:26:59.445-07:00</updated><title type='text'>अथ स्कूल कथा : कैसा था पटना का यह स्कूल १९७५ में ?</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;ग्रामीण छात्रवृति योजना के तहत मेरा चुनाव हुआ और जनवरी सन १९७५ में मेरा दाखिला पटना कौलेजिअट स्कूल में हुआ. रहने की व्यवस्था स्कूल होस्टल में.  दाखिले के समय मैं ग्यारह साल का था .&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;छात्रवृति की यह योजना ग्रामीण छात्रों के लिए थी. हर प्रखंड से दो छात्रों का चयन द्वि स्तरीय लिखित परीक्षा के माध्यम से किया जाता था . चयनित छात्रों को जिला स्कूल में प्रवेश दिया जाता था .और रहने की व्यवस्था स्कूल हॉस्टल में की जाती थी . शुक्र है सरकार की इस योजना का की गाँव का लड़का राजधानी के स्कूल में आ गया .&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;१९७५ में सौ रुपये की मासिक छात्रिवृति मिलती थी. हम सब का कदम कुँआ में स्टेट  बैंक की एक शाखा में बैंक अकाउंट खोला गया था. हर महीने हम सब बच्चे अपना अपना चेक खुद भर कर प्राचार्य महोदय से दस्तखत करा कर बैंक जाते और पैसे  लेकर आते .छोटी उम्र में हीं बैंक से यह बढ़िया एक्सपोजर था . दृष्टि पात करने पर लगता है की बैंक में जगह की कमी के वावजूद कर्मचारी कार्य कुशल थे  , बैंक  में कुशल व्यवस्था थी और हम सब के चेक का भुगतान शीघ्र हो जाता था .&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;होस्टल की भव्य बिल्डिंग थी . बड़े बड़े कमरे और चौडे ओसारे .बीच में लॉन  और किनारे में अशोक  के बड़े पेड़. लॉन में दो चार नल लगे थे जहां  हम सब के खुले में नहाने की व्यवस्था थी. होस्टल के चारों तरफ चहारदीवारी थी और दक्षिण तरफ बड़ा सा खेल का मैदान.हॉस्टल से सटे  हॉस्टल अधीक्षक श्री जंग बहादुर लाल का आवास था . तीन चार बजते बजते स्कूल का  विशाल मैदान   हॉस्टल और आस पास के मुहल्लों  के बच्चों से  भर जाता था .बच्चे गुल्ली डंडा से लेकर क्रिकेट , फुटबाल तक में लग जाते थे . होस्टल के प्रवेश द्वार के साथ हीं स्कूल प्रिंसिपल श्री त्रिवेणी सिंह का आवास था. स्कूल परिसर में नीम और आम के विशाल पुराने दरखत थे और ढेर सारी चिडियों  की आश्रय स्थली .शाम होते ही पूरा परिसर  तरह तरह की  पक्षियों की चहचाहट से गुन्जायीत होता था.&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;हॉस्टल में १००-१५०  , आठवीं से लेकर ग्यारहवीं तक के लड़के रहते थे .अस्सी प्रतिशत बच्चे ग्रामीण छात्रवृति योजना के तहत चयनित .और कुछ को छोड़ कर सब ग्रामीण  और छोटे कस्बाई पृष्ठभूमि के . हम सब के लिए शहर में रहने का यह पहला अनुभव था .होस्टल में सटे दो मेस था . दोनों में से किसी में आप शामिल हो सकते थे . दिन में दो वार चावल , दाल सब्जी और भुजिया का भोजन .दाल पतला . सब्जी में मुख्य  रूप से आलू और वो सब्जियाँ जिनका सीज़न पार हो रहा होता था .भुजिया मुख्य रूप से आलू की जिसमें नाम मात्र का तेल और फोरन होता था . शुरुआत में तो कुछ स्वाद लगा पर बाद में मेस का खाना तो हम सब बच्चे भूख के जोर पर हीं भीतर ठेल पाते थे. फरबरी के महीने में माँ  पटना आयी . बेटे की हालत देख कर आधा लीटर दूध  रोजहा का इन्तेजाम कर गयी.दरिया पुर मोहल्ले का एक सख्श होस्टल में कुछ लड़कों को दूध दे जाता था.लेकिन लगता है की दूध में मिलावट शुरू हो चुकी थी और मुझे उस दूध के स्वाद का स्मरण कर आज भी उबकाई आती है. &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt; खाने का चार्ज महीने का साठ रूपया . सौ रुपये की  मासिक छात्रवृत्ति में  मेस चार्ज के बाद चालीस रुपये हाथ में बच जाते थे. और खर्च करने के लिए पटना का पूरा बाजार था .&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;पटना कौलेजिअट स्कूल ,  पटना शहर का पुंरानास्कूल है . ब्रिटिश शैली  में बनी हुई स्कूल की &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;भव्य इमारत . गोल ऊँचे पाए . मुख्य भवन के सामने सुन्दर पार्क . उस पार्क में ऊँचे छोटे घेरे में पानी भर कर कमल के फूल की व्यवस्था थी. पहली बार जब देखा था तो कुछ कुछ जादूई लगता था . स्कूल इमारत के इतिहास की  ठीक ठाक जानकारी नहीं है पर निसंदेह भवन उन्नीसवीं सदी का है. और यह पटना के  चंद भव्य और खूबसूरत इमारतों में से एक रहा होगा . जिस किसी ने स्कूल परिसर की परियोजना बनायी थी उसने ने सारी व्यवस्था ग्रैंड स्केल पर किया था. &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt; तो हम सब गाँव के बच्चे पटना शहर के इस पुराने स्कूल में रहने और पढ़ने लगे.पटना शहर के नापने और तौलने लगे.हथुआ मार्केट जाना और आते समय गोल गप्पे ( जिस हम सब फोचका कहते थे )और आलू टिक्की चाट खाना मुख्या आकर्षण रहता था . सब्जी बाग़ भी जाते थे.सब्जी बाग़  में बेकरी की दुकानें और तरह तरह की पाव रोटी और बिस्कूट . कोको कोला , चाट और सिनेमा से हम सब का परिचय हो रहा था .मेरे लिए पहली फिल्म थी रूपक में जे संतोषी माँ और फिर बाद में एलिफिंस्टन में शोले और वीणा  में सन्यासी .साल भर में मैं पंद्रह  बीस फिल्में देख लिया .एक मित्र देखी हुयी सारी फिल्मों का लिस्ट बना ता था . मैंने भी लिस्ट बनाना शुरू किया .साल के अंत में यह लिस्ट माँ के हाथ लग गयी . माँ ने पिटाई तो नहीं की पर पुरे घर में बड़ी बदनामी हुयी.याद करें यह वो दौर था जब सिनेमा को अभिभावक गण हेय दृष्टि से और बहुत हद तक अशलील &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;और बच्चों के बच्चों को बिगाड़ने के शर्तिया नुख्से  के तौर पर लेते थे . &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;  यहीं क्रिकेट से परिचय हुआ .पर फिल्ड में खेलते समय अक्सरहां सब्जी बाग़ के बदमास और बड़े बच्चों से जूझना पड़ता था . एक से एक भद्दी भद्दी गालियाँ देते थे और उनका मन किया तो हम सब का बात बल भी छीन लेते थे .कुछ बड़े लड़के , दाढ़ी बनाने वाले उस्तरे साथ रखते थे और उसी से हम सबों को डराते थे.मार पीट तो कम लेकिन उन लड़कों के डराने का स्वांग हीं हम सबको बेहद भयभीत किये रहता था.पटना शहर में ७० के दशक में दुर्गा पूजा से लेकर छठ पर्व तक तरह तरह के शास्त्रीय संगीत के बड़े बड़े कार्यक्रमों का आयोजन होता था .और पटना कौलेजिअट स्कूल का मैदान इन आयोजनों की मुख्य स्थली होती थी. &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;स्कूल में हमारे गाँव के स्कूल के लिहाजन अनुशासन ढीला ढाला था .कुछ दादा किस्म के लड़के हॉकी  सटीक &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt; लेकर घूमते  थे. छात्रों पर शिक्षकों का अनुशासन था .आम तौर पर शिक्षक भी योग्य थे .एक दिल दहला&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt; देने वाला वाकया  याद है. हिंदी के एक शिक्षक शर्माजी थे . स्कूल परिसर में हीं उनका आवास था . पता नहीं  &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;पढाने में उनकी योग्यता क्या थी ? ठीक से याद नहीं है .एक दिन  क्लास में पता नहीं , एक बच्चे ने क्या गुस्ताखी कि शर्मा ने उस बच्चे को क्लास में आगे लाकर बेतरह पीटा. छोटा बच्चा  रोता हुआ   अपनी बेगुनाही और  क्षमा याचना करता रहा .पर शर्मा ने कोई रहम नहीं किया .हम सब बच्चे पूरी तरह से आतंकित हो गए थे . इतने सालों के  बावजूद जब भी इस वाकये  का स्मरण होता है शर्मा के लिए मुंह में भद्दी गाली आती है.&lt;/span&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;राष्ट्रीय स्तर की  मेधा छात्रवृति के बदौलत मैं   १९७६ के मध्य में मेरा दाखिला नैनीताल के एक प्रतिष्ठीत आवासीय स्कूल में हो गया .पटना कौलेजिअट स्कूल  में बिठाये डेढ़ साल कई मायनों में याद गार रहे .कई तरह के नायब अनुभव हुए.  शहर में रहने का यह पहला अनुभव था .शहर की विशालता , सुविधायों ,जददो - जहद  और खास तरह की गुमनामी का अहसास उस कच्ची उम्र में भी हो रहा था .पर समग्रता में कहूं तो ये सारे अहसास बेहद सुखद थे . शायद हर बचपन और कैशोर्य जीवन के तमाम उतार चढाव और संघर्षों के वावजूद  सुखद हीं होता है . &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;शहर के पहले स्कूली अनुभव  की बाकी यादें   बाद में .&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-5701315380492255599?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/5701315380492255599/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=5701315380492255599' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/5701315380492255599'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/5701315380492255599'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/04/blog-post_16.html' title='अथ स्कूल कथा : कैसा था पटना का यह स्कूल १९७५ में ?'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-4354108905144986547</id><published>2009-04-11T23:02:00.000-07:00</published><updated>2009-04-11T23:19:11.527-07:00</updated><title type='text'>हाल -ये -बयान ,पटना के कॉलेज ओं का -१९८०, की शुरुआत में</title><content type='html'>&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc6600;"&gt;सुजीत चौधरी ,सुना रहें हैं अपनी आप बीती , बरास्ता पटना शहर और बी एन कॉलेज .पढिये और अपने अनुभवों से इस सिलसिले को आगे बधाईये.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;( मित्र कौशल ने बिहारी विद्यार्थियों के दिल्ली जाने के शुरुआती दौर , उस समय के बिहार के (खासकर पटना के) कॉलेज और पटना विश्वविद्यालय की स्थिति और विशिस्ट सामाजिक - आर्थिक और राजनीतिक कारणों की चर्चा कर एक विचार-विमर्श का प्रारंभ किया है. मैंने भी पटना में स्नातक और पूर्व-स्नातक की पढ़ाई  की है इसीलिये कौशल जी ने मेरे अनुभवों को पोस्ट करने को कहा. )&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;मैं अपने B. N. College के अनुभवों कोलिख रहा हूँ. &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt; मैंने १९८१ में रांची से intermediate (विज्ञान) किया . उसी दौरान मेरी रूचि सामाजिक विज्ञान की और बढ़ी और समाजशास्त्र (sociology) पदने के लिए पटना गया. सच कहूं तो मुझे रांची छोड़ना था  और मैंने ऐसा विषय चुना जिसकी पढाई रांची विश्वविद्यालय में नहीं थी. पटना में सिर्फ एक ही करीबी दोस्त था जिसने बिहार इंजीनियरिंग कॉलेज में mechanical इंजीनियरिंग पढ़ रहा था. उसने उसी समय admission लिया था और एक लौज में रहताथा. पटना में B. A. का admission शुरू नहीं हुआ था. मेरा दोस्त पटना में दो साल गुजार चुका था क्योंकि वह मुझसे एक साल सीनियर था और I.Sc. की पढ़ाई उसने साइंस कॉलेज से की थी हालाँकि वह लौज  में ही रहता था. उसने मुझे पटना घुमाया. अशोक राजपथ, गाँधी मैदान, सिनेमा घर, आदि आदि. पटना कॉलेज के सामने वाली गली के समोसे और जलेबा (जलेबी स्त्रीलिंग तो जलेबा अपनी विराटता के लिए जलेबा) . विद्यार्थियों का हुजूमलगा रहता था वहां. उस समय पटना में कोचिंग schools काफी थे क्योंकि हमारे हमउम्र के विद्यार्थियों का सपना होता था मेडिकल या इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला. खैर एक दो महीने के बाद मेरे दोस्त को हॉस्टल मिल गया जो law college के पास था और मजबूरन मुझे भी उसके साथ वहां रहना पड़ा. हॉस्टल में आकार पता चला की यह हॉस्टल तथाकतित  scheduled castes और Backward castes के लिए अनौपचारिक रूप से आरक्षित था. law college पर उसी तरह ऊँचेवर्णों का वर्चस्व था. धीरे धीरे जाति, जातिय समीकरण और छात्रालयों में  उनकी प्रभुता या प्रभुत्व जमाने की होड़. मुझे पता चला की फॉरवर्ड जाति-वर्ग  में राजपूत और भूमिहार के बीच नहीं पटती. संक्षिप्त में कहा जाये तो  एक और राजपूत-भूमिहार के बीच का दरार और उससे उपजी हिंसा तो दूसरी तरफ फोर्वार्ड और बैक्वार्ड जातियों का उभरता हुआ धूरिकरण.  मजे की बात यह की मेरा दोस्त Backward जाति का थाऔर हम दोनों में जातिगत कोई भावना ही नहीं थी लेकिन उसने मुझे अपने हॉस्टल में 'Backward' घोषित कर दिया. मेरे survival के लिए यह एक मामूली सा समझौता था जो मुझे अखर भी नहीं और मेरा surname भी इतना सर्वव्यापी था की किसीको कोई शक नहीं हुआ. उस हॉस्टल के मुखिया थे भीम सिंह जिन्हें मेरी ग़ज़लें पसंद थी . वह एक बुद्धिमान और प्रतिभाशाली विद्यार्थी था जो धीरे-धीरे जातिगत हिंसा के दलदल में फंसता जा रहाथा. वर्तमान में मिलने वाला दबदबा  उसकी हौसला-आफज़ाई  कर रहा था. उसने एक दिन मुझे देसी तमंचा दिखाया और एक दिन जब सिर्फ हम दोनों अकेले थे तो उसने कहा मैं जानता हूँ तुम Backward नहीं हो लेकिन यह राज राज ही रहे. उसदिन के बाद मैं और मेरा दोस्त काफी सहमे रहते थे की किसी तरह मेरा राज न खुल जाए . खैर, तबतक मुझे B. N. college के हॉस्टल में दाखिला मिल गया. मैंने B. N. college में इस लिए दाखिला लिया था क्योंकि कुछसीनियर विद्यार्थिओं के सुझाव के मुताबिक, वहां का sociology विभाग पटना college से बेहतर था. हॉस्टल काफी भब्य था बिलकुल college के पास. हॉस्टल के वार्डेन जो मेरे विभागाद्ययक्ष भी थे मेरे पिताजी को जानते थे और उन्होंने एक अच्छा (?) सा कमरा allot  कर दिया.  पहले ही दिन जब मैंने अपना सामान रखकर बड़े से गोदरेज ताले से कमरा बंद कर गाँधी मैदान जाकर और वहां की घास पर लेटकर वापस लौटा तो पाया की कमरे कीचाभी गाँधी मैदान में खो गयी है. वापस मैदान में ढूँढने की कोशिश नाकाम रही. लाचार होकर सब्जी बाग़ गया और लोहा काटने का ब्लेड खरीदा और दो घंटे लगे , गोदरेज का ताला काटने में. हॉस्टल में मैं किसीको नहीं जानता था. दो-तीन  बाद एक नया रूममेट आया , जाति का राजपूत, उद्दंड स्वाभाव और राजधानी के मौजूदा फैशन से कदम से कदम मिलाने वाला. हालाँकि, अपने क्लास में कुछ day scholars से मित्रता बढ़ी औरअकेलापन कम होने लगा. मेस में कुछ और मित्र बने. थोड़े दिनों में पता चला की हॉस्टल के तीन blocks तीन जाति वर्गों पर आधारित थे. एक ब्लाक पर राजपूतों का वर्चस्व था तो दुसरे पर भूमिहारों का कब्ज़ा. मेरा ब्लाक थोडा मिश्रित था तब पता चला वार्डेन ने मुझे उस ब्लाक में क्यों कमरा क्यों दिया. हॉस्टल के पास अशोक राजपथ के कोने पर एक पान की दूकान थी जहाँ राजपूतों  का नेता खादी का कुरता पजामापहन अपना अड्डा लगाता था. देखने में वह शालीन था और दाढी के कारण उसमे एक गाम्भीर्य था. मैंने सुना था कि वह रात में रिक्शा लेकर (बगल में ही रिक्शे वालों का पडाव था) और रिक्शा चालक के भेष में प्रिया सिनेमा जाता था और सिर्फ लड़कियों या कमउम्र महिलाओं को उनके घर छोड़ता था.  कभी कभी वह बुरका पहन सब्जी बाग के उस हिस्से में घूमता था जहाँ महिलाएं होती थीं. दूसरी तरफ रंगदारविद्यार्थियों का एक झुंड अशोक राजपथ के दूकानों से बिना पैसा दिए सामान ले लेता था. उसी दौरान हमारे हॉस्टल में राजपूत और भूमिहार गुटों के बीच घमासान संघर्ष शुरू हुआ.  बमबारी की शुरुआत हुई और हॉस्टल खाली करा दिया गया . हॉस्टल में पुलिस की बंदोबस्त होने लगी. ऐसा  कई बार होने लगा. फिर मैंने सुना की बैकॅवाङ - फॉरवर्ड के संघर्ष में भीम सिंह बुरी तरह जख्मी हो गया . मुश्किल से जान बची.इन्ही परिस्थितियों के बीच हमारी पढाई हो रही थी.  हमारी B. A. (Hons) की परीक्षा करीब आ गयी और असली प्रतियोगिता हमारे और पटना कॉलेज के बीच थी. पुलिस बंदोबस्त के बीच परीक्षा हुई और नतीजा भी आया . मैं प्रथम श्रेणी में द्वितीय स्थान पर था और प्रथम  स्थान पर एक ऐसा विद्यार्थी था जिसे कोइ जानता भी नहीं था. बाद में पता चला की उसकी बहुत ऊँची पहुँच थी.&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-4354108905144986547?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/4354108905144986547/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=4354108905144986547' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/4354108905144986547'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/4354108905144986547'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/04/blog-post_11.html' title='हाल -ये -बयान ,पटना के कॉलेज ओं का -१९८०, की शुरुआत में'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-1689445360300371792</id><published>2009-04-09T10:41:00.000-07:00</published><updated>2009-04-09T10:58:14.886-07:00</updated><title type='text'>कैसा था गाँव का स्कूल ? बिहार विमर्श : अथ स्कूल कथा - भाग दो</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;वीरेन्द्र , बिहार विमर्श की अगली कड़ी : अथ स्कूल कथा  - भाग दो . &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt; &lt;span style="color:#990000;"&gt;कैसा था गाँव का स्कूल ?&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;'अथ स्कूल कथा' के नाम से जो संस्मरण मैंने सुनाया था, वह कई कारणों से मुझे अधूरा लगा. अव्वल तो यही कि मैं उन तमाम लम्हों से आपको रु-ब-रू नहीं करा सका जो मेरे बनने-बिगड़ने में खास रूप से सहायक रहे थे. तो आईये, एकबार फिर मेरे साथ स्कूल की यादें ताजा करें. &lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;तो सबसे पहले मैं आपको फिर से अपने गाँव के प्राईमरी स्कूल ले चलता हूँ.   था तो हमारा स्कूल छोटा, किन्तु उसका एक अलग परिसर था जिसमें बेर, कैक्टस और अमरूद के पेड़ लगे हुए थे. खाली ज़मीन पर माट्साब धन और गेहूं की खेती करवाते थे. जाडे के दिनों में हम बच्चे कभी-कभी साग-सब्जी की खेती भी कर लिया करते थे. गाँव का कोई भी व्यक्ति स्कूल की खेती को कभी कोई नुक्सान नहीं पहुंचाता, उल्टे बिन मांगे ही कभी हल चलवा देता तो कभी खाद  छिड़कवा देता. मुझे अचरज होता कि जब रखवाली के बाद भी कई किसानों की फसल फसल-चोर काट लेते थे, तब स्कूल की खेती कैसे बची रह जाती थी. संभव है, चोर यह मानते हों कि स्कूल की चोरी से उन्हें ज्यादा पाप लगेगा. खैर, बाद के दिनों में स्कूल के बेर के पेड़ कटवा दिए गए और उनकी लकडियों से बच्चों के बैठने के लिए पटरियाँ बनवा दी गयीं. चौथी और पांचवीं कक्षा के छात्रों के लिए ईंटों के पाए बनाकर उनके ऊपर पटरियों को बिछा दिया गया ताकि वे उनका इस्तेमाल तख्ती के रूप में कर सकें. हेडमाट्साब के लिए कुर्सी के अलावा एक टूटा हुआ टेबल भी था जिसके ऊपर एक ग्लोब स्थापित कर दिया गया था. ग्लोब को छूने की जिज्ञाषा हमारे मन में लगातार बनी रहती, किन्तु माट्साब के डर से ऐसा करने की हिम्मत कभी नहीं हुई.    &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;पहले बता चूका हूँ कि इस विद्यालय में एक ही शिक्षक नियमित रूप से आते थे और वही पहली कक्षा से लेकर पांचवीं कक्षा के छात्रों को हरेक विषय पढाते थे. लेकिन जो दो शिक्षक अनियमित थे, उनमें से एक हेडमास्टर साहब के छोटे भाई थे और दूसरे चेला गाँव के पंडीजी. दोनों बच्चों से खूब प्यार करते थे. सच तो यह है कि पंडीजी से कोई बच्चा डरता ही नहीं था. डरे भी तो किसलिए? पंडीजी तो खुद ही बच्चों के साथ रोज़ शाम में 'मुअनी-जीअनी' का खेल खेलते थे. मुझे आज तक पता नहीं चल पाया कि यह खेल खुद पंडीजी ने ईजाद किया था या फिर यह किसी और देश से हमारे देश में आया था. खैर, इस खेल के नियम बड़े सरल थे. बच्चों की टोली गोला बनाकर पंडीजी के चारों ओर घूमने लगती; पंडीजी आँखें बंद किये मुहं में कुछ बुदबुदाते रहते और अचानक अपनी तर्जनी ऊंगली को सीधे किसी बच्चे की नाक से सटा देते. बच्चा ज़मीन पर गिर जाता, गोया उसके प्राण-पखेरू उड़ गए हों. इस क्रिया को पंडीजी मुअनी कहते थे.  एक-एक कर पंडीजी सभी बच्चों को मार देते और फिर खुद रोने लगते. उनका विलाप सुनकर शारीरिक रूप से  मज़बूत कोई दूसरा बच्चा पंडीजी के पास आता; उनके रुदन का कारण पूछता. जवाब में पंडीजी रोते हुए उसकी पीठ पर बैठ जाते और कहते कि अब चलो मुझे वैद्य जी के घर ले चलो. पंडीजी बच्चे की पीठ पर बैठे-बैठे सभी मृत बच्चों के पास जाते और कान में कुछ कहते. परिक्रमा पूरी कर जब वे वापस अपने स्थान पर खड़े होते तो उनके हाथ में सरकंडा की एक खोखली छड़ी होती. वे उसमें कुछ देर तक फूंकते रहते और अचानक किसी बच्चे का नाम पुकारकर उसके फिर से जिंदा हो जाने की घोषणा करते. इस क्रिया को हम 'जीअनी' कहते थे. पंडीजी जब भी स्कूल आते, हम बच्चे उनसे जिद्द करते कि वे हमारे साथ मुअनी-जिअनी का खेल ज़रूर खेलें. पंडीजी ने हमारे आग्रह की कभी अनदेखी नहीं की. जिस दिन पंडीजी स्कूल आते, उस दिन हम बच्चों की मस्ती हो जाती. पंडीजी के अलावे हमारे स्कूल में एक और शिक्षक भी थे जिन्हें हम थर्ड माट्साब कहते थे. ये छतरबली माट्साब के अपने छोटे भाई थे और स्कूल में सिर्फ उन्हीं दिनों आते थे जब किसी कारणवश छतरबली माट्साब स्कूल आने में असमर्थ हो जाते थे. बच्चों से इनका व्यवहार बहुत अच्छा था और शायद ही कभी किसी बच्चे को उनसे डांट खानी पड़ी होगी. उनके पढाने का तरीका भी बहुत सुन्दर था. मेरे स्कूल में तब कई बच्चे ऐसे थे जो बिना अक्षर-ज्ञान के ही पहली कक्षा की किताबें पढ़ लिया करते थे. इन तमाम बच्चों को थर्ड माट्साब पहचानते थे. कुछ नया पढाने से पहले वे अक्सर इन बच्चों से चुहल करते थे. ऐसा करते समय वे चान्ददेव का नाम कभी न भूलते. वे ऊंची आवाज़ में चान्ददेव का नाम पुकारते और चान्ददेव की ऊंगुलियाँ 'रानी, मदन, अमर' के पन्ने पलटने लगतीं. सर झुकाए वे पढ़ते रहते, "मां, पिताजी...आगे देखो... भालुवाला आया' ..वगैरह-वगैरह.  हम सब बच्चे थर्ड माट्साब के स्कूल आने की रोज प्रतीक्षा करते, किन्तु वे कब आते और कब चले जाते हमें याद नहीं रहता. लगभग पूरे भरोसे के साथ कह सकता हूँ कि पांचवीं तक की पढाई में जितनी बार वे स्कूल आये होंगे उससे कहीं ज्यादा स्कूल इंसपेक्टर ने हमारे स्कूल का दौरा किया होगा. &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;चूंकि तब यह गाँव-जवार का एकलौता स्कूल था, अतः यहाँ पढ़नेवालों में सलेमपुर, कांधरपुर, जनई, खुटियारी, तिरकौल और कुर्मी टोला के छात्र भी होते थे. तिरकौल के मदरसा में पढ़नेवाले छात्र भी इस स्कूल में हिंदी सीखने आते थे. शुरू में तो इनकी उपस्थिति बच्चों के मन में एक कुतूहल पैदा करती थी, क्योंकि उम्र में वे पूरी तरह व्यस्क नहीं तो किशोर अवश्य हुआ करते थे. यह तो बाद में पता चला कि वास्तव में वे हाई स्कूल कर चुके थे और यहाँ सिर्फ हिंदी पढ़ने के लिए आते थे. लेकिन, उम्र के अलावा उनमें और हममें कोई और अंतर नहीं होता था. वे भी हमारे साथ लकडी की तख्ती पर बैठते थे और उनके झोले में भी स्लेट-पेंसिल के अलावा सिर्फ एक-दो नन्हीं किताबें हुआ करती थीं. उनसे भी अगर गलती होती तो हम मास्टर साहेब के निर्देश पर उनके कान उमेठ देते थे. इस काम में एक अलग तरह का रोमांच हुआ करता था.  &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;हमारा प्राईमरी स्कूल पूरी तरह लोकतांत्रिक था. सभी जाति और धर्मं के बच्चे यहाँ मौजूद थे; सबके बैठने की ज़गह भी एक ही हुआ करती थी. हाँ, लड़कियों के बैठने के लिए आगे की एक-दो पंक्तियाँ आरक्षित कर दी गयी थीं. तो भी, दूसरे गाँव की लड़कियां यहाँ पढ़ने के लिए नहीं आती थी. कुछ-कुछ लड़कियां उम्र में हम बच्चों से बहुत बड़ी होती थीं. बाद में पता चला कि वे लड़कियां शादी से पहले चिट्ठी पढ़ने-लिखने भर की विद्या अर्जित करने आती थीं. छतरबली माट्साब न तो खुद कभी स्कूल से नागा होते थे और न किसी छात्र को नागा होने की ईजाज़त देते थे. उन्होनें तो एक तरह से अपना फ्लाईंग स्क्वैड ही बना रखा था. इधर हाजिरी खत्म हुई, उधर फ्लाईंग स्क्वैड बच्चों की धर-पकड़ के लिए अलग-अलग गांवों की ऑर निकल पड़ता. घंटे-अधघंटे में फ्लाईंग स्क्वैड गैरहाज़िर बच्चों को भेंड-बकरियों की तरह हांकते हुए स्कूल धमक पड़ते. फिर उनमें से कोई मुर्गा बनता, कोई पिटाई खता और कोई डांट-डपट सुनकर ही छुटकारा पा लेता. सजा छात्र की अनुपस्थिति की आवृति के अनुपात के मुक़र्रर की जाती. लेकिन इस वाकये की सबसे दिलकश बात कुछ और हुआ करती थी. जब माट्साब किसी छात्र से उसकी अनुपस्थिति का कारण पूछते तो वह न जाने क्या सोचकर ऐसे-ऐसे जवाब देता कि उनपर  यकीन करना किसी के लिए संभव नहीं जान पड़ता. मिसाल के लिए कोई कहता, "माट्साब, हम त स्कूल आवते रहीं, बाबुएजी नु बैल पहुँचावे खातिर पछिमभर के बधार में भेज देलन?'  &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;आज अगर कोई मुझसे पूछे की अह्पुरा प्राईमरी स्कूल के बारे में दो अच्छी बातें क्या थीं तो मैं निःसंकोच कह सकता हूँ कि एक तो शिक्षक की मर्यादा पूरे गाँव के लिए सर्वोपरि थी और दूसरे स्कूल के माहौल में सीधे रूप से जातियों का प्रभाव परिलक्षित नहीं होता था. चूंकि तब सरकारी स्कूल के अलावा कहीं कोई तथाकथित इंग्लिश मीडियम स्कूल नहीं थे, इसलिए लोगों के सामने शिक्षा के क्षेत्र में अपनी हैसियत दिखाने का कोई दूसरा जरिया भी नहीं था. क्या गरीब, क्या अमीर सबके बच्चे इसी स्कूल में पढ़ते थे. लेकिन आज स्थिति बिल्कुल बदल चुकी है. बिहार और उत्तरप्रदेश के अपने अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि इन स्कूलों का अछूतीकरण कर दिया गया है. आज सरकारी स्कूलों में सिर्फ गाँव के दलित बच्चे पढ़ते हैं या वे बच्चे जिनके मां-बाप के पास निजी स्कूलों की फीस देने की कुव्वत नहीं है. सन्देश का मिडिल स्कूल तो मेरी नज़रों के सामने अपनी अधोगति केपी प्राप्त कर रहा था. पुराने हेडमास्टर जिनके बारे में कई-कई किंवदंतियाँ ईलाके में मशहूर थीं, अवकाशप्राप्त हो चुके थे. उनकी ज़गह जो नए हेडमास्टर आये वे स्कूल का रुतबा कायम नहीं रख सके. प्राईमरी स्कूल के विपरीत, मिडिल स्कूल में मुझे साम्प्रयादायिक रुझान के दर्शन हुए थे.  &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;एक वाकया  यहाँ गौरतलब है. जब मैं सातवीं क्लास में था तो मेरे स्कूल में एक उर्दू शिक्षक की नियुक्ति हुई थी. हम उन्हें मौलवी साहब कहते थे. कई बच्चे उनसे फूहड़ शरारत करने से बाज़ नहीं आते थे. एक दफा उनने हेडमास्टर साहेब से शिकायत भी की. किन्तु कुछ न हुआ. उल्टे उन्हें सुझाया गया कि बेहतर यही होगा कि वे अपना स्थातान्तरण किसी मुस्लिम स्कूल में करा लें.   दूसरी तरफ, लालाजी माट्साब के लिए स्कूल के ही दो कमरों को अलग कर उनके परिवार के घर बना दिया गया था. लालाजी स्कूल की ज़मीन पर साग-सब्जी की खेती भी करते थे और स्कूल के फलदार वृक्षों पर भी उन्हीं का अधिकार था. बता दू कि लालाजी यह सब लाठी के जोर पर नहीं कर रहे थे, अपितु स्कूल की प्रबंधन समिति ने हे उन्हें सुविधा मुहय्या कराइ थी. लालाजी का परिवार बड़ा था और आमदनी छोटी, इसीलिए उनके लिए एक खास सहानुभूति सबके मन में थी.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;आरा जैन स्कूल के बारे में विस्तार से फिर कभी बताऊंगा. &lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt; &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;वीरेंद्र  &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; &lt;br /&gt; &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-1689445360300371792?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/1689445360300371792/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=1689445360300371792' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/1689445360300371792'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/1689445360300371792'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/04/blog-post.html' title='कैसा था गाँव का स्कूल ? बिहार विमर्श : अथ स्कूल कथा - भाग दो'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप 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निकलकर पहले दिल्ली विश्वविद्यालय और बाद में जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय पहुंचा था. कह दूं कि यह सफ़र जितना लम्बा है, मेरी स्मृति उतनी ही कमज़ोर.  ऊपर से यह  धर्मसंकट अलग कि क्या याद करुँ, क्या भूलूँ.  आप निःसंकोच हमारे साथ एक सहयात्री की तरह इस सफ़र में शामिल हो सकते हैं. मैं कोशिश करूँगा कि इस सफ़र के खास लम्हों से आपको रू-ब-रू करता हुआ चलूँ. )&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;तो आइये, सबसे अहले मैं आपको अपने गाँव के प्राईमरी स्कूल ले चलूँ. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;गाँव के पूरब में अवस्थित इस स्कूल की स्थापना सन् १९३७ में की गयी थी. छठे दशक के पूर्वार्द्ध तक इस स्कूल में एक ही कमरा हुआ करता था जिसमें पॉँच-पॉँच कक्षाएं चलती थीं.  नियुक्ति तो तीन शिक्षकों की थी, किन्तु उनमें से नियमित रूप से एक ही शिक्षक आते थे. यह जो आपके सामने बिना छत की अधगिरी दीवारें खड़ी हैं, कल वहां एक कमरा हुआ करता था जिनमें मास्टर  साहब लोग कभी-कभी गाँव के लोगों के साथ मिलकर बीडी पीते या बतियाते थे. प्राईमरी स्कूल में मैं क्या पढ़ता था और क्या पढाया जाता था, मुझे अब कुछ भी याद नहीं है. हाँ, इतना ज़रूर याद है कि मैं तबतक हिंदी पढ़ना-लिखना और गणित का जोड़-घटाव-गुना-भाग करना सीख गया था. अलबत्ता, अंग्रेजी अबतक गधे की सिंग की तरह मेरे जीवन से गायब थी. जैसा कि मैं पहले बता चूका हूँ, इस स्कूल में नियमित रूप से एक ही शिक्षक उपलब्ध रहते थे और वही हमें सभी विषय पढाते थे. नाम था छतरबलि. उनका गाँव भी हमारे गाँव के जेवार का हिस्सा था. वे जाति के भूमिहार थे, समृद्ध थे और मेरे गाँव के समृद्ध परिवारों से उनकी भवधी चलती थी. स्कूल के अन्दर भी उनका व्यवहार भवधी के हिसाब से ही चलता था. पुरावारी पट्टी के बच्चे उनके विशेष कृपापात्र होते थे क्योंकि इन्हीं परिवारों की ओर से उनके मध्यान्ह भोजन का बंदोबस्त किया जाता था. मैं बता दूं कि मेरे गाँव में राजपूतों की पांच पट्टियाँ हैं जिनमें धनबल के हिसाब से पुरावारी पट्टी सबसे आगे था. मैं बिचली पट्टी का था और इस पट्टी में मास्टर छतरबलि का कोई मुरीद नहीं था. चूंकि मेरे बड़े भाई ने स्कूल जाकर वार्षिक चौक-चंदा की मनाही कर दी थी, इसलिए मैं माट्साब की आँखों की किरकिरी बन गया था. वे गाहे-बगाहे मेरे खिलाफ कोई न कोई मुद्दा तलाशते रहते थे. अब मुझे लगता है कि अगर मैं अन्य विद्यार्थियों से पढाई में बहुत अच्छा न होता तो इस स्कूल में मेरा टिके रहना संभव न हो पता. फिर भी, उन्होनें मेरा नाम दूसरी कक्षा में ही कट गया था क्योंकि मेरे घर से उन्हें चौक-चंदा की राशिः नहीं मिली थी. मैं परीक्षाएं देता रहा किन्तु परीक्षाफल में मेरा नाम हमेशा नदारद रहा. मेरी स्थिति रामजी, मुन्नीलाल और चान्ददेव से सिर्फ एक मायने में बेहतर थी कि उनकी तरह मुझे मास्टर साहब का पैर नहीं दबाना पड़ता था. बिल्कुल सही समझा आपने, रामजी जाति का लोहार था, मुन्नीलाल दलित और चान्ददेव कुर्मी था. अव्वल तो वे पढ़ने में रामभरोसे थे और दूसरे उनके घर चौक-चंदा की टोली भी नहीं पहुंचती थी.   &lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt; &lt;br /&gt;यह सब देखकर मेरा मासूम मन हमेशा बेचैन रहता था, किन्तु करुँ तो क्या करुँ? मैंने पिताजी से शिकायत की कि परीक्षा में अव्वल आने के बाद भी मेरा रिजल्ट नहीं निकला और नथुनी ठाकुर के बेटे सुरेश को प्रथम घोषित कर दिया गया. पिताजी आग-बबूले ही गए और नेताजी (शहीद वीरबहादुर सिंह जिन्हें गाँव के ज़मींदारों ने ही १९७१ में हत्या कर दी थी) के पास फरियाद करने पहुँच गए. नेताजी ने स्कूल इंस्पेक्टर से शिकायत की और वे एक दिन स्कूल आ पहुंचे. गाँव के लोग भी उपस्थित थे. मैं तब चौथी कक्षा में था. गाँव के लोगों में पुरवारी पट्टी के लोग भी थे जो माट्साब के हिमायती थे. नेताजी ने मुझसे कहा कि मैं अपनी बात खुद कहूं. मैंने हु-ब-हू सबकुछ बता दिया. वह दिन आज भी मेरी आँखों में बसा हुआ है. मैंने अपने जीवन का पहला भाषण उसी दिन दिया था. पुरवारी पट्टी के लोगों के अलावा सबने ताली बजाकर मेरा प्रोत्साहन किया और मास्टर छतरबलि के खिलाफ कार्रवाई हो गई. उनका तबादला कहीं और कर दिया गया. मैं आज भी अपने इस कृत्या पर गौरान्वित महसूस करता हू क्योंकि उस दिन के बाद स्कूल में छात्रों से पैर दबवाने और चौक-चंदा की परंपरा का अंत हो गया.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;चूंकि इस स्कूल में सिर्फ पांचवीं कक्षा तक ही पढाई होती थी, इसलिए मैं भी १९७३ में इस स्कूल से फारिग होकर सन्देश के मिडिल स्कूल में आ गया. मिडिल स्कूल सन्देश में था और तब सन्देश धीरे-धीरे एक चट्टी के रूप में तब्दील हो रहा था. सप्ताह में दो बार साप्ताहिक हाट तो लगते ही थे, चाय-पानी की स्थाई दुकानें भी खुल गयीं थीं जिसमें अगल-बगल के गाँवों के लोग अक्सर आते-जाते चाय-नाश्ता के लिए रुकते थे. इसके अलावे, यहाँ कपड़े, बर्तन और गहने की दुकाने भी थीं जो  शादियों के मौसम में विशेष रूप से गुलज़ार हो जाया जरती थीं. सन्देश का थाना बिहार के पुराने थानों में से एक था जिसके बाजू में ब्लाक डेवलपमेंट ऑफिस भी खडा हो गया था.  गाँव की पाठशाला से निकलकर सन्देश आना हम सभी बच्चों के लिए एक रोमांचकारी अनुभव सिद्ध हुआ. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सन्देश के मिडिल स्कूल के चारों तरफ चहारदीवारी थी जो कई-कई ज़गहों पर टूटी हुयी थी. हम इनका इस्तेमाल पलायन-मार्ग के रूप में करते थे. वैसे, अगर चहारदीवारी टूटी न भी होती तो भी हमें कोई विशेष असुविधा न होती. अव्वल तो कोई भी टीचर दोपहर बाद स्कूल में रहता नहीं था और अगर कोई भूला-भटका रह भी गया तो उनकी दिलचस्पी जम्हाई लेने में ज्यादा और पढाने में कम होती थी. दोपहर के बाद हमारा मिडिल स्कूल वीरान हो जाता और स्कूल के पीछे का मैदान बच्चों के शोर से गुलज़ार. मुझे बहुत दिनों तक लगता रहा कि  मिडिल स्कूल की पढाई आधे दिन की ही होती है. खैर, हम बच्चों को इस अधदिनिं स्कूल पर फक्र था क्योंकि हमें खेलने की पूरी आज़ादी मिल जाती थी. रामलीला मास्टर साहब बगल के गाँव के थे और उनका दबदबा पूरे स्कूल पर तारी था. मजाल कि हेडमास्टर भी चूं कर सके. वे साल भर बच्चों के लिए कुछ करें या न करें, वार्षिक परीक्षा के समय वे अतिरिक्त सतर्क हो जाते थे और चाहते थे कि उनके स्कूल के बच्चे किसी से पीछे न रहे. सो, बिन मांगे ही हम बच्चों की मुराद पूरी हो जाती और सबको परीक्षा भवन के अन्दर किताबें लाने और नक़ल करने की छूट मिल जाती. इस तरह हम विधाता की की मर्ज़ी से मिडिल स्कूल भी पास कर गए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं अक्सर सोचता कि जब मिडिल स्कूल की पढाई भी इतनी आसान और सस्ती थी, तो मेरे प्राईमरी स्कूल के कुछ साथी मिडिल स्कूल तक आने से क्यों कतरा गए? जातियों के आधार पर अगर आज मैं अपने बिछुडे साथियों का हिसाब लागौऊँ तो स्पष्ट हो जायेगा की उनमें से अधिकाँश दलित जातियों के बच्चे थे जिनके लिए पढाई का वह महत्व नहीं था जो अन्य बड़ी जाति के बच्चों के लिए था. शैक्षणिक परंपरा से लैश समुदाय के लिए शिक्षा की परंपरा का निर्वहन करना आसान तो होता ही है, ज़रूरी भी होता है. पंडित का बेटा अनपढ़ रह जाये तो बिरादरी के लिए कलंक है जबकि दलित का छोरा पढ़ ले तो दूसरों की आँख की किरकिरी बन जाये. खैर......  &lt;br /&gt;मुझे सन्देश के हाई स्कूल में पढ़ने का मौका नहीं मिला क्योंकि मैं मिडिल स्कूल में पढ़ते हुए राष्ट्रीय ग्रामीण छात्रवृति की परीक्षा उतीर्ण कर जिले के तीन चयनित स्कूलों में से किसी एक में दाखिला लेने का हक़दार हो गया था. चूंकि आगे की पढाई फोकटिया यानी छात्रवृति के पैसे से संभव थी, इसलिए बिना उंच-नीच सोचे मेरे घरवालों ने भी मुझे आरा शहर के जैन स्कूल में दाखिला दिला दिया.  इस तरह १४-१५ बरस की उम्र में मुझे शहर देखने का पहला मौका मिला. पहली बार जाना कि रेलगाडी कैसी होती है, कि उसमें से कैसे फक-फक धूंआँ निकलता  है. पक्की सड़क भी मैंने पहली बार आरा में ही देखी थी. आरा आने से पहले मेरे मन में शहर के बारे में कई-कई छवियाँ बसी हुई थीं. मसलन, मैं मानता था कि शहर के लोग सिर्फ हिंदी बोलते हैं, धोती-कुर्ता के बजाय पैंट-शर्ट पहनते हैं और औरतें भी किसी मर्द के सामने घूंघट नहीं डालतीं.  इसीलिए मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगा था जब मैंने देखा कि आरा शहर में भी लोग वही भोजपुरी बोल रहे हैं जो गाँव के लोग बोलते हैं. और तो और, यहाँ भी लोग धोती-कुर्ता पहने पहलवानी अंदाज़ में इधर से उधर डोल रहे हैं. मन में बसे शहर की छवि पर यह पहला तुषारापात था. लेकिन शहर का स्कूल, क्या कहने!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;हरप्रसाद दास जैन स्कूल, आरा में नामांकन क्या हुआ, मेरी तो ज़िन्दगी ही बदल गयी. पहली दफा लगा कि स्कूल खेलने की ज़गह न होकर पढ़ने की ज़गह होती है. समय पर स्कूल खुलता था, समय पर शिक्षक कक्षा में आते थे और परीक्षा से पहले अनिवार्य रूप से पाठ्यक्रम पूरे कर लिए जाते थे. यही कारण था कि इस स्कूल में प्रथम श्रेणी कोई खास बात नहीं मानी जाती थी. प्रथम श्रेणी तो तकरीबन सभी छात्रों को मिल जाती थी, इसीलिए नाम सिर्फ उसका होता था जो अपनी कक्षा में प्रथम, द्वितीय अथवा तृतीय स्थान प्राप्त करता था. पढाई की गुणवत्ता ऐसी कि निजी ट्यूशन की ज़रुरत ही नहीं पड़ती थी. मैं आज भी मानता हूँ कि जिस स्कूल के शिक्षकों की याद हमारे मन में स्कूल छोड़ने के बाद भी शेष रह जाती, वह स्कूल अच्छा होता है. अजित सिंह, रामजी बाबु, आकारान्ताजी, रमाकान्तजी, मधुकरजी जैसे शिक्षकों के नाम क्या मैं आज भी भूल पाया हूँ? मेरा एक-एक रोम उनका आज भी ऋणी है. &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;आज जब पलटकर देखता हूँ तो लगता है कि ऐसे स्कूल ही बिहार के लिए आदर्श स्कूल हो सकते हैं. यानी, सस्ता, सुन्दर और टिकाऊ. हाँ, एक चीज़ की कमी अवश्य खटकती थी. स्कूल के पास कोई अपना खेल मैदान नहीं था, न ही स्कूल प्रशासन उसकी कोई ज़रुरत ही समझता था.  नतीज़तन, खेल-कूद में इस स्कूल के छात्र फिसड्डी साबित होते थे. अनुशासन के नाम पर बरती जानेवाली सख्ती कभी-कभी बर्दाश्त से बाहर हो जाती थी. कुछ शिक्षक तो निर्दयता और सख्ती के बीच अंतर ही नहीं जानते थे. इन सबके बावजूद, यह स्कूल इतना अच्छा होते भी सबकी पहुँच में था. जो फीस सरकारी स्कूलों में लगती थी, वही फीस यहाँ भी लगती थी. लेकिन शिक्षा की क्वालिटी में ज़मीन आसमान का अंतर. चूंकि हम छात्रवृति प्राप्त छात्र थे, इसलिए छात्रवृति की शर्तों के अनुसार हमें हॉस्टल में रहना होता था. जी, अब मुझे भी मालूम है कि वह हॉस्टल पब्लिक स्कूलों के हॉस्टल की तुलना में हॉस्टल नहीं था. लेकिन, हमें उससे कोई शिकायत नहीं थी. हॉस्टल का घटिया खाना हम जिस उत्साह के साथ खाते थे, उसे देखकर कोई अज़नबी कह सकता था हमें सिर्फ भूख का स्वाद पता था, जीभ का नहीं. सच भी यही था, हॉस्टल में कितने बच्चे ऐसे परिवारों से आये थे जहाँ दो जून की रोटी भी आसानी से मयस्सर नहीं होती होगी. इसी परिवेश में रहते हुए एहसास हुआ था कि शिक्षा की डोर पकड़कर ही विकास के मार्ग पर अग्रसर हुआ जा सकता है; कि और कोई दूसरी राह नहीं है. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;( अब यहाँ थोडा विश्राम कर लिया जाये. आगे की कथा स्कूल से निकालकर कॉलेज और विश्वविद्यालय में कही जायेगी. आप हमारे साथ बने रहिये अगले इतवार तक)&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;वीरेन्द्र&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-5735705650307783920?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/5735705650307783920/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=5735705650307783920' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/5735705650307783920'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/5735705650307783920'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/03/blog-post_28.html' title='बिहार विमर्श -५ : अथः स्कूल कथा'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-6521194737486842656</id><published>2009-03-23T12:25:00.000-07:00</published><updated>2009-03-23T12:53:02.705-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जे एन यू'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बिहारी छात्र'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दिल्ली विश्वविद्यालय'/><title type='text'>बिहार विमर्श - 4 : दिल्ली के कॉलेज ,  यूनिवेर्सिटीयों में आना बिहारी छात्रों का</title><content type='html'>दिल्ली विश्वविदयालय में बिहारी छात्रों का आगमन 70 के उत्तरार्द्ध में शुरू हुआ . 1974  के  बिहार आन्दोलन  और  बाद के  घटनाक्रम ,छात्रों के पलायन की फौरी वजह बने .पर  सातवें दशक की  धीमी शुरुयात  ,आठवें दशक के मध्य तक बबंडर का रूप ले लिया .  और दिल्ली  व  जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के छात्रवास इस भीड़ के लिए प्रयाप्त नहीं रह गए थे .&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;p&gt;दिल्ली विश्वविद्यालय और जे एन यू के तत्कालीन अकादमिक माहौल की कम से कम तुलानातामक तौर पर जितनी भी तारीफ़ की जाय कम है. देश की राजधानी और उसके सिरमौर कॉलेज और विश्वविद्यालय . संसाधनों और योग्य शिक्षकों से भरे - पूरे. पढ़ाई - लिखाई का खर्च , पटना , भागलपुर अथवा मुजफरपुर से थोडा ज्यादा पर prohibitive नहीं. और  अगर दिल्ली प्रवास का खर्च , हैसियत और  औकात से फाजिल हुआ तो शहर सिखावे कोतवाली की तर्ज पर टीयुसन आदि से रहने और पढ़ने लायक जुगाड़ किया जा सकता  था .&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कॉलेज और विश्विद्यालय में आकर्षण के हजार विन्दु और बहाने.जिस ओर भी दिल करे बढ़ने और बिगड़ने के हज़ार रास्ते.  पढ़ने का मन करे पढिये , उम्दा सरकारी नौकरियों की तैयारी करिए . राजनीति में शामिल हों या कैम्पस  में बिखरी सुन्दरता को फटी निगाहों से दूर से निहारते हुए  अपने पर इमोशनल अत्याचार करते रहिये  या फिर सुन्दरता को हथियाने का प्रयास कीजिये . सब कुछ संभव था और ये लड़के सब ओर लगे थे.&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;हाँ , बीच - बीच में बिहारी पहचान  और इस पहचान के कारण &lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;तिरस्कार , उपहास और अपमान से भी जूझना पड़ता था &lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;दिल्ली के आधुनिक और तिलस्मी चकाचौंध के इस माहौल में अक्सरहां प्रतिक्रियावादी &lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;गुटों से निबटना भी पड़ता था .मार - पीट की नौबत बेवजह  आ जाती थी .&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt; सारांश यह की  व्यक्तिगत और सामुदायिक तौर पर बिहारी छात्रों को दिल्ली में बहु आयामी संघर्ष करते हुए आगे बढ़ना था.&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;दिल्ली में रहने , जीने  और पढने के दरम्यान खास जद्दो - जहद से रु - ब्-  रु होना पड़ रहा था . पर यह सब &lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;ख़ास मकसद और उम्मीद के साथ ये नौ जवान कर रहे थे .&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;परदेस में रहना भावनत्मक तौर पर सुखद कभी नहीं होता .अपने और पराये का भेद बना रहता है .अपने और पराये दोनों को टीसते हुए .यही हाल बिहारी छात्रों का था .&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;p&gt;पर घर वापसी का विकल्प करीब करीब बंद था .क्योंकि  बिहार के कॉलेज और विश्वविद्यालय अपने भयावह दौर से गुजर रहे थे . भ्रष्टाचार , हिंसा और शैक्षणिक कदाचार सर्वव्यापी होता जा रहा था .कॉलेज में जातीय गिरोहों का बोलबाला हो गया था .  होस्टल्स जाति गत आधार पर मिलने और बंटने लगे . हॉस्टल मेस भी जातिगत आधार पर बाँट गए.यह गिरोहबंदी छात्रों से लेकर प्राध्यापकों तक सब जगह कायम हो गयी.&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस  दरम्यान  जनता पार्टी की सरकार ने 1978 - 79 में शिक्षा और राज्य सरकार की नौकरियों में पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया . आरक्षण के सवाल ने तो पूरे माहौल को ऊपर से नीचे तक विषाक्त कर दो धडों में बाँट दिया .&lt;/p&gt;&lt;p&gt;याद करें यही वह दौर है जब खास विश्वविद्यालय और कॉलेज खास जातियों के कहे जाने लगे . शिक्षक और कर्मचारियों की ही नहीं बल्कि कुलपतियों की नियुक्ति की प्रथम कसौटी जाति बन गयी.छात्रों में आपसी मार - पीट ,गोली बारी  से शुरू होकर हत्या और वाकायदा संगठित  अपराधी गिरोह बनने  और बनाने तक पंहुच गयी. परीक्षा कोई भी हो मेधा  सूची में अव्वल विभाग अध्यक्ष का पुत्र, पुत्री या रिश्तेदार हीं होगा.मतलब यह की पढ़ने , पढाने सब में हिंसा और जातिवादी जहर साफ़ साफ़ दिखने लगा .1974 का बिहार आन्दोलन जिन चीजों के विरोध में था वे &lt;span style="color:#000099;"&gt; प्रवृतियां  ख़तम या कमजोर होने की  वजाय  80 के दशक में तीक्ष्ण  काउंटर अटैक  लॉन्च कर  दी .&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt; सवाल यह है कि 1975 से लेकर 1990 तक ,बिहार   के कॉलेज और विश्विद्यालयों में  क्या - क्या हो रहा था ?&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;p&gt;पैरवी , पैसे और जातिगत गिरोहबंदी द्वारा शिक्षा और मेधा की कैसी मूर्तियाँ और प्रतिमान गढे जा रहे थे ?&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;अगर सच - सच लिखा जाय तो आज से 25 -50 साल बाद की पीढी कहीं इन्हें अतिशयोक्ति न मान ले .&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;उन  तत्कालीन परिस्थितियों कि बिहारी छात्रों के दिल्ली पलायन में कितनी मत्वपूर्ण भूमिका रही इसका समग्र - आर्थिक और  सामजिक विश्लेषण तो दूर , उन परिस्थितियों को पूर्ण समग्रता में रिकॉर्ड भी नहीं किया ग&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;या है.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-6521194737486842656?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/6521194737486842656/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=6521194737486842656' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/6521194737486842656'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/6521194737486842656'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/03/4.html' title='बिहार विमर्श - 4 : दिल्ली के कॉलेज ,  यूनिवेर्सिटीयों में आना बिहारी छात्रों का'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-4059085577013060332</id><published>2009-03-20T08:36:00.000-07:00</published><updated>2009-03-20T08:48:21.643-07:00</updated><title type='text'>माँ का घर और माँ की स्मृति</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/ScO5Y632ZUI/AAAAAAAAAD0/zJH7fOGX2_g/s1600-h/Agra_ghar+030.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5315295822998824258" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/ScO5Y632ZUI/AAAAAAAAAD0/zJH7fOGX2_g/s320/Agra_ghar+030.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;माँ को गुजरे हुए डेढ़ दशक हो गया . एक दुर्घटना में माँ अचानक चल बसी .  मार्च के महीने में माँ रोजाना याद आती है .&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पिछले जून में घर से लौटते समय रास्ते में  माँ के घर पर नजर  पड़ी  . घर का वर्तमान मन में कहूं तो यादों की बारात ले आया . साथ में कैमरा था .सोचा दूर से ही सही इसकी एक तस्वीर उतार लूं . &lt;/div&gt;&lt;div&gt;घर १९३४ में मेरे नाना ने बनबाया था .  उस दौर में   इलाके  भर में  इकलौता भव्य मकान . बैठक खाने की फर्श में संगमरमर का काम .उसके एक साल बाद माँ का जन्म हुआ .संयुक्त परिवार - दो भाईयों के  बीच में  नौ संताने , माँ आठवें नंबर पर .कुल चार भाई और पांच बहनें . कहते हैं की माँ के जन्म के बाद मेरे ननिहाल में धन और यश दोनों की भारी वृद्धि हुई .फतुहा , कलकत्ता से लेकर ढाका तक से व्यापार हुआ .ग्रामीण और कस्बाई समाज में शानो शौकत के सारे संसाधन जुटाए गए .  १९४२ तक शहर में ठौर ठिकाना , घोड़ा ,बन्दूक  , जमींदारी , बड़े संतान की  B H U से वकालत की पढ़ाई . चार भाईयों में , वकील , किसान ,प्रोफ़ेसर और डॉक्टर बने .माँ से बड़ी तीन बहनों की शिक्षा  पांचवी तक पाठ शाले पर और १९३८ तक उन सब की शादी . दो बहनें  खगडिया के एक प्रगति शील समृद्ध परिवार men शादी . परिवार स्वतन्त्रता  men भी शरीक रहा .  यह  परिवार  राजनीति में बारास्ता विधायक ( पांच बार ) मंत्री पद तक पंहुचा .माँ से ठीक बड़ी बहन   की शिक्षा सन चालीस से चौआलिस तक पटना के एकमात्र बालिका आवासीय विद्यालय में हुई. &lt;/div&gt;&lt;div&gt;सन पचास के बाद भी माँ के  घर के वारिशों का रसूख बढ़ता रहा . दूसरी पीढी  ने भी  तरक्की  की .डॉक्टर , प्रोफ़ेसर , व्यापार , बहुराष्ट्रीय कम्पनी सब ओर.&lt;/div&gt;&lt;div&gt;माँ इसी घर में पली और बढ़ी .लेकिन आज माँ के घर की हालत देखिये .&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ऐसा नहीं है की इस घर को वारिसों ने बेंच दिया है .&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मालिकान हक़ बरकरार है  . आज भी धन धान्य से परिपूर्ण .अर्थ , शिक्षा ,राजनीति और सामजिक हैसियत .&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पर यह पारिवारिक विरासत बदहाल क्यों ?&lt;/div&gt;&lt;div&gt;क्यों इसकी तस्वीर धुंधली लगती है ? &lt;/div&gt;&lt;div&gt;क्या समय के साथ माँ की पुण्य स्मृति भी उसके घर  की तरह धुंधली पड़ जायगी ?&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सच कहूं सोच कर डर लगता है.&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-4059085577013060332?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/4059085577013060332/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=4059085577013060332' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/4059085577013060332'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/4059085577013060332'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/03/blog-post_20.html' title='माँ का घर और माँ की स्मृति'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/ScO5Y632ZUI/AAAAAAAAAD0/zJH7fOGX2_g/s72-c/Agra_ghar+030.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-7261526403641766603</id><published>2009-03-16T10:40:00.000-07:00</published><updated>2009-03-16T10:52:59.898-07:00</updated><title type='text'>बिहार विमर्श (२)  - दिल्ली में बिहारी: घर के न घाट के</title><content type='html'>&lt;span class=""&gt; &lt;span style="color:#000099;"&gt;वीरेन्द्र  - बिहार विमर्श की दूसरी किस्त . विमर्श में आपकी भागीदारी हमारे सत्य शोधक प्रयास बहु आयामी और कारगर बनाएगा .&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt; &lt;span style="color:#006600;"&gt;( मित्र&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt; ,बिहार पर जारी विमर्श में दोबारा और उतावाली में कूदने का दोषी तो हूँ, लेकिन करुँ  तो क्या करुँ? किसी और आहर-पोखर के भूगोल से उतना वाकिफ भी तो नहीं हूँ. अब चाहे जो हो, अग्नि-स्नान से बच तो नहीं सकता. तथास्तु. )&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;दिल्ली में बिहारी: घर के न घाट के&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;कहते हैं कि दिल्ली पर बिहारियों ने नए सिरे से आक्रमण कर दिया है. कभी शेरशाह ने दिल्ली पर अपना झंडा गाडा था और हिंदुस्तान का शहंशाह बन बैठा था. अलबत्ता, वह ज्यादा दिनों तक दिल्ली की गद्दी पर विराजमान न रह सका और एक दुर्घटना में उसका इंतकाल हो गया. वह पहला और अबतक का अकेला ऐसा बिहारी था जिसने दिल्ली पर अपनी साख जमाई थी. उसके  बाद किसी भी बिहारी में इतनी सामर्थ्य नहीं हुयी कि वह दिल्ली पर अपना रॉब गाँठ सके.&lt;br /&gt;किन्तु, भारत की आज़ादी एकबार फिर बिहारियों के लिए वरदान साबित हुयी है. जब से आज़ादी मिली है तब से हर बिहारी, चाहे वह गाँव में रहता हो या कस्बे में, एकबार दिल्ली की तरफ कदम बढा ही लेता है. गाँव-देहात के निपट अनाडी से लेकर पढ़े-लिखे तक, सब मुंह उठाये दिल्ली की तरफ कूच कर गए हैं. आज स्थिति क्या है? जहाँ देखो, वहीं बिहारी. सड़क पर चलने का शहूर नहीं, फिर भी माथे पर पूरा घर लादे ये बिहारी आज दिल्ली के गली-कुचों में धमाल मचाये हुए हैं.  क्या सचमुच इसे आक्रमण कहा जा सकता है? दिल्ली के गली-कूचे में भरे पड़े बिहारियों के चेहरे पर हमें जिस दैन्य-भाव के दर्शन होते हैं, उन्हें देखकर तो नहीं कहा जा सकता कि ये आक्रमणकारी हैं.  यह किसी को बताने की जरूरत नहीं है कि आक्रान्ता के चेहरे पर दैन्य का भाव नहीं, अपितु उन्माद का भाव होता है. कोई उसकी खिल्ली नहीं उडाता. उल्टे, उससे हर आदमी भय खाता है और ताक में रहता है कि कोई मौका मिले और वह जान बचाकर रफूचक्कर हो जाये. क्या शेरशाह की खिल्ली उडाई गयी होंगी दिल्ली में?  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में यह पूछना गैरवाजिब नहीं होगा कि क्या  क्या सचमुच दिल्ली बिहारियों से त्रस्त है? जो रसूखवाले हैं या जो यह समझते हैं कि शिष्टता उनकी पुश्तैनी चीज़ है, वे सचमुच बिहारियों के चाल-चलन से परेशान हैं.  उनके जाने, ये बिहारी फूहड़, बदमिजाज़ और अव्वल दर्जे के बेवकूफ हैं. ये दुल्हन रुपी दिल्ली के दामन पर काले धब्बे हैं. इन्हें यहाँ से हटाये बगैर न तो दिल्ली को वर्ल्ड क्लास का शहर बनाया जा सकता है और न ही उसे लानत-मलामत से महफूज़ रखा जा सकता है. मैं पढ़ा-लिखा आदमी हूँ और जानता हूँ कि बिहारी शब्द गाली नहीं है, अपितु एक विशेषण है जो बिहार से बना है. यानी, बिहार का रहनेवाला बिहारी है, ठीक उसी प्रकार जैसे पंजाब   का रहनेवाला पंजाबी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन, एक बिहारी होने की वज़ह से जानता हूँ कि दिल्ली में बिहारी का मतलब क्या होता है. स्नातकोत्तर की पढाई दिल्ली में पूरी करने की हसरत लिए जब मैं पच्चीस साल पहले दिल्ली आया था तो सोचा था कि पढाई पूरी होते ही बिहार लौट जाऊंगा. पहली हसरत तो जैसे-तैसे पूरी हो गई किन्तु दूसरी हसरत अभी तक मृग-मरीचिका ही साबित हुई है. अब लौटूं भी तो किस बुतात पर? न घर में इतनी खेती-बारी है कि गाँव जाकर खेती कर लूं, न ही पुरुखों ने कोई ऐसा धंधा-पानी छोडा है कि जाकर उसे सम्हाल लूं. नतीजतन, मन मारकर दिल्ली में ही रोज़ी-रोटी कमाकर जीने के लिए विवश हूँ. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस दिल्ली ने कभी अपने आगोश  में  दुनिया भर के आक्रान्ताओं को पनाह दी थी वही दिल्ली आज बेबस-बेहाल बिहारियों के लिए इतनी तंगदिल हो गई है कि पनाह देने की बात तो दूर, सीधे मुहं बात करना भी गवारा नहीं करती. दिल्ली की समस्यायों पर जब भी कोई चर्चा होती है तो बिहारियों का नाम जरूर लिया जाता है. दिल्ली आज आबादी के भार से बेहाल है तो बिहारियों की वज़ह से, दिल्ली अगर आज शरीफों के लिए सुरक्षित नहीं रह गई है तो बिहारियों की वज़ह से और कल अगर दिल्ली किसी के काम की नहीं रह पाई तो भी बिहारी ही दोषी माने जायेंगे. मुंबईवाले 'एक बिहारी सौ बीमारी' का जूमला जड़ते हैं तो दिल्लीवाले सिर्फ बिहारी कहकर हर बिहारी के दिल को छलनी किये देते हैं.  बेबस की बेबसी का ऐसा तिरस्कार करने के बाद भी जिस दिल्ली की आंखें नम नहीं होती, वह दिलवालों की दिल्ली नहीं हो सकती.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज़रा सोचें. जो लोग बिहारियों पर आक्रमणकारी होने का तोहमत लगा रहे हैं, उन्हें यह अधिकार किसने दिया? क्या वे सचमुच समझ रहे हैं कि वे क्या कर रहे हैं. यह कैसा आधुनिक बोध है जिसमें मानवीय संवेदना के लिए कोई ज़गह नहीं है? बिहारियों की बेबसी पर अट्टहास करनेवाले ये छद्म आधुनिक वास्तव में नए रूप में ब्राह्मणी अवतार हैं. किसी की बेबसी और लाचारगी को नियत मान लेना प्रकारांतर से जाति-व्यवस्था के सिद्धांतों को नए तरीके से वैध ठहराने की कोशिश नहीं तो और क्या है? बिहारी टिड्डियों का झूंड नहीं होते कि उनके आगमन को आक्रमण मान लिया जाये. जिनकी आखें गन्दगी से परहेज़ करती हैं, उनके बाजुओं में इतनी ताक़त जरूर होनी चाहिए कि वे उस गन्दगी से निजात दिलाने में समर्थ हों. देश की राजधानी देश के किसी खास हिस्से की जनता से नफ़रत करेगी तो क्या देश सुरक्षित रह पायेगा? लेकिन पवित्रता के नामालूम-से ढेर पर बैठे शिष्ट जन को इससे क्या मतलब?  उनका घर गन्दा न हो, इसलिए उन्हें सेवक चाहिए, लेकिन सेवक की ज़िन्दगी गन्दगी से सराबोर रहे तो भी उन्हें कोई गुरेज़ नहीं. बिहारी उनके घर के बर्तन धोये, कपडे साफ करे लेकिन रहे कहीं और. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; भई, वाह! ऐसा नवाबी ज़ज्बा तो बहादुरशाह ज़फर भी नहीं रखते होंगे. अपनी अनुदारता और अकर्मण्यता को महिमामंडित करने का जैसा जटिल जतन कभी इस देश के ब्राहमणों ने किया था, कुछ-कुछ वैसा ही हमारे नए  बाजारू समाज के शिष्ट लोग भी करते प्रतीत हो रहे हैं. भलेजन, आप नहीं जानते कि आपकी चमक के लिए कितने  बेबसों को अपनी अस्थियों को भस्म करना पड़ा है. बिहारियों को टिड्डी कहकर आखिर आप किस मानसिकता का परिचय दे रहे हैं? हमने तो आपकी खिल्ली कभी नहीं उडाई, तब भी नहीं जब विदेशी आक्रान्ताओं के सामने आप खीसें निपोर रहे थे.  क्या आपकी समृद्धि में, आपकी शिष्टता में, आपकी चमक-दमक में हमारा कोई योगदान नहीं रहा है? क्या आप स्वयम्भू हैं? क्या आपको किसी से कोई लेने-देना नहीं है? अगर आपका जवाब हाँ में है तो मुझे कुछ नहीं कहना. किन्तु, अगर आप मानते हैं कि अकेला चना भांड नहीं फोडता तो मेरी गुजारिश है कि आप अपने दिल की निर्दयता को संयमित करें और मानवीय ज़ज्बे को तवज्जो दें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;वीरेन्द्र   &lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-7261526403641766603?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/7261526403641766603/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=7261526403641766603' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/7261526403641766603'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/7261526403641766603'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/03/blog-post_6952.html' title='बिहार विमर्श (२)  - दिल्ली में बिहारी: घर के न घाट के'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-3566190299410775017</id><published>2009-03-16T10:30:00.000-07:00</published><updated>2009-03-16T10:39:16.778-07:00</updated><title type='text'>बिहार विमर्श (१) -- और रोने को क्या चाहिए ?</title><content type='html'>&lt;span style="color:#000099;"&gt;वीरेन्द्र का लेख बिहार पर . &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;और रोने को क्या चाहिए?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;अगर आप बिहारी हैं; और बिहार से बाहर रहते हैं; और साल में दो-चार बार कुछ दिनों के लिए ही वहां जा पाते हैं तो मैं यकीन से कह सकता हूँ कि आपने भी बहुत कुछ ऐसा देखा सुना होगा जिसके आधार पर आप मौजूदा बिहार के समाज की सोच और उसके रुझान के बारे में कोई मत व्यक्त कर सकें. मित्र कौशल अपने ब्लॉग पर बिहार में तेजी से स्थापित हो रही एक खास तरह की वैचारिक सहमति को लेकर अपनी चिंता जता चुके हैं. चिंता इसलिए कि आज के बिहारी समाज में जो नई सहमति बनी है, उसे दुनिया का कोई देश, कोई समाज नैतिक, वैध और जायज़ नहीं समझता. यानी, बिहार नैतिकता के नए मानदंड गढ़ रहा है.अगर ऐसा है तो क्या यह चिंतनीय है? बिल्कुल है. मित्र कौशल की चिंता से मैं पूरी तरह सहमत हूँ. इस मुद्दे पर असहमति का सवाल, दरअसल में, मानवीय संवेदना के होने न होने का सवाल है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत जरूरी है कि बिहार नैतिक विपर्यय का अगुआ न बने. यह वहां की जनता के हक में नहीं होगा. इतिहास गवाह है (माफ करें, मैं यहाँ उनकी बात नहीं कर रहा जो मानते हैं कि इतिहास मर चूका है) कि कोई समाज उन्नत तभी होता है जब वहां के लोग अपने जीवन में, अपने व्यवहार में कायदा-कानून और उदात्त नैतिक मूल्य की अहमियत को समझते हैं. इस मुद्दे पर एक संजीदा विमर्श की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता. हम सब इस विमर्श में अपना अपना योगदान कर सकते हैं; बशर्ते हम इस मुद्दे पर बेहिचक कुछ कहने-सुनने के लिए तैयार हों. तो चलिए, मैं भी इस यज्ञ में अपने हिस्से की अमिधा की लकडी डाल ही देता हूँ.&lt;br /&gt;मुझे अक्सर लगता है कि बिहार के अधिकाँश लोग मानते हैं कि आज इस मुल्क में बिना बैशाखी के कोई खडा नहीं है. समाज और व्यक्ति के जीवन में जो कुछ भी होता है, जुगाड़ से होता है. परीक्षा में अच्छे अंक चाहिए तो जुगाड़, अच्छी नौकरी चाहिए तो जुगाड़, अच्छी जगह पर तबादला चाहिए तो जुगाड़, नौकरी में प्रोन्नति चाहिए तो जुगाड़ और सब कुछ गलत करते हुए भी बाला बांका न हो तो जुगाड़. यानी, दुख लाख और दवा एक. जुगाड़ में कभी कभी बेगारी करनी पड़े तो भी गिला नहीं. पढाई-लिखाई फ़क़त दिखावे की चीज मानी जाती है, डिग्री सिर्फ गेट पास है. यह कहीं से भी हासिल की जा सकती है. बिहार के लोग आप पर बरबस हंस पड़ेंगे अगर उन्हें मालूम हो जाये कि आप दफ्तर में बाबु को घूस दिए बगैर काम कराने की बात करते है. लोग छूटते ही हाथ में गंगाजल लेकर किरिया खा लेंगे और कह देंगे कि कि आप इस लोक के वासी हैं ही नहीं. मैं बिहार के एक ऑफिसर को जानता हूँ जो एकबार ऐसी ही एक बात पर विहँसने लगे थे. खैर, हम यहाँ एक या दो व्यक्तियों की बात नहीं कर रहे हैं. बात पूरे अवाम की है. अगर यह मान भी लिया जाये कि नैतिकता के मानदंड सिर्फ बिहार में ही गड्ड-मड्ड नहीं हुए हैं, तो भी क्या इसी बिना पर हम इस सवाल को दरकिनार कर देंगे? नहीं, क्योंकि आँख बंद कर लेने से ही संकट काफूर नहीं हो जाता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ कहने के बजाय मैं अपना एक तल्ख़ अनुभव बयां करना चाहूँगा. तकरीबन पांच साल पहले की घटना है. मैं अपने गाँव गया था, बिना किसी खास प्रयोजन के. हर बार की तरह इसबार भी गाँव का मेरा रूटीन वही था. सुबह नाश्ता करने के बाद दोस्तों की टोली के साथ सन्देश बाज़ार पहुँच जाना. दुर्गा साव की चाय दूकान पर चाय पीना, गाँव-जवार के अन्य लोगों से हाल-अहवाल जानना, सोने नदी के किनारे घूम आना, आकर फिर चाय पीना और दोपहर के बोजन से पहले फिर गाँव लौट आना. दोपहर में भोजन करने के बाद किसी के दरवाज़े पर किसी भी उम्र के लोगों के साथ ताश खेलना और शाम होने से पहले फिर से सन्देश बाज़ार पहुँच जाना. शुरू में तो मुझे भी इस रूटीन में कुछ अटपटा नहीं लगा, किन्तु जब इस पर गंभीरता से सोचने लगा तो मन कसैला हो उठा. मुझे लगा कि घर और बाज़ार के बीच आते-जाते गाँव के लोगों की ज़िन्दगी छीजती जा रही है. सोचा, क्यों न गाँव के नौजवानों के साथ एक बैठक कर पता लगाने की कोशिश करुँ कि आखिर उनका दुख क्या है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले दिन जब मैंने गाँव के युवकों के सामने अपनी ईच्छा का इज़हार किया तो वे मान गए. शाम में बड़का दुआर के दालान की छत पर सभी युवक इकठ्ठा हुए. बैठक की शुरुआत करते हुए मैंने उनसे कहा कि मैं अपने गाँव की सूरते-हाल से काफी निराश हूँ क्योंकि यहाँ तो खालिस निठल्लापन है. मैं आपसे जानना चाहता हूँ कि आपका असली दुख क्या है. मेरी यह बात सुनते ही उनकी आँखों में एक चमक आ गयी. मुझे इस चमक के रहस्य को समझने में देर नहीं लगी. चूंकि मैं दिल्ली से गया था और मेरे पास तब एक मुकम्मल नौकरी भी थी, इसलिए सबको यह भरोसा था कि भैया चाहेंगे तो उनके दिन भी जरूर बहुर जायेंगे. इसके पहले की बात आगे बढ़ती, वे समेवत बोल पड़े, "भैया, बेरोज़गारी ही हमारा एकमात्र दुख है. हम कुछ भी करने के लिए तैयार हैं. आप इतने बड़े पद पर हैं, आपके एक इशारे पर पूरे गाँव को नौकरी मिल सकती है. आप ही हमारे आसरा हैं. आप अवतारी हैं, इस डीह का कायाकल्प करने का मादा सिर्फ आप में है. आप अगर हमारी थोडी भी मदद कर दें तो हमारी ज़िन्दगी सुधर जायेगी".&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;युवकों के ऐसे उदगार सुनकर मैं किंकर्तव्यविमूढ़ था; समझ नहीं पा रहा था कि आखिर इनकी ऐसी कौन-सी विवशता है कि मुझे ही अवतार माने जा रहे हैं. मैंने प्रतिवाद करते हुए समझाने की कोशिश की कि इस देश में इतना ताक़तवर कोई नहीं है जो सबको नौकरी दे दे या दिला दे. मेरी बात सुनकर उनका पूरा उत्साह काफूर हो गया. कुछ देर चुप्पी के बाद एक युवक ने कहा, "अगर आपको नौकरी नहीं देनी थी तो हमें इस मीटिंग में बुलाया ही क्यों?" विकल्पहीनता की ऐसी स्थिति किसी कौम के लिए कितनी खतरनाक हो सकती है, इसे फिर-फिर बताने की जरूरत नहीं है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आत्म-शक्ति के तिरस्कार के प्रति ऐसी सहमति आपको किसी और समाज में ढूंढें नहीं मिलेगी. कहा जा सकता है कि आज का बिहारी समाज अपनी तमाम धार्मिक आस्थाओं के बावजूद गीता के उपदेश को सर के बल खडा करने की कोशिश कर रहा है. उसे फल चाहिए, करमा नहीं. उदहारण के लिए हम पढाई और कमाई की बात कर सकते हैं. आज बिहार के गाँव-गाँव में जिस तरह तथाकथित अंग्रेजी स्कूल खुल रहे हैं, उसे देखकर किसी को गुमान हो सकता है कि बिहारी समाज जल्द ही शिक्षा के क्षेत्र में नई बुलंदियों को छू लेगा. लेकिन वास्तविकता कुछ और ही बयां कराती है. जहाँ एक तरफ निजी स्कूलों और कोचिंग सेंटरों की बाढ़ आई है वहीं दूसरी तरफ सरकारी स्कूल रसातल की ओर तेज़ गति से फिसलते जा रहे हैं. यह ताज्जुब की बात है कि पूरा समाज स्कूल की शवयात्रा में शामिल है, किन्तु किसी के चहरे पर कोई मलाल नहीं. स्कूल हों न हों, स्कूल में पढाई हो न हो, शिक्षक स्कूल आये न आये, किसी को कोई परवा नहीं. परवाह है तो सिर्फ इस बात की कि इस मरुस्थल में भी उनके लाल के प्रमाण-पत्र में अच्छे अंक दर्ज हो जाएँ. और यही कारण है कि जहाँ दूसरे समाजों के विद्यार्थी और उनके अभिभावक परीक्षा के बाद शांतचित्त होकर परीक्षाफल का इंतज़ार करते हैं, हम बिहारी दूसरी तीर्थयात्रा पर निकल पड़ते हैं. यहाँ-वहां से पता करते हैं कि किस विषय की कॉपी कहाँ और किसके पास गई है. फिर जुगाड़ से यह पता करते हैं कि परीक्षक के पास किसके मार्फ़त से और क्या या कितना लेकर पहुंचा जाये. छात्र की सफलता इस बात पर निर्भर नहीं करती कि उसकी तयारी कैसी है, बल्कि इस बात पर निर्भर करती है कि उसके मां-बाप कितने जुगाड़ी हैं. दुख की बात तो फ़क़त इतनी है कि इस जुगाड़ी प्रवृति की वज़ह से पूरा समाज मदारी बनता जा रहा है और हम इसी मदारीपने में मस्त हुए जा रहे है. कमाई की बात, रोज़ी-रोटी की बात का खुलासा करने के लिए मैं अपने गाँव का हवाला पहले ही दे चूका हूँ. तो, अभी के लिए रुख्सती की इजाजत दीजिये, फिर मिलेंगे चलते-चलते, कहते-कहते.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;strong&gt;वीरेन्द्र &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-3566190299410775017?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/3566190299410775017/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=3566190299410775017' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/3566190299410775017'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/3566190299410775017'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/03/blog-post_9225.html' title='बिहार विमर्श (१) -- और रोने को क्या चाहिए ?'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-2997659886627810236</id><published>2009-03-16T03:27:00.000-07:00</published><updated>2009-03-16T03:45:41.060-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>जीना हुआ दुश्वार</title><content type='html'>&lt;span style="color:#000000;"&gt;संजीव रंजन की कविता . कविता का सन्दर्भ मित्र संजीव ने लिख भेजा है.पढें और अपनी राय से सब की हौसल अफजाई करें.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;कौशल जी, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;प्रस्तुत कविता प्रिय वीरू के हौसले का प्रतिफल है. मैंने टेलीफून पर कभी बात-चीत के दौरान उनसे अपने बालकनी के नीचे-के पार्किंग स्पेस में जड़ पकड़ रहे एक नन्हे वट वृक्ष के ताजा स्थिति का ज़िक्र किया था. उन्होंने कहा कि यह कविता-सी प्रतीत हो रही है - आप इसे कौशल जी के ब्लॉग पर भेजें. अब यह आप के हाथ में है&lt;/span&gt; :&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;strong&gt;जीना हुआ दुश्वार&lt;/strong&gt; ... &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;मेरी बालकनी के नीचे-के &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;पार्किंग स्पेस &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;मेंएक बे-आबरू कुआँ और एक नन्हा वट-वृक्ष hai &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;oopar-वाले तले का किरायदार &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;उस पर सुबह और शाम को पाइप से पतले-धार &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;कीबारिश करता हैजिससे &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;उसके अक्सर पत्ते &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;और उसका आधा से ज्यादा &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;किशोर धड &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;सतह पर भींग जाता है &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;नीचे की ज़मीन भींग जाती है,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;पर पानी-पानी नहीं होता है&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;(बदहाल ज़मीन क्षण-भर मेंपी जाती है)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;उसका बाक़ी-का मुख्य आहार &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;फिनाइल आदि के मसाले-wala &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;kachade का शोरबा है &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;अल्ल-सुबह से देर दोपहर tak &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span class=""&gt;sa&lt;/span&gt;faayee -वाले और waaliaan &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;taawad tod &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;वह शोरबा &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;गुटखे की पीक के saath &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;us नौनिहाल की जड़ में &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;पटाये जाते हैं.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;.......&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;दोपहर में &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;कभी कुछ देर तक &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;उस बेजुबान को &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;जब देखने का अवसर होता hai &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;tab लगता hai &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;ki फुन्गिओं पर कीउसकी &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;नवजात हरी pattiyaan &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;सिहर रहीं है.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;.. संजीव रंजन, मुजफ्फरपुर&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-2997659886627810236?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/2997659886627810236/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=2997659886627810236' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/2997659886627810236'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/2997659886627810236'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/03/blog-post_16.html' title='जीना हुआ दुश्वार'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-3764453504543233416</id><published>2009-03-12T10:22:00.000-07:00</published><updated>2009-03-12T10:46:13.950-07:00</updated><title type='text'>पटना शहर की मुख्य सड़क "चौक"  - इसवी सन 1814,  सीता राम की कलाकृति</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SblFBuFabOI/AAAAAAAAADs/sjUFIoUolw8/s1600-h/View+of+one+side+of+the+main+street+in+the+Indian+city+of+Patna.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 220px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SblFBuFabOI/AAAAAAAAADs/sjUFIoUolw8/s320/View+of+one+side+of+the+main+street+in+the+Indian+city+of+Patna.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5312353131313130722" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;क्या  आपको भी  पटना शहर समृद्ध दिख रहा है ? &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;आज से करीब दो सौ साल पहले पटना सिटी चौक ऐसा दिखता था .इस चित्र में चौक से मंदिर ,मस्जिद और दुकानों का खूबसूरत नज़ारा मिलता है .चौडी  और साफ़ सुथरी सड़क पर हाथी, बैलगाडी और छकडा  की गरिमामय उपस्थिति को कलाकार ने चित्रित किया है. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;कलाकार &lt;strong&gt;सीता राम &lt;/strong&gt;की वाटर  कलर में &lt;strong&gt;1814&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt; में बनायी गयी पेंटिंग .&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;&lt;em&gt;साभार - ब्रिटिश लाइब्रेरी ,लन्दन&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt; &lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-3764453504543233416?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/3764453504543233416/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=3764453504543233416' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/3764453504543233416'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/3764453504543233416'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/03/1814.html' title='पटना शहर की मुख्य सड़क &quot;चौक&quot;  - इसवी सन 1814,  सीता राम की कलाकृति'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SblFBuFabOI/AAAAAAAAADs/sjUFIoUolw8/s72-c/View+of+one+side+of+the+main+street+in+the+Indian+city+of+Patna.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-5674934964002943650</id><published>2009-03-06T23:43:00.000-08:00</published><updated>2009-03-07T08:04:55.927-08:00</updated><title type='text'>गंगा के मझधार से  एक नजारा पटना का -  1780 की कलाकृति</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SbKbGMuNmlI/AAAAAAAAADU/yi2HVZB_NDY/s1600-h/Patana+by+riverside+treated+J.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 230px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SbKbGMuNmlI/AAAAAAAAADU/yi2HVZB_NDY/s320/Patana+by+riverside+treated+J.JPG" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5310477441419811410" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt; १८ वीं सदी में मुग़ल सल्तनत के कमजोर होते हीं बिहार यूरोपीय तिजारती कंपनियों , मराठों ,नबावों  के बीच  अधिपत्य की लडाई अखाडा बन गया.   &lt;/p&gt;&lt;p&gt;१७४५ तक बिहार मराठों ,बंगाल के नबावों और अफगानी फौजों के द्वारा रौंदी जाती रही .&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बेहाल रियाया और बिहार की हुकूमत के कई हक़दार . &lt;br /&gt;पर इस उथल पुथल के बीच पटना का व्यापारिक महत्व निरंतर बढ़ता रहा .  बिहार इसी बीच नील और अफीम की खेती  और पटना  इस व्यापार का मुख्य केंद्र . पूर्व ,पश्चिम और उत्तर दिशा में देसी विदेशी व्यापार का केंद्र .स्थानीय और विदेशी व्यापारी की भरमार .डच , फ्रांसीसी , अंग्रेज, आर्मेनियाई , पश्चिम उत्तर प्रान्त , तिब्बत सब जगह के लिए और सब जगह का माल . &lt;br /&gt;पटना और मगध को रौंदती रघुजी भोंसले , दरभंगा के अफगानों और ईस्ट इंडिया कम्पनी की फौजें .&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;१७६४ के बाद क्रमशः ,बिहार में ईस्ट इंडिया कंपनी की मजबूत होती हुकूमत और जनता भी हलकानी के हालिया दौर से मुक्त  . बाहरी फौजों के आक्रमण से मुक्ति . परमानेंट सेत्तलेमेंट की बुनियाद .&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt; और राजनैतिक स्थायित्व और व्यापार जनित शहरी समृधि के इस दौर में   गंगा नदी के  धार  से पटना ऐसा दिखता था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-5674934964002943650?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/5674934964002943650/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=5674934964002943650' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/5674934964002943650'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/5674934964002943650'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/03/1780.html' title='गंगा के मझधार से  एक नजारा पटना का -  1780 की कलाकृति'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SbKbGMuNmlI/AAAAAAAAADU/yi2HVZB_NDY/s72-c/Patana+by+riverside+treated+J.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-4526614708402629814</id><published>2009-03-03T20:56:00.000-08:00</published><updated>2009-03-03T21:50:57.997-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भोजपुरी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>दीवाली  -  वीरेन्द्र की भोजपुरी कविता</title><content type='html'>वीरेन्द्र की भोजपुरी कविता - दीवाली .पटना गाँधी मैदान का यह मंच ,हम सब के लिए बिहारी जन जीवन , इतिहास ,समाज ,आशा और निराशा , जय पराजय अर्थात हमारे सामूहिक जीवन के राग रंग का आइना या कहें की मेटाफर है. मित्र वीरू ने कविता का सन्दर्भ दिया है . इसे पढें और अपने उदगारों से अनुगृहित करें. अब उनकी जुबानी ----&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;मैं भोजपुरी भाषी हूँ. भोजपुरी शब्दों के अर्थ जिस तरह खुद-ब-खुद निचुड़ कर मेरे जेहन को शुकून पहुंचा जाते हैं, वैसा आमतौर पर हिंदी और अंग्रेजी के शब्द नहीं कर पाते. बहुत दिनों तक मुझे लगता रहा है और अभी भी लगता है कि जिस भाषा में हम संगीत समझ पाते हैं, उसी भाषा में कविता भी करनी चाहिए. जानता हूँ कि कविता का लयात्मक होना कविता होने की शर्त नहीं होती, फिर भी दिल है कि मानता नहीं. आज मैं आपके लिए &lt;/span&gt;भोजपुरी कवितायेँ लेकर आया हूँ. मन में संशय है कि गैर-भोजपुरी भाषी इन कविताओं को गैरवाजिब तो नहीं मान लेंगे? रब झूठ न बोलाय, मैं भाषा के आधार पर इस मुल्क में किसी नई राजनीतिक अस्मिता की पैरोकारी कटाई जरूरी नहीं समझता. तो आईये, इसे पढें और थोडी-सी प्रशंशा करें ताकि लगे कि भोजपुरी में कविता भी हो सकती है, सिर्फ भोंडे गाने ही नहीं लिखे जा सकते .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कविता का मथेला (शीर्षक) दीवाली --- सन्दर्भ बताना यहाँ जरूरी समझता हूँ. कल्पना कीजिये कि कोई प्रिय दीवाली के दिन अपनी प्रियतमा के साथ नहीं है. प्रियतमा समझ नहीं पा रही है कि क्या करे, क्या न करे. दीप जलाए कि न जलाए. फिर पता नहीं क्या आता है उसके मन में कि वह भी दीवाली की रात दिए जला देती है. प्रभु की माया देखिये कि इधर वह दीप जला बूझी आँखों से आकाश को निहार रही है कि उसका प्रियतम आन पड़ता है. प्रियतमा का दीप जलाना प्रिय को अच्छा नहीं लगता और वह शंकालु हो उठता है. उदास हो जाता है कि उसकी गैर मौजूदगी में भी उसकी प्रिया के मन में इतना उमंग और उत्साह है कि वह दीप जला उसका इज़हार कर रही है. यही सन्दर्भ है और आगे कविता के रूप में प्रियतमा का जवाब है.&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;ई दीवाली के दीप जनी बूझ बलम,&lt;br /&gt;ई सुहागिन के प्रीत जनी बूझ बलम.&lt;br /&gt;एही जियरा के माटी के दियरा बनल,&lt;br /&gt;आपन धूनल परनवा के बाती पूरल,&lt;br /&gt;जोगल नेहिया के तेलवा से दियरा भरल&lt;br /&gt;ओमें बिरहा के अगिया से तितकी धरल&lt;br /&gt;जरल जिनगी के जिनगी ना बूझ बलम&lt;br /&gt;ई सुहागिन के प्रीत जनी बूझ बलम&lt;br /&gt;ई दीवाली के दीप जनी बूझ बलम.&lt;br /&gt;दिया अंचरा के ओट में ई कबतक रही&lt;br /&gt;चोट सुधिया के जियरा ई कबतक सही&lt;br /&gt;चटक जाई दियरा, सब तेल धरती बही&lt;br /&gt;ई बियोगिन के जिनगी में कुछ न रही&lt;br /&gt;ई ता माटी ह, लोहा ना बूझ बलम&lt;br /&gt;ई सुहागिन के प्रीत जनी बूझ बलम&lt;br /&gt;ई दीवाली के दीप जनी बूझ बलम.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-4526614708402629814?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/4526614708402629814/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=4526614708402629814' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/4526614708402629814'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/4526614708402629814'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/03/blog-post_03.html' title='दीवाली  -  वीरेन्द्र की भोजपुरी कविता'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-6916024666380395299</id><published>2009-03-02T20:59:00.000-08:00</published><updated>2009-03-02T21:58:00.264-08:00</updated><title type='text'>नारी - तुम मेरी माँ हो ,बेटी और पत्नी भी हो -----( वीरेन्द्र की नयी कविता )</title><content type='html'>प्रिय कौशल,&lt;br /&gt;मेरी घुसपैठिया कविता आपको अच्छी क्या लगी कि मैं उन्मादी हो गया. और पुरातात्त्विक हो चुकी डायरी से एक और कविता निकाल लाया. इस उत्साह को अन्यथा न लें. आगे कविता नियमित रूप से न भेज सकूंगा.&lt;br /&gt;वीरेन्द्र&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; नारी&lt;br /&gt;तुम मेरी मां हो&lt;br /&gt;बेटी और पत्नी भी हो.&lt;br /&gt;मैं नहीं कहता&lt;br /&gt;कह भी नहीं सकता&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; ki&lt;br /&gt;ुम सबसे सुन्दर कब दीखती हो.&lt;br /&gt;तुम्हारी ममता को&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; छद्म कहना&lt;br /&gt; तुम्हारा अपमान है.&lt;br /&gt;बेटी बन&lt;br /&gt;बाप की गोद को&lt;br /&gt;युद्ध-भूमि भी बना देना भी&lt;br /&gt;महज नाटक नहीं है.&lt;br /&gt;नाटक इसमें भी नहीं&lt;br /&gt;कितुम बीबी बनकरएक&lt;br /&gt;हो जाती हो जिस्मानी तौर पर&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; मेरे साथ.&lt;br /&gt;तुम्हारे अंग-प्रत्यंग&lt;br /&gt;में जो उमड़ता है&lt;br /&gt;उमंग उसे भी स्वीकारता हूँ&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; सत्य ही.&lt;br /&gt;तो भी एक सवाल जेहन में&lt;br /&gt;छटपटाता है&lt;br /&gt;तुम्हारे उत्तर के लिए&lt;br /&gt;मेरी मां, मेरी बेटी, मेरी पत्नी.&lt;br /&gt;क्यों तुम सभी&lt;br /&gt;एकसाथ ही&lt;br /&gt; रहती हो आतंकित&lt;br /&gt;किसी अजाने भय से?&lt;br /&gt;क्यों नहीं बताती&lt;br /&gt;भय का कारन भी?&lt;br /&gt;कहीं कोई पाप&lt;br /&gt;या कुछ ऐसा-वैसा&lt;br /&gt;तो नहीं किया था&lt;br /&gt;अतीत में?&lt;br /&gt;अगर नहीं, तो क्यों&lt;br /&gt;जीवन को&lt;br /&gt;प्रायश्चित की तरह&lt;br /&gt;ढोने में&lt;br /&gt;सुख मिलाता है तुम्हें?&lt;br /&gt;मेरी मां, मेरी बेटी, मेरी पत्नी.&lt;br /&gt;क्यों&lt;br /&gt;जब कुछ कहने की बारी आती है&lt;br /&gt;लजा जाती हो तुम?&lt;br /&gt;क्यों&lt;br /&gt;छुपकर रहती हो&lt;br /&gt;खटमलों की तरह?&lt;br /&gt;क्यों&lt;br /&gt;क्यों नहीं कहती&lt;br /&gt;कि&lt;br /&gt;अब सहा नहीं जाता&lt;br /&gt;ईज्ज़त, लाज, अनुशासन&lt;br /&gt;का भारढोया नहीं जाता?&lt;br /&gt; क्यों&lt;br /&gt;कोई दहशतज़दा माहौल&lt;br /&gt;तुम्हें छुए बगैर&lt;br /&gt;गुज़रता नहीं?&lt;br /&gt;तुम जानती हो&lt;br /&gt;बखूबी जानती हो&lt;br /&gt;कि&lt;br /&gt;तुम्हारे बगैर&lt;br /&gt;अस्तित्व नहीं होगा&lt;br /&gt;मानव का&lt;br /&gt;धरा पर.&lt;br /&gt;कि&lt;br /&gt;तुम्हारे समेवत नकार से&lt;br /&gt;संभव है&lt;br /&gt;बंद हो&lt;br /&gt;जाना एकल नारी की चीख का.&lt;br /&gt;वीरेन्द्र&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-6916024666380395299?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/6916024666380395299/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=6916024666380395299' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/6916024666380395299'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/6916024666380395299'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/03/blog-post_02.html' title='नारी - तुम मेरी माँ हो ,बेटी और पत्नी भी हो -----( वीरेन्द्र की नयी कविता )'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-238045838625096446</id><published>2009-03-01T23:01:00.000-08:00</published><updated>2009-03-01T23:17:54.549-08:00</updated><title type='text'>वीरेन्द्र  की कविता -  समाचार</title><content type='html'>&lt;span class=""&gt;वीरेन्द्र  की कविता -  समाचार  &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मित्र कौशल,&lt;br /&gt;आज मैंने भी एक कविता लिख डाली. सोचा कि कर ही लूं मन की मुराद पूरी. क्या पता फिर पूरी हो न हो. तो मित्र, कविता के क्षेत्र में एक और घुसपैठ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; समाचार&lt;br /&gt;कमरे में पड़ा अखबार&lt;br /&gt;कोई खबर शायद दमदार&lt;br /&gt;मिल जाये&lt;br /&gt;यही सोचकर उठाता हूँ.&lt;br /&gt;टाईम्स ऑफ़ इंडिया के&lt;br /&gt;पहले पृष्ठ&lt;br /&gt;पर दाहिनेवाले कालम में&lt;br /&gt;सबसे&lt;br /&gt;नीचे एक खबर दबी थी&lt;br /&gt;"सर्दी से पांच मरे, उत्तर बिहार में".&lt;br /&gt;तभीमेरी आँखों में&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; छतरबलि मास्टर के&lt;br /&gt; टेबुल पर&lt;br /&gt;स्टैंड के सहारे&lt;br /&gt;टिका ग्लोब घूम जाता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्लोब में दर्ज है&lt;br /&gt;वायुदाब की pattiyaan&lt;br /&gt;dhruvo की स्थितियां&lt;br /&gt;समुद्र से पठार की दूरी&lt;br /&gt;और&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; इलाहाबाद और लन्दन का तापान्तर.&lt;br /&gt;भौगोलिक स्थिति&lt;br /&gt;कुछ और साफ हो&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; इसलिए करता हूँ&lt;br /&gt;भूगोल में गणित का प्रयोग.&lt;br /&gt;गणित फल&lt;br /&gt;सिद्ध नहीं करता&lt;br /&gt;की उत्तर बिहार&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; ध्रुवीय प्रदेश में है.&lt;br /&gt;फिर शीत से मौत उतर बिहार में  क्यों ?&lt;br /&gt;(आप ही  बताइए  ? )&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-238045838625096446?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/238045838625096446/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=238045838625096446' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/238045838625096446'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/238045838625096446'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/03/blog-post.html' title='वीरेन्द्र  की कविता -  समाचार'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-5573801787788952926</id><published>2009-02-28T05:28:00.000-08:00</published><updated>2009-02-28T06:41:36.541-08:00</updated><title type='text'>"---- दोनों हाथ ऊलिचियो ,यही सयानो काम " अर्थात बिहार की व्यथा -कथा</title><content type='html'>&lt;span&gt;बिहार  के मध्यम वर्ग  या सत्ता धारी वर्ग , (  भाव ग्रहण करते हुए जिसमें भी सहूलियत हो वैसा माने ) में खास तरह के उद्यम और  बुनियादी मुद्दों पर आम सहमति रही है .व्यक्ति ,परिवार ,कुल , गोतिया ,गाँव, समाज इन बुनियादी चीजों को कहें तो आदरणीय  मानता रहा है. इस व्यापक आम सहमति के  कारणों की चर्चा बाद में पहले सहमति के मुद्दों / प्रवृत्तियों और उद्यमों की चर्चा कर ली जाय 1.  मेट्रिक की परीक्षा में अपने लाल या लाली  को  नक़ल (  जिसे हम चोरी कहते हैं ) करने के लिए हर तरह की कोशिस करना . परीक्षा केंद्र पर लाल और लाली जो कर पाए सो कर पाए , बाद में भी प्रयास जारी  रहता है . एक प्रोजेक्ट के तौर पर इसे पुनीत कार्य का दर्जा.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;2.   लाल और लाली ने पढाई लिखायी  में जो किया सो किया .कॉलेज और  युनिवेर्सिटी में भी नक़ल/चोरी / पैसे / पारिवारिक /जातिगत संबंधों से जो कुछ भी संभव हो  वह सब किया जाय. इस पचडे में न पड़ा जाय की प्रयास कानूनी है कि गैरकानूनी, नैतिक है कि अनैतिक , अपना भला सबसे पहले देखना है . देश दुनिया जाय भांड में.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;3.   लाल और लाली पढ़ गए तो नौकरी का भी इन्तेजाम होना चाहिए.अपने बल पर कुछ बने तो बने नहीं तो अपना पूरा सामर्थ्य झोंक देना है.इसमें भी सब सही है. Every Thing is  Fair in Love and War के तर्ज पर.कुछ मायनों में  प्रोजेक्ट की सबसे अहम् कड़ी .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;4. लाल जैसी भी नौकरी में हों ,घूस में जितना कमायें उतना हीं अच्छा .और लाल नौकरी में रहते हुए परिवार कुटुंब , जात ,    जमात के लिए  कायदे कानून की परवाह किये बगैर वह सब कुछ  करे जिससे उनका हित साधन होता हो .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;आप अगर किसी भी तरह से रसूख बाले हैं तो अपने उस सामर्थ्य का इस्तेमाल धन उगाही , अपना ,परिवार ,  कुटुम्ब ,जाति आदि के हित में करें. &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;"दोनों हाँथ उलिचीयो  वही सयानों काम " के तर्ज पर . &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;आदर्श ,NAITIKATAA ,कानून ,मर्यादा जाय भांड में ,अगर आप येन केन प्रकारेण  जैसे भी उगाही करते हैं आप सम्मान के हकदार हैं .समाज आप को सफल मानेगा.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;शादी  विवाह में  जो जितनी बड़ी बोली लगवाले वह उतना हीं बड़ा आदमी.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;आदर , श्रध्हा के पात्र रहे वो लोग जो इस  कला को साध लिए . &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;इन प्रवृतिय्यों और  इस उद्यम की  व्यापक सामाजिक सहमति और आदर . &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;अस्सी  के दशक में जब दिल्ली विश्विद्यालय में यहाँ के छात्रों की भीड़ बढ़ी तो ये अपने साथ बिहार की प्रतिमूर्ति लेते गए और संख्या बल मिलते हीं जातिगत  गुटों और क्रमशः गिरोहों में ढलते गए . &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;खैर बाद में बिहार और देश में जो माहौल बना उसमें  इनको फलने फूलने का प्रयाप्त मौका मिला .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;ऐसे हीं माहौल  में तक़रीबन  पांच दशकों से  बिहार में सफलता , असफलता ,मेरिट , योग्यता , संस्कार और समृधि के मानक  तय हुये हैं.ज्यादातर नायकों ने नायकत्व इसी  अखाडे में इन्ही दस्तूरों को अपनाते हुए प्राप्त किया.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;बिहारी समाज में यह एक मुख्य प्रवृत्ति  रही . इसके प्रतिरोध में दूसरी धारा भी  निरंतर बहती रही है .जिस पर फिर कभी बाद में &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-5573801787788952926?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/5573801787788952926/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=5573801787788952926' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/5573801787788952926'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/5573801787788952926'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/02/blog-post_28.html' title='&quot;---- दोनों हाथ ऊलिचियो ,यही सयानो काम &quot; अर्थात बिहार की व्यथा -कथा'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-1679497288716723910</id><published>2009-02-27T03:02:00.000-08:00</published><updated>2009-02-27T03:48:01.489-08:00</updated><title type='text'>दिल हीं  तो है, न संगोखिश्त</title><content type='html'>( संजीव रंजन , मुजफ्फरपुर :मित्र संजीव आखिर हम सब के चंगुल में फँस ही गए.अपनी आप बीती सुना रहें हैं . वायदा है की इसकी कड़ियाँ वो क्रमशः जोड़ते जायेंगें .लुत्फ़ उठाएं और उनकी हौसला अफजाई करें. प्रस्तुत है उनकी रचना )&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रिय कौशल,&lt;br /&gt;यह पत्र मैंने २००७ के जुलाई-अगस्त महीने में अपने बेहद करीबी रिश्तेदार-दोस्त प्रभात को लिखा था. ऑफिस सील हो घुका था, कन्धा ज़ख्मी था, छोटे-मोटे काम और कर्जो से जीवन उबर-खाबर निकल रहा था. उन्हीं दिनों बड़े संयोग से एक अच्छे मुनाफे वाला दिलचस्प काम आया था. इस पत्र की आत्मा वही घटना है - इसे आपके ब्लॉग के सिपुर्द कर रहा हूँ :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रिय प्रभात,&lt;br /&gt;मुजफ्फरपुर से आने के बाद जीवन और व्यवसाय में जो हलचल आया था अब लगभग शांत प्राय है। वैसे आलस्य अब भी विकट समस्या है और दीवानापन के दौरे आते हीं रहते हैं। स्वतः स्फूर्त नियमन वाला जीवन कमबख्त आये न आता है. यह जो पत्र मैं आज लिख रहा हूँ इसकी योजना पिछले दो महीनों से थी. अक्सर तो भूल हीं जाता था, जब याद आता कि लिखना है तब योजना करता कि आज रात को तसल्ली से जरूर लिखूंगा. रात आती और मुद्दे कि तरफ ध्यान जाता तो पाता कि वह योजना भीषण साहित्यीक चुनौती का वजन अख्तियार कर चुका है. कुछ उधेड़-बुन और लानत- मलामत के बाद यह निश्चय कर के कि कल तो पक्का हीं लिखूंगा उस बोझ के नीचे कुछ और चिंताओं को लेकर उखडा अनिश्चित सो रहता. यह सिलसिला जैसा कि पहले बता चुका हूँ पिछले दो महीनों से है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाक़ी काम-वाम का क्या है कि चल हीं रहा है. पिछली हफ्ते कुछ ऐसी स्थिति बनी थी कि तीन-चार अच्छे काम के मिलने की उम्मीद बंधी. लेकिन समय पर आवश्यक तैयारी कर संबद्ध चीजों को लेकर वक़्त पर नहीं पहुँच पाने से दो अच्छे काम ख़राब हो गए. एक तो बिल्कुल उखड गया और शिष्ट भाषा में लम्बा sangeen लेक्चर पिला गया. मैंने कुछ नहीं कहा कि क्या कहता!वैसे नुक्सान का ज्यादा मलाल नहीं हुआ क्योंकि उस दरम्यान में एक multinational NGO के ANNUAL रिपोर्ट का काम चल रहा था. काम के प्रत्येक चरण में प्रयाप्प्त प्रशंसा कि आमद थी और काम के स्केल के लिहाज़ से अच्छा मुनाफा बनता दिख रहा था. दूसरा बड़ा आकर्षण था कि जिस अथॉरिटी को मैं रिपोर्ट कर रहा था वह एक दिलफरेब महिला थी जिनसे दिन में कम-से-कम दो बार मिलने का अवसर था. लम्बा कद, लबालब व संपुष्ट संगठन, दिल्ली कि अक्सर महिलाओं-सी गोरी और सुंदर - बातचीत में बेबाक व सहज, और काम के फिनान्सिअल आस्पेक्ट्स के प्रति अतिरिक्त सजग. मिलने पर तपाक से हाथ मिलाती. मैं पता नहीं क्यों हिचक कर हाथ मिलाता. एक दिन उतावली में मैं उनसे पूछ बैठा कि आपके HUSBAND क्या करते हैं. उन्होंने छुटते हीं कहा, " आई ऍम सिंगल." आगे जब मैंने पूछा कि क्या वे दिल्ली हीं में जन्मी, पली और बढ़ी हैं तो उन्हों ने बड़े इत्मिनान और स्टाइल में कहा - हंड्रेड परसेंट. यहीं दिल्ली UNIVERSITY से एम.ए. करने के बाद अमेरिका के एक गिरामी UNIVERSITY से पीएच.डी कर संबद्ध NGO में बड़ी मुलाजिम हैं और मोटी तन्खाह पाती हैं. वसंत कुञ्ज में शानदार फ्लैट है, बड़ी गाडी है जिसे एक बुद्धू-सा ड्राईवर बड़ी सावधानी से चलाता है. उनकी छः महीने की विदेशी गुडिया-सी बिटिया है और सात-आठ साल का बड़ा मासूम बेटा है. शाम को काम के बाद वो अक्सर मुझे ड्राप कर दिया करती थी।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;उनका काम हमने बड़ी मेहनत से बिलकुल वक़्त पर पूरा कर दिया. वे बहुत खुश हुईं और काम की तारीफ़ में चहक कर कहा - very beautiful, really beautiful. बिल देख कर अलबत्ता शांत हो गईं. बहुत देर तक देखती रहीं. चूँकि पन्नों की संख्या अनुमान से ज्यादा हो गईं थी अतः रिपोर्ट की प्रति इकाई राशि अनुबंधित राशि से ज्यादा थी. इसके प्रति हमने उन्हें काम के मध्य में हीं आगाह कर दिया था, फिर भी ऐसा लग रहा था कि उनके ध्यान में इस चीज को पहली बार लाया गया हो. मैं घबरा रहा था कि कहीं बहस न करने लगें और पैसे कम करनें कि जिद न कर बैठें. बहुत देर तक बिल कि पड़ताल करनें के बाद मामले को रद्द करते हुए उन्होंने कहा - ok. मैंने धीरे-से संतुलित जबान में पूछा - इज इट पिंचिंग? उन्होंने तनिक मुस्कुरा कर व्यंग्य में कहा - पेन्नी ऑलवेज पिंचेज. इसके बाद अपने महंगे पर्स से चेकबुक निकला, मेरी संस्था का नाम कन्फर्म किया और बिलकुल लड़किओं वाली हैण्डराइटिंग में चेकबुक को भर कर अपना तिरछा दस्तखत उस पर दर्ज कर रूखी मुस्कराहट के साथ मुझे थमा दिया. राशि को दुरुस्त पाकर मेरा कलेजा जोर से धड़कने लगा. चेक को सावधानी से मोड़ते हुए मैंने गुनहगारों वाले लहजे में कहना हीं शुरू किया कि 'आई डोंट नो इफ वी हैव औनर्ड योर एक्स्पेक्टेसनस और नौट ...' कि उन्होंने काटते हुए कहा - नो, आई हैव नो प्रॉब्लम. इट इज रादर गुड. इट डीपेन्ड्स औंन दी हाईअर अथॉरिटी. मैंने उन्हें याद दिलाया कि काम के दौरान उन्होंने एक और बड़े काम का जिक्र किया था और कहा था कि वह इस प्रोजेक्ट के ख़त्म होते हीं शुरू हो जायेगा. उन्होंने कहा - नहीं, उसमें अभी देर है. अभी तो एडिटिंग हीं चल रही है. मैंने पूछा - क्या महीने-दो महीने. उन्होंने कहा - दो महीने तो नहीं, लेकिन महीना-भर लग हीं जायेगा. मैंने चिंता और आग्रह को मिला कर अतिशय विनम्र भाव से पूछा - विल इट कम टू अस, ऐज promised. अबकी-बार वे हंस पड़ी. कहने लगीं - इट शुड. अब मेरे पास कहने या पूछने को कुछ नहीं था. चलने की बारी थी. सोच रहा था कि कुछ अच्छा कह कर हाथ मिला कर चलूँ. इसी दौरान उनका मोबाइल बजने लगा और वे फोन पर बातें करने लगीं. मैं असहज बैठा दीवारों पर लगे नोटिस और पेंटिंग्स को देखने लगा, कि टेबुल को हल्के से थपथपाने की आवाज आई. मैंने देखा कि वो कान से मोबाइल लगाये शिष्टाचार-वाली मुस्कराहट लिए मेरी तरफ मुखातिब हैं. आँखों को हल्के-से बंद कर के उन्होंने इशारा किया कि मैं जा सकता हूँ. मैं उठ खडा हुआ. हाथ मिलाने की पहल करने कि हिम्मत न हुई. उनकी शान में गर्दन को झुकाया और मुड़ कर वापस चल पड़ा. एक दो कदम बढाया हीं था की पीछे से उनकी आवाज आई - सी यू सून. मैंने मुड़ कर उनकी बात को गर्दन झुका कर एक्नौलेज किया, संक्छेप में सीयू कहा और बहार निकल आया. मन अतृप्त और अनिश्चित था, लेकिन कदम बड़े इत्मीनान से उठ रहे थे. शायद पैसे पूरे मिल जाने की वजह से. अब देखो कि वो दोबारा बुलाती हैं कि नहीं (... क्रमशः )&lt;br /&gt;संजीव रंजन, मुजफ्फरपुर&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-1679497288716723910?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/1679497288716723910/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=1679497288716723910' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/1679497288716723910'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/1679497288716723910'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/02/blog-post_27.html' title='दिल हीं  तो है, न संगोखिश्त'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-4917042600203948651</id><published>2009-02-25T22:41:00.001-08:00</published><updated>2009-02-25T23:15:33.251-08:00</updated><title type='text'>विश्व को  ललकारने की धृष्टता  - मित्र की राय  सर आंखों पर</title><content type='html'>वीरेन्द्र के लेख पर प्रिय संजीव की  टिपण्णी -आप ब्लॉग पर आए हम सब अनुगृहित हुए।जैसा की हम सब मित्रों की बरसों  पुराणी राय रही है की आप बाचिक परमम्परा  के दुरंधर एवं बेजोड़  रहें है.आपके इस अनमोल और दुर्लभ गुण के कारण , ज़माना गवाह है ,आपके मित्र कितना कुछ कर के आप का सानिध्य को बेचैन रहते है।संजीव  का मतलब आनद और उल्लास पूर्ण सत्संग (  सात्विक लोग माफ़ करेंगें सत्संग शब्द के ऐसे प्रयोग से )और यह सत्संग ऐसा वैसा नहीं बल्कि , यह दिल मांगे मोर वाला ।खैर मित्र हम सब आपकी बहुमुखी प्रतिभा के पुराने मुरीद रहें हैं .और आप को  हम सब घसीट कर यहाँ तक  लाये यह अपार हर्ष का विषय है.और हम सब इसे अपनी उपलब्धि मानते हैं।रही बात आपकी टिप्पणी के  लक्षणा  अर्थ भेद की तो इसे विनम्र निवेदन मान कर पढा जाय ।विश्व को ललकारने का कोई चेतन प्रयास नहीं है। बल्कि यह एक इमानदार  कोशिश है आस पास को समझने की । मैं और वीरेन्द्र अपने जीवन के ऊर्जा से सराबोर दौर में सहधर्मी और सह कर्मी रहें है.मिलाना महज संयोग नहीं था बल्कि अपनी आप बीती और जगबीती की तार्किक परिणति थी.हम सब जीवन के जिस पथ पर थे वह एक तरह निजी तो था पर उस  दौरा -ऐ - ज़माना का हिस्सा था .परिस्थितियां  सवालों को पैदा करती थी और उन सवालों को हम लोग अपने तमाम भोलेपन और अन्गढ़पने में , पर पुरी ईमान दारी से , उत्तर ढूँढ रहे थे । आज भी वो सवाल सामने से हटे नहीं हैं।हम यह तो नहीं कह सकते की उत्तर सही हैं या ये भी की सवाल वाजिब हैं .पर मित्र यकीन मानिए , पुरी संजीदगी और जिम्मेवारी के साथ प्रश्नों से साबका होता रहा है और इनको मन से बहिस्कृत नहीं कर पाये हैं.उत्तर खोजने की  धृष्ट ता करते रहें हैं.सच कहें तो इसका एक अनोखा आनंद है।आपके प्रिय कवि सूरदास जी के शब्दों में कहें तो " सात स्वर्ग अपवर्ग सुख धरिये तुला एक अंग ,--, जो सुख सूर अमर मुनि दुर्लभ , वो सुख नन्द की भामिनी पावे "माता यशोदा कान्हा को थपकी देकर सुला रही हैं.सूरदास कहते हैं की सातों स्वर्ग और उसके सारे अप्वार्गों के सुखों को अगर तराजू के एक तरफ़ रख दिया जाय तब भी यह यशोदा के सुख के बराबर नहीं होगा .आप बीती को जगबीती का हिस्सा मानते हुए अगर सवाल खडा होता है और उसका ईमानदारी से उत्तर ढूँढने के प्रयास में अगर दुनिया को ललकारने की जरूरत हो जाय या दुनिया इसे चुनौती माने तो इस मामले में हम असहाय हैं .सादर&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-4917042600203948651?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/4917042600203948651/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=4917042600203948651' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/4917042600203948651'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/4917042600203948651'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/02/blog-post_2756.html' title='विश्व को  ललकारने की धृष्टता  - मित्र की राय  सर आंखों पर'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-2880821766758435043</id><published>2009-02-25T22:41:00.000-08:00</published><updated>2009-02-25T22:43:11.856-08:00</updated><title type='text'>विश्व को  ललकारने की धृष्टता  - मित्र की राय  सर आंखों पर</title><content type='html'>&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-2880821766758435043?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' 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नहीं होता कि हम वर्तमान को उससे विलग कर समझ सकें. व्यक्तिगत तौर पर मैं मानता हूँ कि बौद्ध-मत के अलावा बिहार में ज्ञानोदय का कोई मुकम्मल दौर ज्यादा दिनों तक बरकरार नहीं रह सका.  सच तो यह है कि बौध-धर्मं का स्वर्ण-काल भी कभी इतना ताक़तवर नहीं बना था कि उससे एक नई संस्कृति का सूत्रपात हो सके. धर्मं को जीवित रहने या रखने के लिए जरूरी है कि वह किसी नई आचार-संहिता अथवा संस्कृति का उत्स बने. बौध-धर्मं के काल में भी आचार-संहिता मनुस्मृति के नियमों के अनुरूप बनी रही.   ब्राह्मणवादी सनातनी नैतिकता बौद्ध-मत को कभी भी स्वीकार नहीं कर पाई. उल्टे, उसके खिलाफ तरह-तरह की साजिशें कराती रही. कभी बुद्ध को नास्तिक करार देकर आम आदमी के मन में संशय के बीज बोने की कोशिश की गयी तो कभी उनकी आस्था की खिल्ली उडाई गयी. हम सभी जानते हैं कि बौद्ध-मत के समर्थन में एक तरफ अगर छोटी जातियाँ थीं तो दूसरी तरफ उसे सम्राट अशोक जैसे महान नृपतियों का भी राज्याश्रय हासिल था.  लेकिन सदियों से दबी-कुचली और अनपढ़ रही इन निम्न जातियों के लिए यह संभव नहीं था कि वे अपने नए मत का कोई तार्किक और वैचारिक आधार ढूंढ पातीं. दूसरी तरफ राज्याश्रय की छत्रछाया में विकसित हो रहे इस धर्मं के प्रति ब्राह्मणी नैतिकता में सराबोर तत्कालीन बौद्धिक समाज की कोई खास रूचि नहीं बन पाई. कहने की जरूरत नहीं कि किसी नई विचाधारा को आगे बढ़ाने का काम उस समाज के बुद्धिजीवी ही करते हैं.  चूंकि तब पढ़ने का अधिकार सिर्फ ब्राह्मणों या कह लीजिये द्विजों को था, इसलिए तब के हमारे समाज में अधिकाँश बुद्धिजीवी ब्रह्मण ही हुआ करते थे. ऐसे में यह अपेक्षा ही गैरवाजिब थी कि ये ब्राह्मण अपने धूर विरोधी के समर्थन में प्रचार-प्रसार करें. इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि राज्याश्रय की छाया हटते ही बौद्ध धर्मं का दायरा सिकुड़ता चला गया. अशोक के बाद के दिनों में खासकर पुष्यमित्र सुंग के शासन काल में बौद्धों के खिलाफ भरी दमन का सूत्रपात किया गया. लाखों की संख्या में बौद्ध भिक्षुक या तो मार दिए गए या फिर वे अपनी मातृभूमि से पलायन कर गए.   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छठी सदी में हर्षवर्धन ने राजगीर में अंतिम बुद्धिस्ट काउंसिल बुलाई थी. इसे बुद्धिज्म का आखिरी पटाक्षेप भी कहा जा सकता है क्योंकि उसके बाद बौद्ध-धर्मं धीरे-धीरे अपने अवसान की ओर बढ़ता गया. उसकी प्राणशक्ति पर फिर से ब्राह्मणों का कब्ज़ा हो गया. बौद्ध-धर्मं के पुनर्जीवन की किसी भी संभावना को निरस्त करने के लिए पाखंड में सिद्धहस्त ब्राह्मणों ने उसी बुद्ध को विष्णु का दसवां अवतार घोषित कर दिया जो जीवन भर इसी पाखंड के खिलाफ लड़ते आया था. इतर विचारों को अपनाकर उसे अपनी तरह बना लेना ब्राह्मणों   की सोची-समझी रणनीति रही है. अगर ऐसा न होता तो हमारे समाज में भगवान बुद्ध के जीवन से जुडी घटनाओं को लेकर कोई न कोई जीवंत लोक-उत्सव जरूर मनाया जाता. जहाँ हर छोटी-बड़ी बात अथवा घटना को लेकर जूलूस निकाले जाते हों, हर साधुनुमा आदमी की याद में हर गली, हर कूचे में सामूहिक आयोजन किये जाते हों, शोभा-यात्राएं निकली जाती हों, वहां आखिर ऐसी क्या बात हो गयी कि हमने महात्मा बुद्ध जैसे मनीषी की ऐसी अनदेखी कर दी.  प्रति-संस्कृति के नायक की हत्या की सबसे आसान रणनीति यही है कि उसे तीज-त्यौहार, पूजा-उत्सव और मेला-बाज़ार के विमर्ष से बाहर कर दो. नायक-वध की ऐसी मिशाल आप कहीं और नहीं पाएंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महात्मा बुद्ध की परम्पर की इस अनदेखी के लिए जिम्मेदार पूरा भारतवर्ष है, किन्तु सबसे ज्यादा बड़ा दोष तो बिहार का  ही माना जायेगा क्योंकि बिहार ही उनका धर्मं और कर्म-स्थल रहा है।   बिहार की दुरवस्था का एक कारण, मेरी समझ में, यही है कि उसने अपने इतिहास और धरोहर के प्रति बहुत ही कम संवेदनशील रहा है. नायक-पूजा जितनी बुरी बात है, उससे कहीं ज्यादा बुरी बात नायकों का तिरस्कार है. नायकों के प्रति मन में श्रद्धा का भाव ही किसी समुदाय अथवा समाज में उन्नयन के लिए सांस्कृतिक ऊर्जा प्रदान करता है.&lt;br /&gt;वीरेन्द्र&lt;br /&gt;( नोट - बिहार की दुरवस्था के दूसरे कारणों की पड़ताल अगली किश्तों में की जायेगी।)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-3097971376942312267?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/3097971376942312267/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=3097971376942312267' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/3097971376942312267'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/3097971376942312267'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/02/blog-post_25.html' title='बिहार नायक तिरस्कार के अभिशाप की पीड़ा से जूझ रहा है'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-1805189877553773249</id><published>2009-02-19T04:36:00.000-08:00</published><updated>2009-02-19T04:53:34.929-08:00</updated><title type='text'>माटी  का मोह  - कथा कई समंदर पार से</title><content type='html'>&lt;span class=""&gt;( कैसा होता है माटी का मोह ? राजीव जी अपनी आपबीती बता रहें हैं इस पोस्ट में । इन्हें देश दुनिया का व्यापक अनुभव है .दुनिया के सारे समंदर पर कर चुके हैं और कथायों का भंडार है इनके पास । प्रस्तुत है पहली कड़ी )&lt;/span&gt;&lt;br /&gt; प्रवासी भारतीय  और भारतीय संस्कृति के लिए उनकी भावनाएं - एक व्यक्तिगत अनुभव (भाग १) -&lt;br /&gt;कुछ रोज पूर्व एक मित्र से प्रवासी भारतीयों की भारतीय संस्कृति के प्रति आस्था पर बात हो रही थी. चर्चा छिडी के रिश्तेदार जब विदेश से आते हैं तो यहाँ के परिवर्तन से अनभिज्ञ होते हैं और अभी भी पुरानी व्यवस्था की उम्मीद करते हैं. उनके लिए समय ठहर सा गया होता है.&lt;br /&gt;कुछ वर्ष पूर्व बैंकॉक में अपनी संस्था के लिए कार्य करते समय फीजी जाने का मौका मिला। वहां हमारे सम्पर्क अधिकारी भारतीय मूल के थे सतीश कुमारजी.&lt;br /&gt;बड़े ही नेक व्यक्ति - भावुक, शिष्टः, और अतिथिप्र्यिय।&lt;br /&gt;उन्होने दूसरे दिन ही अपने घर खाने पर बुलाया। मैं और मेरी Director जो ऑस्ट्रेलिया से थीं, शाम को उनके घर पहुंचे. स्वागत का अच्छा खासा इंतज़ाम था. दोस्तों, और रिश्तेदारों को भी बुला रखा था. सभी बड़े ही गर्मजोशी से मिले. उनके दादा, दादी भी मौजूद थे जो अपने बचपन में ,1930 के दशक में ,बक्सर के गाँव से अपने रिश्तेदारों के साथ गए फीजी आए थे . आपस में वे सब भोजपुरी और अंग्रेज़ी का मिला जुला रूप बोल रहे थे.&lt;br /&gt;मिलते मिलाते मैं दादा दादीजी के पास पहुँचा और प्रणाम किया। दोनो ने आशीर्वाद दिया और अपने पास बैठा लिया.&lt;br /&gt;मैंने खालिस भोजपुरी में पूछा,"आजी कईसन बानी" ?&lt;br /&gt;भोजपुरी सुनते ही दादीजी ने मेरा हाथ पकड़ा और रोने लगीं।&lt;br /&gt;धाराप्रवाह आंसूं बहने लगी और बोली,"बबुआजी राउआ हमरा देश से आइल बानी। आपन माटी के याद हरियर भ गईल"&lt;br /&gt;दादाजी की भी आँखें गीली हो गयीं और वहां उपस्थित कई औरों की भी।&lt;br /&gt;बहुत देर तक वो मेरा हाथ थामें रोती रहीं।&lt;br /&gt;मेरी भी आंखे नम हुई. मेरी Director हतप्रभ थीं की क्या हो रहा है।&lt;br /&gt;इस तरह की भावनात्मक अभिव्यक्ति से शायद अनभिज्ञ थीं।&lt;br /&gt;दादी जी को चुप कराया गया। पर शाम भर उन्होंने मुझे अपने पास से हिलने नहीं दिया।&lt;br /&gt;गाँव की कहानियाँ कहती रहीं। अपने घर, खेत, खलिहान, गाय, दोस्त, सखी, रिश्तेदारों की बातें बताती रहीं. जैसे अपनी यादें ताजी कर रही हों. उनलोगों का गाँव से सभी संपर्क टूट चुका था. कोई रिश्तेदार नातेदार नहीं रह गया था. पर यादें थी. ढेरों. और शायद इतने दिनों बाद उन्हें कोई मिला था जो उनकी यादों को उनकी तरह समझ रहा था.&lt;br /&gt;उनके बच्चों ने भारत नहीं देखा था।&lt;br /&gt;दादी और दादाजी की भावनाओं के प्रवाह में अन्य भी सराबोर थे। शाम इसी उत्साह में बीती।&lt;br /&gt;शेष पुनः&lt;br /&gt;राजीव&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-1805189877553773249?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/1805189877553773249/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=1805189877553773249' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/1805189877553773249'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/1805189877553773249'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/02/blog-post_19.html' title='माटी  का मोह  - कथा कई समंदर पार से'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-5642671332247145465</id><published>2009-02-17T05:08:00.001-08:00</published><updated>2009-02-17T05:21:15.917-08:00</updated><title type='text'>वैलेंटाइन डे के बहाने - चाल और चेहरा</title><content type='html'>(मित्र वीरू का वैलेंटाइन डे पर केंद्रित पोस्ट की दूसरी किस्त प्रस्तुत है। वीरेंदर का कहना है की इस विषय पर इससे ज्यादा शिष्ट वो नहीं हो सकते हैं .पढ़ें और अपने उदगार से अनुग्रहीत करें .)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैलेंटाइन डे के बहाने: भाग II&lt;br /&gt;अपने लेख के पहले अंश में वैलेंटाइन डे की मैंने जो दो छवियाँ दिखाई थी, उसमें एक त्राषद तो दूसरी प्रहसनमूलक  मानी जा सकती है. पहली छवि त्राषद इसलिए क्योंकि उसमें रामजी की आड़ में वह सब कुछ किया जा रहा है जो भगवान श्रीराम की छवि से कोसों दूर है. जिस राम का नाम सुनते ही हमारे मन में निराशा के बीच आशा, दैन्य के बीच पुरुषार्थ तथा हैवानियत के बीच इंसानियत की भावनाओं का स्वतः संचार हुआ करता था, आज वही राम निरीह बना शैतानी तांडव देखने के लिए मजबूर है. मुझे अक्सर ऐसा लगता है कि जिस तरह सीता मैया को रावन ने धोखे से अपहरण कर लिया था वैसे ही मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को भी अ-रामों ने अगवा कर लिया है. राम की यह छवि कितनी दयनीय है! राम के बगूला भगत उन्हें लेकर गली गली में घूम रहे है और सबको बता रहे हैं कि देखो भगवान राम का कितना अपमान हुआ है. जिस राम के सामने त्रिलोक कांपता था, आख़िर उस राम के साथ बेअदबी से पेश आने की किसने हिमाकत कर डाली? जिस राम ने भक्तशिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास से भी अपने अपमान की बात नहीं कबूली, अब क्या हुआ कि वे रो-रोकर कभी किसी तोगडिया को, कभी किसी सिंघल को तो कभ किसी अडवानी को बिन पूछे बताये जा रहे हैं कि हे, मेरे सच्चे भक्त! तुम्हीं मेरा उद्धार कर सकते हो. अगर तुम्हारी थोडी-सी भी आस्था मुझमें है तो कसम खाओ कि तुम बाबरी मस्जिद को धूल-धूसरित कर दोगे; कि उसी जगह पर मेरा एक भव्य मन्दिर बनोगे. मैं वचन देता हूँ कि जिस दिन तुम ऐसा कर लोगे, उस दिन मैं तुम्हें और तुम्हारी पार्टी को केन्द्र कि सत्ता पर बैठा दूँगा. चाहो तो तुमलोग एक काम करके भी मेरा पूरा स्नेह और समर्थन हासिल कर सकते हो. क्या यह वाकई दुखद नहीं है?&lt;br /&gt;गली-मोहल्ले के लुच्चे, लम्पट, लफंगे और दादालोग जिस तरह भारतीयता, राष्ट्र धर्मं और जातीय गौरव के नाम पर हर साल चौदह फरवरी को मानवीय प्यार का ज़नाज़ा निकालते हैं,  उसे देखकर इतना तो कहा ही जा सकता है कि ये राम का मर्म जानते हैं और न ही उनका कर्म. अगर ये बौड़म राम के काल में पैदा हुए होते तो मुझे यकीन है कि ये राम और सीता को पुष्प-वाटिका में प्रवेश नहीं करने देते. इनकी नज़र में लक्ष्मणजी भी घोर  पातकी कर्म कर रहे थे. बड़े भाई के प्रणय-निवेदन का चश्मदीद गवाह वे अकेले ही तो  थे.    नल-दमयंती, भरत-शकुंतला, अहिल्या-गौतम जैसे न जाने कितने पवित्र मनीषियों ने प्यार का पैगाम दिया है, आज यह बताने कि जरूरत नहीं है. हम जिस प्रेम को जानते हैं उसकी अभिव्यक्ति और उसका एहसास सिर्फ़ दो व्यक्तियों के लिए मायने रखता है. प्यार में तीसरे पक्ष की उपस्थिति ही गैरवाजिब है और इसीलिए उसकी छवि सदैव एक खलनायक की मानी गयी है.  प्रेम सर्वथा सृजनकारी होता है. वह नूतन और अनदेखे सत्य का अन्वेषक होता है. वह नैतिकता, संस्कार और पवित्राचार की परम्परास्यूत परिभाषा को नवरूप देता है. प्रेम ऊर्जा का अक्षय भंडार होता है. वह न तो पुरातन है और न ही नवीन. वह चिरनवीन होता है. उसकी गरिमा इस बात पर निर्भर नहीं करती कि हम उसका इज़हार इस-उस या किस प्राकार करते हैं. लेकिन जो चीज इतनी सृजनकारी होगी वह अपने को स्थापित करने हेतु मौजूदा चीजों के क्रम में उतने ही फेर-बदल भी करेगी. इसके लिए हमें प्रेम के समाजशास्त्र से रु-ब-रू होना पड़ेगा.&lt;br /&gt;स्थापित समाजों का इतिहास इस बात का गवाह है कि उनकी बुनियाद में प्रेम का कोई मसाला नहीं मिलाया गया है. भारतीय समाज तो व्यक्तिक प्रेम को सदैव एक विकार मानता आया है.  स्त्री रूप में माया कि जैसी छवि हमारे धर्मं-ग्रंथों में उकेरी गयी है, वह कमोबेश आज भी हमारे मानस में रची-बसी है.  पवित्रता-अपवित्रता के खानों में सजाया गया हमारा समाज सदैव एक जटिल संकुचन की पीड़ा से ग्रस्त रहा है. हम जो भी करें, हमें जाति, धर्मं, नाते-रिश्तेदारी, कुल-खानदान और हैसियत का ख्याल रखना पड़ता है. जो लोग वैलेंटाइन डे के बहाने प्रेम का प्रतिकार या तिरस्कार कर रहे हैं, वे बखूबी जानते हैं कि अगर हमारे समाज में व्यक्तिक प्यार को मान्यता मिल गयी तो न तो उनकी जाति बचेगी, न उनका धर्मं बचेगा और न ही बचेगा उनका कुल-खानदान. यह प्यार सबको भस्म कर देगा. और इसीलिए यह क्षयकारी रोग है, समूल विनाश ही उपचार है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जय हो! जय हो!!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-5642671332247145465?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/5642671332247145465/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=5642671332247145465' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/5642671332247145465'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/5642671332247145465'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/02/blog-post_17.html' title='वैलेंटाइन डे के बहाने - चाल और चेहरा'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-2457288617954470967</id><published>2009-02-15T23:55:00.000-08:00</published><updated>2009-02-16T00:09:07.100-08:00</updated><title type='text'>वैलेंटाइन डे के बहाने</title><content type='html'>( मित्र वीरू का  वैलेंटाइन डे पर पोस्ट अभी अभी मिला है । उसे पेश कर रहा हूँ .आपके उदगार का इंतज़ार रहेगा )&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैलेंटाइन डे के बहाने&lt;br /&gt;मैं तकरीबन पचास साल का हूँ. फिर भी मुझे बेसब्री से वैलेंटाइन डे का इंतजार रहता है. इस साल भी था. इंतजार की वज़हें तो कई हैं, लेकिन इतना ज़रूर है कि उसमें सबसे दिलचस्प वज़ह शिव सैनिकों, राम सेनानियों तथा बजरंगदालियों जैसे संगठनों के सक्रिय कार्यकर्ताओं की कारगुजारियां होती हैं. वर्षा की प्रत्याशा में जिस तरह चीटियाँ रसातल की ठंढक छोड़ धरती की सतह पर आ जाती हैं, उसी तरह ये स्व-घोषित रणबांकुरे  वैलेंटाइन डे पर  अपने जीवन के नाना प्रपंचों से रुख्सती लेकर राष्ट्र-धर्मं और भारतीयता के अखाडे में आ धमकाते हैं. इनका तमाशा देखने लायक, समझने-बुझने लायक तथा सबसे बढ़कर गुनने लायक है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी को ठीक से याद रहे या न रहे, इन्हें बखूबी पता होता है कि वैलेंटाइन डे यानी चौदह फरवरी को कौन सा दिन है. अगर यह दिन मंगलवार हुआ तो इनका जोश दुगुना हो जाता है. कोई पूछे न पूछे, ये तरह तरह के उपक्रम करके दुनिया को बताते रहेंगे कि वे प्रेम के कतई खिलाफ नहीं हैं, उनका विरोध तो इसके प्रदर्शन के तरीकों को लेकर है.   ये मानते हैं कि प्यार निजता की चीज है, और इसीलिए इसका सार्वजनिक प्रदर्शन राष्ट्र हित में नहीं होगा. प्यार की सार्वजनिक अभिव्यक्ति से समाज में व्यभिचार बढेगा और राष्ट्र का आत्म-बल कमजोर होगा, वह वीर्यमान नहीं रह सकेगा. ऐसा घालमेल आपने कहीं और देखा है? वे हमें बता रहे हैं कि प्यार चरित्र और राष्ट्र के क्षरण का उत्स है. दुनिया के और किसी भी मुल्क़ के किसी भी चिन्तक ने कभी नहीं कहा कि प्यार एक क्षयकारी रोग है; कि इससे चरित्र और राष्ट्र का सत्यानाश होता है. अखबार में इश्तेहार देकर जनता-जनार्दन को सूचित किया जाता है कि ये सद्यःजात सैनिक किसी भी कीमत पर हनुमान जी का अपमान नहीं होने देंगे. वे अपनी जान देकर भी मंगलवार को ब्रह्मचर्य का पालन करेंगे और दूसरों से करवाएंगे भी. इन डंड-पिस्तौलधारी किंतु सर्वथा अप्रशिक्षित सैनिकों की  उन्मादी उत्सवधर्मिता जितनी लुभावनी होती है, उससे कहीं ज़्यादा डरावनी होती है. फूहड़ अनाडीपन के साथ जिस तरह ये भाला-तलवार-लाठी भांजते हैं उसे देखकर आम जनता भले डर जाती हो, कोई प्रशिक्षित सैनिक या सिपाही उसे एक तमाशा या ज़्यादा से ज़्यादा बन्दर-घुड़की ही मानेगा. चिंता की बात इतनी भर है कि हमारे असली सैनिक और सिपाही भी सिर्फ़ तमाशबीन बनकर रह गए हैं.  वे भूल गए हैं कि तमाशा करते करते तमाशावाले ही अपना तमाशा बंद कर कोई और तमाशा करने लगे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राम-मनुमान जी के इन रखवारों से अलग एक दूसरी पांत उन लोगों की है जो न तमाशा करना जानते हैं और न ही उसे उजाड़ना. ये ख़ुद ही तमाशा बनकर यात्रा-तत्र-सर्वत्र विराजमान रहते हैं. ये लोग इतने दीवाने होते हैं कि इन्हें अमूमन अपनी सुरक्षा की भी चिंता नहीं होती. न ये किसी से कुछ कहते हैं, न किसी को कुछ बताते हैं और निकल पड़ते हैं प्रेम की डगर पर, यह जाने बगैर कि 'बहुत कठिन है डगर पनघट की'. ये प्रेमानुरागी नहीं जानते कि वे किस सदी में और किस समाज में जी रहे हैं. जहाँ सुरक्षा की गोहर लगाने पर भी सुरक्षाकर्मी वारदात के बाद पहुंचते हों, वहां इन्हें यकीन होता है कि सिर्फ़ प्रेम की बांसुरी बजाकर ये प्रेम-शत्रुओं का विनाश कर लेंगे. नतीजतन, ये न तो अपने माता-पिता को, न अपने परिवार को और न ही पुलिस को इत्तला करना जरूरी समझते हैं. और फिर, वही होता है जो मंजूर खुदा होता है. किसी के बाल काटे जाते हैं, किसी को गाली-थप्पड़मिलाती है तो किसी को सरेआम नंगा कर खिल्ली उडाई जाती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(क्रमशः जारी)वीरेन्द्र&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-2457288617954470967?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/2457288617954470967/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=2457288617954470967' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/2457288617954470967'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/2457288617954470967'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/02/blog-post_15.html' title='वैलेंटाइन डे के बहाने'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-7941649359406789092</id><published>2009-02-14T22:27:00.000-08:00</published><updated>2009-02-14T22:46:31.156-08:00</updated><title type='text'>सवाल जमात में शामिल  होने का है  ?</title><content type='html'>क्या आप अभिव्यक्ति की स्वंत्रता , नारी स्वन्त्रत्य ,भारतीय  समाज में बन्धुत्व की भावना को विकसित करने वालों ,लोकतांत्रिक मूल्यों  - या यूँ कहें की भारतीय समाज ,राजनीति और संस्कारों के व्यापक और मुकम्मल लोकतांत्रिक करण में विश्वास रखते हैं ?&lt;br /&gt;या फिर धर्म , संस्कृति , सभ्यता , आतंकवाद जैसी किसी चीज  की दुहाई देकर  इन भावनायों के विरूद्ध जाने वाली दूसरी जमात में खड़े होते हैं ?&lt;br /&gt;फर्ज किया जाय की आप  हिंदू है और  अपनी हिंदू  पहचान पर   jaayaj और स्वाभाविक गर्व करते हैं। इस महान धर्म की उद्दात मूल्यों - जैसे - घाट- घाट में राम ,जड़ - चेतन सब उसी राम की परम अभिव्यक्ति , तो फिर क्या  अपना और क्या पराया , क्या धर्मी और क्या विधर्मी , क्या हिंदू और क्या मुसलमान ?&lt;br /&gt;और इस महान paramparaa के&lt;br /&gt;अयं निज करोवेती , गणना  लघुचेतसाम&lt;br /&gt;उदार चरितानाम  वसुधैव कुटुम्बकम&lt;br /&gt;इसमे निहित महान आदर्श को आत्मसात कर लिया है तो sankirntaayon के दायरे क्या साए में भी न आयेंगें&lt;br /&gt;और अपनी paramparaa ही इतनी सम्रिद्छ है की दूर  या सात समंदर पार देखने की जरूरत नहीं रहेगी .&lt;br /&gt;तो दोस्तों असली बात यह है की आप किस जमात में आना और रहना चाहते हैं ?&lt;br /&gt;क्या भारतीय मनीषा और संस्कृत वांगमय में निहित  सार्वभौमिक और शाश्वत मानव मूल्यों में विश्वास रखते हुए प्रगति गामी धारा का वाहक बनते हैं या फिर&lt;br /&gt;भारत और भारतीय मूल्यों का तालिबानी करण,  पक्ष अथवा परोक्ष रूप में करते हैं।&lt;br /&gt;सवाल असली जमात का है ?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-7941649359406789092?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/7941649359406789092/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=7941649359406789092' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/7941649359406789092'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/7941649359406789092'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/02/blog-post_14.html' title='सवाल जमात में शामिल  होने का है  ?'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-2580897960548122125</id><published>2009-02-12T22:02:00.000-08:00</published><updated>2009-02-12T23:16:47.254-08:00</updated><title type='text'>बिहार -  सदी 13 से 1857 तक : क्या  कहने  योग्य कुछ भी नहीं है ?</title><content type='html'>कल एक  मित्र से चर्चा हो रही थी । इतिहास के विद्यार्थी रहें हैं । लोक मंगल की भावना रखते हैं । अपनी आप बीती इमानदारी से बतातें हैं ।  डिंग हांकू वर्तमान दौर में ऐसे लोग जीवन के शाश्वत मूल्यों में आप की आस्था को मजबूत करते हैं।&lt;br /&gt;बात चीत बा-रास्ता  पटना विश्वविद्यालय ,बोरिंग रोड चौराहा , वीणा सिनेमा हॉल में बौबी फ़िल्म  , ब्लैक से टिकट खरीदना ,और टिकेट ब्लैक करने वालों से मारपीट ,  से होते बिहार के  इतिहास ,इतिहास लेखन और शोध  तक पंहुच गया ।&lt;br /&gt;एक प्रसंग आया की  गुप्त काल ,फा हेयान और    हुवेन सांग तक तो बिहार का प्रसंग  इतिहास के औपचारिक लेखन में आता है , पर फिर शेरशाह के दिल्ली फतह के बाद औपचारिक इतिहास , बिहार और बिहारियों की दशा  पर आम तौर पर मौन है।&lt;br /&gt;हाँ, १७६४ का बक्सर युध्ध , ग़दर के सन्दर्भ में वीर कुंवर सिंह की बहादुरी और दानापुर की बगाबत आदि की चर्चा है।&lt;br /&gt;लेकिन सोचने की बात यह है की क्या करीब ८००- १००० साल के इस लंबे दौर में लिखे और पढ़े जाने लायक कोई  बात बिहार के भूगोल में नहीं घटित हुई ?&lt;br /&gt;बख्तियार खिलजी द्वारा नालंदा विश्वविद्यालय की लूट , उदन्तपुरी का बिहार शरीफ में बदलना , सूफी संतों का बिहार आना (  मनेर शरीफ ) ,  बिहार का भूगोल भारत में इस्लाम का आरंभिक ठिकानों में एक  होना, बाद में अफगानों और मुग़लों की लड़ाईयां ,   अकबर के सेनापति मान सिंह के नेतृत्व  में बिहार बंगाल अभियान .धीरे धीरे सूफी संतों ,इस्लाम का बढ़ता प्रभाव , चैतन्य महा प्रभु और कबीर की सीख को अपनाता  बिहारी कृषक समाज , मध्य युग के भीषण दुर्भिक्ष ( १६७० का दुर्भिक्ष जिसका फैलाव बनारस से राजमहल तक था ) - इन चुनिन्दा घटनायों का कुछ असर तो बिहारी समाज पर पड़ा होगा ?&lt;br /&gt;क्या हजार साल के इस दौर में  यहाँ के समाज ,राजनीति ,संस्कृति ,कृषि , तकनीक आदि में कुछ तो बदलाव आया होगा ?&lt;br /&gt;इतिहास की एक परिभाषा के अनुसार इतिहास वर्तमान और भूत का निरंतर चलने वाला संवाद है । वर्तमान  भूत से और उसके बारे में सवाल करता है । यही सवाल जवाब इतिहास है। कहने की जरूरत नहीं की यह प्रश्नोत्तरी कभी ख़त्म नहीं हो  सकती है ।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;कोई समाज इतिहास  vihain नहीं  होता ।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;हाँ  अगर समाज में  ख़ुद पर bharosa है की अपने ithaas को अपनी najron से देखे तो इतिहास shunaytaa का prashna hin नहीं uthataa है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;इस दौर पर शोध करने waale २५-५० etihaaskaar अगर हो jaayen तो क्या औपचारिक इतिहास लेखन और विमर्श में यह najarandaaji बनी रह paayegi ?&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-2580897960548122125?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/2580897960548122125/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=2580897960548122125' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/2580897960548122125'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/2580897960548122125'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/02/13-1857.html' title='बिहार -  सदी 13 से 1857 तक : क्या  कहने  योग्य कुछ भी नहीं है ?'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-8396469599155148347</id><published>2009-02-11T05:16:00.000-08:00</published><updated>2009-02-11T05:21:58.800-08:00</updated><title type='text'>बिहार - कितने गाँव , कितने बच्चे और कितने हाई स्कूल ?</title><content type='html'>स्वप्न सा है  वह सब कुछ जो बिहार के भूगोल में आज  हो रहा है । &lt;br /&gt;पर यह  समझने के लिए  बिहार  के वर्तमान सन्दर्भ को देखना  पडेगा ।&lt;br /&gt;क्या है बड़ी तस्वीर ?&lt;br /&gt;वर्त्तमान जनसंख्या तक़रीबन साढे नौ से दस करोड़ ,  75 से 80 फीसदी ग्रामीण आबादी। &lt;br /&gt;डिविजन  9, &lt;br /&gt;जिले  38,&lt;br /&gt;सब  डिविजन  १०१ ,  &lt;br /&gt;सामुदायिक विकास प्रखंड  534 ।&lt;br /&gt;पंचायत  ८४७१&lt;br /&gt;राजस्व ग्राम  45103 (  जिसमे कुछ बे- चिरागी होंगें )&lt;br /&gt;शहरी क्षेत्र  ९&lt;br /&gt;शहर 130&lt;br /&gt;हर राजस्व ग्राम के दायरे में कई सामान्य ग्राम और टोले  अर्थात ग्रामीण बसाहट या सामान्य गाँव की कुल संख्या लगभग साठ हजार ।&lt;br /&gt;और मोटे तौर पर 1682 सरकारी और कहें तो 2000 गैर सरकारी हाई स्कूल ।&lt;br /&gt; कुल योग 3682&lt;br /&gt;बिहार की समस्त ग्रामीण आबादी के लिए कितने हाई स्कूल हुए ?&lt;br /&gt;बिहार की कुल जनसँख्या का २०% ( 1।6 करोड़ ) हिस्सा छः साल से नीचे है ।&lt;br /&gt;ये बच्चे कल को किशोर होंगें । &lt;br /&gt;बिहार के भूगोल में रहने वाले   यही किशोर इस बदहाल राज्य के  कल के भाग्य विधाता बनेंगें ।&lt;br /&gt; और इनको  पूरे देश   के शहरों में मजदूरी कर जीवन यापन और जहालत की जिंदगी नहीं व्यतीत  करना है तो आप ख़ुद अंदाज लगाएं की कितने और  हाई स्कूल खोलने की जरूरत पड़ेगी ?&lt;br /&gt;खैर बिहार में फिलहाल जो कुछ भी हो रहा है वह किसी स्वप्न से कम नहीं है।&lt;br /&gt;खुदा करे यह स्वप्निल दौर चलता रहे ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-8396469599155148347?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/8396469599155148347/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=8396469599155148347' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/8396469599155148347'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/8396469599155148347'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/02/blog-post_11.html' title='बिहार - कितने गाँव , कितने बच्चे और कितने हाई स्कूल ?'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-3603203313698376607</id><published>2009-02-10T18:55:00.000-08:00</published><updated>2009-02-10T19:23:15.467-08:00</updated><title type='text'>बिहार में हाई स्कूल कितने हैं ?</title><content type='html'>बिहार मंत्रिमंडल की बेगुसराय जिले  के एक गाँव में बैठक हुई . गाँव में बैठक  के  लिहाजन  इसे ऐतिहासिक कहा जा रहा है. मंत्रिमंडल ने शिक्षा के क्षेत्र में दो  महत्वपूर्ण  निर्णय  लिया  है. पहला की हर सरकारी हाई स्कूल में  अब इंटर स्तर तक की पढ़ाई  होगी  .इसके लिए सारी सुविधाएँ मुहैया की जायेंगी. दूसरा निर्णय अनुमंडल स्तर पर ३९ नए सरकारी  ( जिसे हम अंगीभूत की संज्ञा देते हैं )कॉलेज  खोले जायेंगें .इन निर्णयों के लिए बिहार की वर्त्तमान हुकूमत बधाई की पात्र है.लेकिन  नए निर्णय के पीछे कुछ आंकडे चौंकाने वाले है.बिहार की वर्तमान जनसंख्या ९-१० करोड़  के बीच है. जानकार कहते हैं की इस आबादी का तक़रीबन  पंद्रह से बीस फीसदी हिस्सा प्रवासी हो गया है. मतलब सात से आठ करोड़ बिहार राज्य के भूगोल में रहते है.हाई स्कूल में पढने लायक   छात्र / छात्राएं   कम से कम पचीस से पचास लाख के लगभग .पर   सरकारी हाई स्कूलों की संख्या मात्र १६६२ .फर्ज किया जाय की इतने ही निजी स्कूल भी होंगें . तो ये रही  बिहार में आधुनिक शिक्षा की बुनियाद की तैयारी  और इन्तेजामात .क्या आपको अब भी आश्चर्य हो रहा है की बिहार इतना पिछडा क्यों है  कॉलेज शिक्षा और कॉलेजों की बात की जाय तो लगता है की किसी  साजिश  के तहत  अब तक ज्ञान पर पारंपरिक  सामंती एकाधिकार  और शैक्षणिक पिछडेपन के पीछे निहित स्वार्थ की व्यवस्था को जारी रखा  गया है. ३९  अनुमंडलों में  कोई कॉलेज नहीं.शिक्षा को बरबाद करने की साजिश और उसको अमली जामा  आठवें दशक में पहनाया गया .लेकिन इन उत्क्रमित हाई स्कूलों में क्या पढ़ाई का जिम्मा शिक्षा मित्रों के भरोसे रहेगा ? वो शिक्षा मित्र जिन्हें ५०००  मासिक दरमाहे पर रखा गया है.जिन पर  पंचायत पर हावी सामंती और माफिया टाइप के लोगों का  दबदबा बना रहता है.योग्य शिक्षकों की अगर नियुक्ति न की गई तो बिहारी समाज की दो पीढी का भविष्य अन्धकार मय  बना रहेगा .एक कदम आगे और दो कदम पीछे  वाली  उक्ति  चरितार्थ होगी.बिहार के विकास की चुनौती और उसके विविध आय्मों की चर्चा जारी रहेगी .&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-3603203313698376607?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/3603203313698376607/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=3603203313698376607' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/3603203313698376607'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/3603203313698376607'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/02/blog-post_5023.html' title='बिहार में हाई स्कूल कितने हैं ?'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-6400997678896253005</id><published>2009-02-10T00:19:00.000-08:00</published><updated>2009-02-10T00:30:42.039-08:00</updated><title type='text'>क्या बिहार  में  विकास और राजनीति का नया मुहावरा गढा  जा रहा है ?</title><content type='html'>बिहार  की बदहाली  और उससे उपजी  जीवन संघर्ष कि तीव्रता , कुरूपता और  तमाम जद्दोजहद के बीच भी  ढेरों प्रेरणादायक प्रसंग बिहार में यत्र - तत्र - सर्वत्र बिखरे हैं. देश भर में बिहार कि इस बेचैन करने वाली बदहाली को महसूस  करने के लिए   लोगों  को बिहार आने की जरूरत नहीं है . आज शायद देश  का शायद ही कोई कोना बचा हो जहाँ बिहारी और खास कर बिहारी मजदूर और कारीगर   काम नहीं कर रहें हैं. देश कि  मास मीडिया द्वारा  बिहार और बिहारियों कि निर्मित एक खास छवि  तो जग जाहिर है.  पर  इधर  हाल  साल  से समाचार  पत्रों और टी वी चैनेल्स में बिहार  से ख़राब खबरें कम आ रही हैं.कोसी तटबंध टूट ,प्रलय  और  उससे उपजी  मानवीय त्रासदी आदि को अगर  छोड़ दिया जाय तो विकास परक खबरें ही आ रही हैं।&lt;br /&gt;आज बिहार का मंत्रिमंडल  बेगुसराय के एक गाँव में  अपनी  खास बैठक  करने जा रहा  है ।&lt;br /&gt;तो क्या सचमुच बिहार विकास के रास्ते पर है ?&lt;br /&gt;या यह सब नए जमाने कि नई नौटंकी भर है ?&lt;br /&gt;वैसे  तो  यह  निर्विवादित सत्य है  कि आर्थिक और सामजिक विकास और वह भी बिहार की ठोस परिस्थिति में दीर्घ कालीन और चुनौती भरा कार्य है । पर  जानकार कह रहें है की बिहार में सामजिक  न्याय के साथ विकास हो रहा है.आर्थिक विकास के लिए अपरिहार्य आधार  भूत संरचना के  सब   आयामों के तीव्र विकास का प्रयास सरकारी  स्तर पर  हो रहा है.राजनीति और सत्ता शीर्ष पर भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लग रहे हैं.संगठित अपराध तंत्र , माफिया और  राजनीति के गठजोड़ को तोडा जा चुका है.आम तौर पर जनता सुरक्षित महसूस कर रही है.शहरों में सड़क ,नाली ,बिजली आदि आधारभूत संरचना का काम हो रहा है.  राज्य की सडकों का जीर्णोधार हो रहा है.राज्य भर में स्वाथ्य के क्षेत्र में उत्साह बर्धक काम हो रहा है. सरकारी अस्पतालों की दशा सुधर रही है.ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूल नियमित रूप से काम कर रहे हैं. नए शिक्षकों की नियुक्ति हो रही है .  स्कूल से बाहर बच्चों की बड़ी जमात स्कूल में लायी गयी है.धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए विशेष योजनायें लागू कि जा रही हैं. स्कूल में मिड डे मील कार्यकर्म चालू है ।पंचायत चुनावों में  हर  जगह महिलायों के लिए ५० %  आरक्षण , महिला सशक्ति कारन की नयी इबारत लिख रहा है.हर गाँव और पंचायत में कृषि और ग्रामीण विकास से सम्बंधित काम हो रहे हैं।किसानों को फसल बर्बादी होने पर मुआवजा मिल रहा है.&lt;br /&gt;तो क्या बिहार में  सामजिक न्याय के साथ आर्थिक विकास  के नए दौर की  शुरुआत हो चुकी  है ?&lt;br /&gt;विकास और बदलाब का  यह झोंका स्थाई हो गया है ?&lt;br /&gt;क्या  बिहारी समाज जातिवाद और भ्रष्टाचार   के defining feature से ऊपर उठ रहा है ?&lt;br /&gt;क्या वहाँ का समाज  और राजनीति  नए  मुहावरे और लक्ष्य गढ़ रही है ?&lt;br /&gt;क्या वहाँ कोई नया सामाजिक और राजनैतिक consensus बन रहा  है ?&lt;br /&gt;जो हो रहा है क्या वह सब चिरस्थायी रह पायेगा ?&lt;br /&gt; इन सारे सवालों पर  चिंतन और बहस कि प्रयाप्त गुन्जायिश है ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2091710118317553970-6400997678896253005?l=patnagandhimaidan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/feeds/6400997678896253005/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2091710118317553970&amp;postID=6400997678896253005' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/6400997678896253005'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2091710118317553970/posts/default/6400997678896253005'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://patnagandhimaidan.blogspot.com/2009/02/blog-post_10.html' title='क्या बिहार  में  विकास और राजनीति का नया मुहावरा गढा  जा रहा है ?'/><author><name>Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna  : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07416678636893602698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_bjF9dHZHu40/SWDRZq8MDeI/AAAAAAAAAAY/Y4ccbj-Dq0k/S220/England+Tour+November+2008+216.JPG'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2091710118317553970.post-2618786246731148723</id><published>2009-02-09T00:13:00.000-08:00</published><updated>2009-02-09T00:33:23.519-08:00</updated><title type='text'>पंख दिए हैं तो आकुल उड़ान में विघ्न न डालो . अर्थात हम डरते क्यो है ?</title><content type='html'>&lt;span class=""&gt;( वीरेन्द्र का लेख - मित्र वीरू के लेख की नयी किस्त प्रस्तुत है। भय , मन की निर्बिघन उड़ान और आत्मविश्वास के अंतर्संबंधों की पड़ताल करता विचारोत्तेजक लेख । पढ़ें , गुने और अपनी राय देने से संकोच न करे । सादर )&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;br /&gt;जोगी मुनि लोग बता गए हैं कि भय-मुक्ति में सहजावस्था की साधना काफी कारगर होती है. यह सहजावस्था है कौन सी बला? आम आदमी की भाषा में कहें तो सहजावस्था हमारी चेतना की वह अवस्था होती है जहाँ हमारा मन मान-अपमान, राग-विराग, अपना-पराया, दुःख-सुख यानी वह सबकुछ जिसे जोगी-मुनि माया कहते हैं, की अलग-अलग अनुभूतियाँ नही करता. वह सुख में उत्सवधर्मी नहीं होता और न ही दुःख में कातर. देखा जाय तो  समझने के लिए यह कोई जटिल बात नहीं है. दिक्क़त फ़क़त इतनी है कि आम आदमी  की जिंदगी की चिंताएँ जोगी-मुनि की चिंताओं से अलग होती हैं. उसके सामने सिर्फ़ मोक्ष का सवाल नहीं होता, उसे मुक्ति भी चाहिए -  मुक्ति अपनी उन परिस्थितियों से जिनकी वज़ह से उसका जीवन दुखी होता है. उसके लिए सम्भव नही है कि वह मानापमान से परे हो जाए और सबको गले लगा ले - दोस्त को भी, दुश्मन को भी. उसके मन में सदैव एक हलचल मची रहती है कि उसने ऐसा क्या कर दिया कि उसकी जिंदगी लगभग बेमतलब हो गयी. कभी वह ईश्वर को धिक्कारता है तो कभी अपने आपको और कभी पूरे समाज को. लेकिन उसकी यह चीख पुकार ज़्यादा से ज़्यादा  तूती की आवाज़ बनकर रह जाती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जोगी-मुनियों की तरह वह अकेले ही मोक्ष अथवा मुक्ति के जतन में उलझा रहता है. उसे लगता है कि कोई रहस्यमयी शक्ति उसके खिलाफ साजिश कर रही है. हार-थककर वह भाग्यवादी बन जाता है और मान लेता है कि इस जन्म  में  न सही, अगले जन्म में उसे ईश्वर-कृपा अवश्य प्राप्त होगी; कि वह भी जन्म-मरण के बंधनों से मुक्त होकर ईश्वरीय सत्ता का हिस्सा बन जाएगा. उसके लिए दुःख-सुख महज़ संयोग हैं. वह न तो अपने दुःख का निमित्त है, न सुख का. यानी, मुन्दहीं आँख, कतहूँ कुछ नाहीं'. आम आदमी के लिए सहजावस्था की साधना करना न तो सम्भव है और न ही वांछनीय. जीवन सिर्फ़ बुद्धि विलास का मसला नहीं होता. बुद्धि निर्वात में सक्रिय नहीं होती. चित्त की शान्ति जगत की शान्ति की परछाईं भर होती है. अगर हमारे बाह्य जीवन में शान्ति-भंग की तमाम संभावनाएं मौजूद रहेंगी तो चित्त भी शांत नहीं रह सकेगा. शान्ति की खोज कोई अकर्मक क्रिया नहीं है जो बिला वज़ह घटित हो जाए.   सच्ची शान्ति की खोज वही कर सकता है जो अपनी परिस्थितियों को ठीक से समझेगा और तदनुरूप ठोस कार्य-योजना को कार्यान्वित करेगा. सिर्फ़ आत्मशुद्धि के जरिये मुक्ति की कामना करनेवाले अनजाने ही बाह्य दुनिया की विसंगतियों की अनदेखी कर देते हैं. भारत का दार्शनिक चिंतन इसका अन्यतम उदहारण है. चूंकि,  इस चिंतन में जगत को माया मान लिया जाता है, इसीलिए यह किसी भी सार्थक/निरर्थक हस्तक्षेप के जरिये समाज में परिवर्तन की हर सम्भावना को नकार देता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने-अपने क़ैद की तार्किकता को वैध मानते हुए मुक्ति की आकांक्षा तो एक पक्षी भी नहीं करता, फिर मनुष्य तो मनुष्य है, उसे यह क्योंकर गवारा होने लगा? जी हाँ, यह सच है कि हम अपनी-अपनी क़ैद को ही ज़्यादा से ज़्यादा सहनीय बनाने के लिए प्रयासरत रहते हैं. हम पिंजडे की सार्थकता पर कभी बहस नहीं करना चाहते. दुनिया बदले नहीं और हमें वह सब मिल जाए जो उस पिंजडे में सम्भव ही नहीं है. ऐसे ही सपनों को दिवास्वप्न कहते हैं. वास्तव में, हम ख़ुद से बेगाने होते हैं और समझते हैं कि हमसे दुनिया ही बेगानी हुयी जा रही है. ज़रा गौर फरमायें तो साफ़ हो जाएगा कि हमारे अधिकाँश दुःख-सुख इसी मनोवृति   की  ऊपज होते हैं. जब हम अपनी परिस्थितियों का सम्यक आकलन नहीं कर पाते तो अकेला चना भांड फोड़ने की कोशिश करने लगते हैं. ऐसे में जब संयोग से कोई उपलब्धि मिल जाती है तो शिशुवत चपलता के साथ उत्सवधर्मी हो जाते हैं और अगर दुर्योग से कोई विपत्ति आ जाती है तो अत्यन्त कातर और निराश 
