Saturday, February 28, 2009

"---- दोनों हाथ ऊलिचियो ,यही सयानो काम " अर्थात बिहार की व्यथा -कथा

बिहार के मध्यम वर्ग या सत्ता धारी वर्ग , ( भाव ग्रहण करते हुए जिसमें भी सहूलियत हो वैसा माने ) में खास तरह के उद्यम और बुनियादी मुद्दों पर आम सहमति रही है .व्यक्ति ,परिवार ,कुल , गोतिया ,गाँव, समाज इन बुनियादी चीजों को कहें तो आदरणीय मानता रहा है. इस व्यापक आम सहमति के कारणों की चर्चा बाद में पहले सहमति के मुद्दों / प्रवृत्तियों और उद्यमों की चर्चा कर ली जाय 1. मेट्रिक की परीक्षा में अपने लाल या लाली को नक़ल ( जिसे हम चोरी कहते हैं ) करने के लिए हर तरह की कोशिस करना . परीक्षा केंद्र पर लाल और लाली जो कर पाए सो कर पाए , बाद में भी प्रयास जारी रहता है . एक प्रोजेक्ट के तौर पर इसे पुनीत कार्य का दर्जा.
2. लाल और लाली ने पढाई लिखायी में जो किया सो किया .कॉलेज और युनिवेर्सिटी में भी नक़ल/चोरी / पैसे / पारिवारिक /जातिगत संबंधों से जो कुछ भी संभव हो वह सब किया जाय. इस पचडे में न पड़ा जाय की प्रयास कानूनी है कि गैरकानूनी, नैतिक है कि अनैतिक , अपना भला सबसे पहले देखना है . देश दुनिया जाय भांड में.
3. लाल और लाली पढ़ गए तो नौकरी का भी इन्तेजाम होना चाहिए.अपने बल पर कुछ बने तो बने नहीं तो अपना पूरा सामर्थ्य झोंक देना है.इसमें भी सब सही है. Every Thing is Fair in Love and War के तर्ज पर.कुछ मायनों में प्रोजेक्ट की सबसे अहम् कड़ी .
4. लाल जैसी भी नौकरी में हों ,घूस में जितना कमायें उतना हीं अच्छा .और लाल नौकरी में रहते हुए परिवार कुटुंब , जात , जमात के लिए कायदे कानून की परवाह किये बगैर वह सब कुछ करे जिससे उनका हित साधन होता हो .
आप अगर किसी भी तरह से रसूख बाले हैं तो अपने उस सामर्थ्य का इस्तेमाल धन उगाही , अपना ,परिवार , कुटुम्ब ,जाति आदि के हित में करें.
"दोनों हाँथ उलिचीयो वही सयानों काम " के तर्ज पर .
आदर्श ,NAITIKATAA ,कानून ,मर्यादा जाय भांड में ,अगर आप येन केन प्रकारेण जैसे भी उगाही करते हैं आप सम्मान के हकदार हैं .समाज आप को सफल मानेगा.
शादी विवाह में जो जितनी बड़ी बोली लगवाले वह उतना हीं बड़ा आदमी.
आदर , श्रध्हा के पात्र रहे वो लोग जो इस कला को साध लिए .
इन प्रवृतिय्यों और इस उद्यम की व्यापक सामाजिक सहमति और आदर .
अस्सी के दशक में जब दिल्ली विश्विद्यालय में यहाँ के छात्रों की भीड़ बढ़ी तो ये अपने साथ बिहार की प्रतिमूर्ति लेते गए और संख्या बल मिलते हीं जातिगत गुटों और क्रमशः गिरोहों में ढलते गए .
खैर बाद में बिहार और देश में जो माहौल बना उसमें इनको फलने फूलने का प्रयाप्त मौका मिला .
ऐसे हीं माहौल में तक़रीबन पांच दशकों से बिहार में सफलता , असफलता ,मेरिट , योग्यता , संस्कार और समृधि के मानक तय हुये हैं.ज्यादातर नायकों ने नायकत्व इसी अखाडे में इन्ही दस्तूरों को अपनाते हुए प्राप्त किया.
बिहारी समाज में यह एक मुख्य प्रवृत्ति रही . इसके प्रतिरोध में दूसरी धारा भी निरंतर बहती रही है .जिस पर फिर कभी बाद में

Friday, February 27, 2009

दिल हीं तो है, न संगोखिश्त

( संजीव रंजन , मुजफ्फरपुर :मित्र संजीव आखिर हम सब के चंगुल में फँस ही गए.अपनी आप बीती सुना रहें हैं . वायदा है की इसकी कड़ियाँ वो क्रमशः जोड़ते जायेंगें .लुत्फ़ उठाएं और उनकी हौसला अफजाई करें. प्रस्तुत है उनकी रचना )

प्रिय कौशल,
यह पत्र मैंने २००७ के जुलाई-अगस्त महीने में अपने बेहद करीबी रिश्तेदार-दोस्त प्रभात को लिखा था. ऑफिस सील हो घुका था, कन्धा ज़ख्मी था, छोटे-मोटे काम और कर्जो से जीवन उबर-खाबर निकल रहा था. उन्हीं दिनों बड़े संयोग से एक अच्छे मुनाफे वाला दिलचस्प काम आया था. इस पत्र की आत्मा वही घटना है - इसे आपके ब्लॉग के सिपुर्द कर रहा हूँ :

प्रिय प्रभात,
मुजफ्फरपुर से आने के बाद जीवन और व्यवसाय में जो हलचल आया था अब लगभग शांत प्राय है। वैसे आलस्य अब भी विकट समस्या है और दीवानापन के दौरे आते हीं रहते हैं। स्वतः स्फूर्त नियमन वाला जीवन कमबख्त आये न आता है. यह जो पत्र मैं आज लिख रहा हूँ इसकी योजना पिछले दो महीनों से थी. अक्सर तो भूल हीं जाता था, जब याद आता कि लिखना है तब योजना करता कि आज रात को तसल्ली से जरूर लिखूंगा. रात आती और मुद्दे कि तरफ ध्यान जाता तो पाता कि वह योजना भीषण साहित्यीक चुनौती का वजन अख्तियार कर चुका है. कुछ उधेड़-बुन और लानत- मलामत के बाद यह निश्चय कर के कि कल तो पक्का हीं लिखूंगा उस बोझ के नीचे कुछ और चिंताओं को लेकर उखडा अनिश्चित सो रहता. यह सिलसिला जैसा कि पहले बता चुका हूँ पिछले दो महीनों से है।

बाक़ी काम-वाम का क्या है कि चल हीं रहा है. पिछली हफ्ते कुछ ऐसी स्थिति बनी थी कि तीन-चार अच्छे काम के मिलने की उम्मीद बंधी. लेकिन समय पर आवश्यक तैयारी कर संबद्ध चीजों को लेकर वक़्त पर नहीं पहुँच पाने से दो अच्छे काम ख़राब हो गए. एक तो बिल्कुल उखड गया और शिष्ट भाषा में लम्बा sangeen लेक्चर पिला गया. मैंने कुछ नहीं कहा कि क्या कहता!वैसे नुक्सान का ज्यादा मलाल नहीं हुआ क्योंकि उस दरम्यान में एक multinational NGO के ANNUAL रिपोर्ट का काम चल रहा था. काम के प्रत्येक चरण में प्रयाप्प्त प्रशंसा कि आमद थी और काम के स्केल के लिहाज़ से अच्छा मुनाफा बनता दिख रहा था. दूसरा बड़ा आकर्षण था कि जिस अथॉरिटी को मैं रिपोर्ट कर रहा था वह एक दिलफरेब महिला थी जिनसे दिन में कम-से-कम दो बार मिलने का अवसर था. लम्बा कद, लबालब व संपुष्ट संगठन, दिल्ली कि अक्सर महिलाओं-सी गोरी और सुंदर - बातचीत में बेबाक व सहज, और काम के फिनान्सिअल आस्पेक्ट्स के प्रति अतिरिक्त सजग. मिलने पर तपाक से हाथ मिलाती. मैं पता नहीं क्यों हिचक कर हाथ मिलाता. एक दिन उतावली में मैं उनसे पूछ बैठा कि आपके HUSBAND क्या करते हैं. उन्होंने छुटते हीं कहा, " आई ऍम सिंगल." आगे जब मैंने पूछा कि क्या वे दिल्ली हीं में जन्मी, पली और बढ़ी हैं तो उन्हों ने बड़े इत्मिनान और स्टाइल में कहा - हंड्रेड परसेंट. यहीं दिल्ली UNIVERSITY से एम.ए. करने के बाद अमेरिका के एक गिरामी UNIVERSITY से पीएच.डी कर संबद्ध NGO में बड़ी मुलाजिम हैं और मोटी तन्खाह पाती हैं. वसंत कुञ्ज में शानदार फ्लैट है, बड़ी गाडी है जिसे एक बुद्धू-सा ड्राईवर बड़ी सावधानी से चलाता है. उनकी छः महीने की विदेशी गुडिया-सी बिटिया है और सात-आठ साल का बड़ा मासूम बेटा है. शाम को काम के बाद वो अक्सर मुझे ड्राप कर दिया करती थी।

उनका काम हमने बड़ी मेहनत से बिलकुल वक़्त पर पूरा कर दिया. वे बहुत खुश हुईं और काम की तारीफ़ में चहक कर कहा - very beautiful, really beautiful. बिल देख कर अलबत्ता शांत हो गईं. बहुत देर तक देखती रहीं. चूँकि पन्नों की संख्या अनुमान से ज्यादा हो गईं थी अतः रिपोर्ट की प्रति इकाई राशि अनुबंधित राशि से ज्यादा थी. इसके प्रति हमने उन्हें काम के मध्य में हीं आगाह कर दिया था, फिर भी ऐसा लग रहा था कि उनके ध्यान में इस चीज को पहली बार लाया गया हो. मैं घबरा रहा था कि कहीं बहस न करने लगें और पैसे कम करनें कि जिद न कर बैठें. बहुत देर तक बिल कि पड़ताल करनें के बाद मामले को रद्द करते हुए उन्होंने कहा - ok. मैंने धीरे-से संतुलित जबान में पूछा - इज इट पिंचिंग? उन्होंने तनिक मुस्कुरा कर व्यंग्य में कहा - पेन्नी ऑलवेज पिंचेज. इसके बाद अपने महंगे पर्स से चेकबुक निकला, मेरी संस्था का नाम कन्फर्म किया और बिलकुल लड़किओं वाली हैण्डराइटिंग में चेकबुक को भर कर अपना तिरछा दस्तखत उस पर दर्ज कर रूखी मुस्कराहट के साथ मुझे थमा दिया. राशि को दुरुस्त पाकर मेरा कलेजा जोर से धड़कने लगा. चेक को सावधानी से मोड़ते हुए मैंने गुनहगारों वाले लहजे में कहना हीं शुरू किया कि 'आई डोंट नो इफ वी हैव औनर्ड योर एक्स्पेक्टेसनस और नौट ...' कि उन्होंने काटते हुए कहा - नो, आई हैव नो प्रॉब्लम. इट इज रादर गुड. इट डीपेन्ड्स औंन दी हाईअर अथॉरिटी. मैंने उन्हें याद दिलाया कि काम के दौरान उन्होंने एक और बड़े काम का जिक्र किया था और कहा था कि वह इस प्रोजेक्ट के ख़त्म होते हीं शुरू हो जायेगा. उन्होंने कहा - नहीं, उसमें अभी देर है. अभी तो एडिटिंग हीं चल रही है. मैंने पूछा - क्या महीने-दो महीने. उन्होंने कहा - दो महीने तो नहीं, लेकिन महीना-भर लग हीं जायेगा. मैंने चिंता और आग्रह को मिला कर अतिशय विनम्र भाव से पूछा - विल इट कम टू अस, ऐज promised. अबकी-बार वे हंस पड़ी. कहने लगीं - इट शुड. अब मेरे पास कहने या पूछने को कुछ नहीं था. चलने की बारी थी. सोच रहा था कि कुछ अच्छा कह कर हाथ मिला कर चलूँ. इसी दौरान उनका मोबाइल बजने लगा और वे फोन पर बातें करने लगीं. मैं असहज बैठा दीवारों पर लगे नोटिस और पेंटिंग्स को देखने लगा, कि टेबुल को हल्के से थपथपाने की आवाज आई. मैंने देखा कि वो कान से मोबाइल लगाये शिष्टाचार-वाली मुस्कराहट लिए मेरी तरफ मुखातिब हैं. आँखों को हल्के-से बंद कर के उन्होंने इशारा किया कि मैं जा सकता हूँ. मैं उठ खडा हुआ. हाथ मिलाने की पहल करने कि हिम्मत न हुई. उनकी शान में गर्दन को झुकाया और मुड़ कर वापस चल पड़ा. एक दो कदम बढाया हीं था की पीछे से उनकी आवाज आई - सी यू सून. मैंने मुड़ कर उनकी बात को गर्दन झुका कर एक्नौलेज किया, संक्छेप में सीयू कहा और बहार निकल आया. मन अतृप्त और अनिश्चित था, लेकिन कदम बड़े इत्मीनान से उठ रहे थे. शायद पैसे पूरे मिल जाने की वजह से. अब देखो कि वो दोबारा बुलाती हैं कि नहीं (... क्रमशः )
संजीव रंजन, मुजफ्फरपुर

Wednesday, February 25, 2009

विश्व को ललकारने की धृष्टता - मित्र की राय सर आंखों पर

वीरेन्द्र के लेख पर प्रिय संजीव की टिपण्णी -आप ब्लॉग पर आए हम सब अनुगृहित हुए।जैसा की हम सब मित्रों की बरसों पुराणी राय रही है की आप बाचिक परमम्परा के दुरंधर एवं बेजोड़ रहें है.आपके इस अनमोल और दुर्लभ गुण के कारण , ज़माना गवाह है ,आपके मित्र कितना कुछ कर के आप का सानिध्य को बेचैन रहते है।संजीव का मतलब आनद और उल्लास पूर्ण सत्संग ( सात्विक लोग माफ़ करेंगें सत्संग शब्द के ऐसे प्रयोग से )और यह सत्संग ऐसा वैसा नहीं बल्कि , यह दिल मांगे मोर वाला ।खैर मित्र हम सब आपकी बहुमुखी प्रतिभा के पुराने मुरीद रहें हैं .और आप को हम सब घसीट कर यहाँ तक लाये यह अपार हर्ष का विषय है.और हम सब इसे अपनी उपलब्धि मानते हैं।रही बात आपकी टिप्पणी के लक्षणा अर्थ भेद की तो इसे विनम्र निवेदन मान कर पढा जाय ।विश्व को ललकारने का कोई चेतन प्रयास नहीं है। बल्कि यह एक इमानदार कोशिश है आस पास को समझने की । मैं और वीरेन्द्र अपने जीवन के ऊर्जा से सराबोर दौर में सहधर्मी और सह कर्मी रहें है.मिलाना महज संयोग नहीं था बल्कि अपनी आप बीती और जगबीती की तार्किक परिणति थी.हम सब जीवन के जिस पथ पर थे वह एक तरह निजी तो था पर उस दौरा -ऐ - ज़माना का हिस्सा था .परिस्थितियां सवालों को पैदा करती थी और उन सवालों को हम लोग अपने तमाम भोलेपन और अन्गढ़पने में , पर पुरी ईमान दारी से , उत्तर ढूँढ रहे थे । आज भी वो सवाल सामने से हटे नहीं हैं।हम यह तो नहीं कह सकते की उत्तर सही हैं या ये भी की सवाल वाजिब हैं .पर मित्र यकीन मानिए , पुरी संजीदगी और जिम्मेवारी के साथ प्रश्नों से साबका होता रहा है और इनको मन से बहिस्कृत नहीं कर पाये हैं.उत्तर खोजने की धृष्ट ता करते रहें हैं.सच कहें तो इसका एक अनोखा आनंद है।आपके प्रिय कवि सूरदास जी के शब्दों में कहें तो " सात स्वर्ग अपवर्ग सुख धरिये तुला एक अंग ,--, जो सुख सूर अमर मुनि दुर्लभ , वो सुख नन्द की भामिनी पावे "माता यशोदा कान्हा को थपकी देकर सुला रही हैं.सूरदास कहते हैं की सातों स्वर्ग और उसके सारे अप्वार्गों के सुखों को अगर तराजू के एक तरफ़ रख दिया जाय तब भी यह यशोदा के सुख के बराबर नहीं होगा .आप बीती को जगबीती का हिस्सा मानते हुए अगर सवाल खडा होता है और उसका ईमानदारी से उत्तर ढूँढने के प्रयास में अगर दुनिया को ललकारने की जरूरत हो जाय या दुनिया इसे चुनौती माने तो इस मामले में हम असहाय हैं .सादर

विश्व को ललकारने की धृष्टता - मित्र की राय सर आंखों पर

बिहार नायक तिरस्कार के अभिशाप की पीड़ा से जूझ रहा है

( वीरेन्द्र - अपने नए पोस्ट में बिहार के मौजूदा दौर की बदहाली के कारणों की तलाश इसके इतिहास में कर रहे हैं। लेख को पढ़ें और अपनी प्रतिक्रया से अवगत कराएँ ।)

बिहार नायक-तिरस्कार के अभिशाप की पीडा से जूझ रहा है

बिहार की वर्तमान दुरवस्था के लिए किसी एक कारण को चिह्नित करना गलत होगा. कोई चीज़ न तो एक दिन में बनती है और न ही एक दिन में मिटती है. भले ही आज बिहार बेहाली का पर्याय बना हुआ है, तो भी हमें झटके से यह नहीं मान लेना चाहिए कि मौजूदा बिहार एक ऐतिहासिक विचलन है, क्योंकि इतिहास में फिसलन इतना नहीं होता कि हम वर्तमान को उससे विलग कर समझ सकें. व्यक्तिगत तौर पर मैं मानता हूँ कि बौद्ध-मत के अलावा बिहार में ज्ञानोदय का कोई मुकम्मल दौर ज्यादा दिनों तक बरकरार नहीं रह सका. सच तो यह है कि बौध-धर्मं का स्वर्ण-काल भी कभी इतना ताक़तवर नहीं बना था कि उससे एक नई संस्कृति का सूत्रपात हो सके. धर्मं को जीवित रहने या रखने के लिए जरूरी है कि वह किसी नई आचार-संहिता अथवा संस्कृति का उत्स बने. बौध-धर्मं के काल में भी आचार-संहिता मनुस्मृति के नियमों के अनुरूप बनी रही. ब्राह्मणवादी सनातनी नैतिकता बौद्ध-मत को कभी भी स्वीकार नहीं कर पाई. उल्टे, उसके खिलाफ तरह-तरह की साजिशें कराती रही. कभी बुद्ध को नास्तिक करार देकर आम आदमी के मन में संशय के बीज बोने की कोशिश की गयी तो कभी उनकी आस्था की खिल्ली उडाई गयी. हम सभी जानते हैं कि बौद्ध-मत के समर्थन में एक तरफ अगर छोटी जातियाँ थीं तो दूसरी तरफ उसे सम्राट अशोक जैसे महान नृपतियों का भी राज्याश्रय हासिल था. लेकिन सदियों से दबी-कुचली और अनपढ़ रही इन निम्न जातियों के लिए यह संभव नहीं था कि वे अपने नए मत का कोई तार्किक और वैचारिक आधार ढूंढ पातीं. दूसरी तरफ राज्याश्रय की छत्रछाया में विकसित हो रहे इस धर्मं के प्रति ब्राह्मणी नैतिकता में सराबोर तत्कालीन बौद्धिक समाज की कोई खास रूचि नहीं बन पाई. कहने की जरूरत नहीं कि किसी नई विचाधारा को आगे बढ़ाने का काम उस समाज के बुद्धिजीवी ही करते हैं. चूंकि तब पढ़ने का अधिकार सिर्फ ब्राह्मणों या कह लीजिये द्विजों को था, इसलिए तब के हमारे समाज में अधिकाँश बुद्धिजीवी ब्रह्मण ही हुआ करते थे. ऐसे में यह अपेक्षा ही गैरवाजिब थी कि ये ब्राह्मण अपने धूर विरोधी के समर्थन में प्रचार-प्रसार करें. इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि राज्याश्रय की छाया हटते ही बौद्ध धर्मं का दायरा सिकुड़ता चला गया. अशोक के बाद के दिनों में खासकर पुष्यमित्र सुंग के शासन काल में बौद्धों के खिलाफ भरी दमन का सूत्रपात किया गया. लाखों की संख्या में बौद्ध भिक्षुक या तो मार दिए गए या फिर वे अपनी मातृभूमि से पलायन कर गए.

छठी सदी में हर्षवर्धन ने राजगीर में अंतिम बुद्धिस्ट काउंसिल बुलाई थी. इसे बुद्धिज्म का आखिरी पटाक्षेप भी कहा जा सकता है क्योंकि उसके बाद बौद्ध-धर्मं धीरे-धीरे अपने अवसान की ओर बढ़ता गया. उसकी प्राणशक्ति पर फिर से ब्राह्मणों का कब्ज़ा हो गया. बौद्ध-धर्मं के पुनर्जीवन की किसी भी संभावना को निरस्त करने के लिए पाखंड में सिद्धहस्त ब्राह्मणों ने उसी बुद्ध को विष्णु का दसवां अवतार घोषित कर दिया जो जीवन भर इसी पाखंड के खिलाफ लड़ते आया था. इतर विचारों को अपनाकर उसे अपनी तरह बना लेना ब्राह्मणों की सोची-समझी रणनीति रही है. अगर ऐसा न होता तो हमारे समाज में भगवान बुद्ध के जीवन से जुडी घटनाओं को लेकर कोई न कोई जीवंत लोक-उत्सव जरूर मनाया जाता. जहाँ हर छोटी-बड़ी बात अथवा घटना को लेकर जूलूस निकाले जाते हों, हर साधुनुमा आदमी की याद में हर गली, हर कूचे में सामूहिक आयोजन किये जाते हों, शोभा-यात्राएं निकली जाती हों, वहां आखिर ऐसी क्या बात हो गयी कि हमने महात्मा बुद्ध जैसे मनीषी की ऐसी अनदेखी कर दी. प्रति-संस्कृति के नायक की हत्या की सबसे आसान रणनीति यही है कि उसे तीज-त्यौहार, पूजा-उत्सव और मेला-बाज़ार के विमर्ष से बाहर कर दो. नायक-वध की ऐसी मिशाल आप कहीं और नहीं पाएंगे.

महात्मा बुद्ध की परम्पर की इस अनदेखी के लिए जिम्मेदार पूरा भारतवर्ष है, किन्तु सबसे ज्यादा बड़ा दोष तो बिहार का ही माना जायेगा क्योंकि बिहार ही उनका धर्मं और कर्म-स्थल रहा है। बिहार की दुरवस्था का एक कारण, मेरी समझ में, यही है कि उसने अपने इतिहास और धरोहर के प्रति बहुत ही कम संवेदनशील रहा है. नायक-पूजा जितनी बुरी बात है, उससे कहीं ज्यादा बुरी बात नायकों का तिरस्कार है. नायकों के प्रति मन में श्रद्धा का भाव ही किसी समुदाय अथवा समाज में उन्नयन के लिए सांस्कृतिक ऊर्जा प्रदान करता है.
वीरेन्द्र
( नोट - बिहार की दुरवस्था के दूसरे कारणों की पड़ताल अगली किश्तों में की जायेगी।)

Thursday, February 19, 2009

माटी का मोह - कथा कई समंदर पार से

( कैसा होता है माटी का मोह ? राजीव जी अपनी आपबीती बता रहें हैं इस पोस्ट में । इन्हें देश दुनिया का व्यापक अनुभव है .दुनिया के सारे समंदर पर कर चुके हैं और कथायों का भंडार है इनके पास । प्रस्तुत है पहली कड़ी )
प्रवासी भारतीय और भारतीय संस्कृति के लिए उनकी भावनाएं - एक व्यक्तिगत अनुभव (भाग १) -
कुछ रोज पूर्व एक मित्र से प्रवासी भारतीयों की भारतीय संस्कृति के प्रति आस्था पर बात हो रही थी. चर्चा छिडी के रिश्तेदार जब विदेश से आते हैं तो यहाँ के परिवर्तन से अनभिज्ञ होते हैं और अभी भी पुरानी व्यवस्था की उम्मीद करते हैं. उनके लिए समय ठहर सा गया होता है.
कुछ वर्ष पूर्व बैंकॉक में अपनी संस्था के लिए कार्य करते समय फीजी जाने का मौका मिला। वहां हमारे सम्पर्क अधिकारी भारतीय मूल के थे सतीश कुमारजी.
बड़े ही नेक व्यक्ति - भावुक, शिष्टः, और अतिथिप्र्यिय।
उन्होने दूसरे दिन ही अपने घर खाने पर बुलाया। मैं और मेरी Director जो ऑस्ट्रेलिया से थीं, शाम को उनके घर पहुंचे. स्वागत का अच्छा खासा इंतज़ाम था. दोस्तों, और रिश्तेदारों को भी बुला रखा था. सभी बड़े ही गर्मजोशी से मिले. उनके दादा, दादी भी मौजूद थे जो अपने बचपन में ,1930 के दशक में ,बक्सर के गाँव से अपने रिश्तेदारों के साथ गए फीजी आए थे . आपस में वे सब भोजपुरी और अंग्रेज़ी का मिला जुला रूप बोल रहे थे.
मिलते मिलाते मैं दादा दादीजी के पास पहुँचा और प्रणाम किया। दोनो ने आशीर्वाद दिया और अपने पास बैठा लिया.
मैंने खालिस भोजपुरी में पूछा,"आजी कईसन बानी" ?
भोजपुरी सुनते ही दादीजी ने मेरा हाथ पकड़ा और रोने लगीं।
धाराप्रवाह आंसूं बहने लगी और बोली,"बबुआजी राउआ हमरा देश से आइल बानी। आपन माटी के याद हरियर भ गईल"
दादाजी की भी आँखें गीली हो गयीं और वहां उपस्थित कई औरों की भी।
बहुत देर तक वो मेरा हाथ थामें रोती रहीं।
मेरी भी आंखे नम हुई. मेरी Director हतप्रभ थीं की क्या हो रहा है।
इस तरह की भावनात्मक अभिव्यक्ति से शायद अनभिज्ञ थीं।
दादी जी को चुप कराया गया। पर शाम भर उन्होंने मुझे अपने पास से हिलने नहीं दिया।
गाँव की कहानियाँ कहती रहीं। अपने घर, खेत, खलिहान, गाय, दोस्त, सखी, रिश्तेदारों की बातें बताती रहीं. जैसे अपनी यादें ताजी कर रही हों. उनलोगों का गाँव से सभी संपर्क टूट चुका था. कोई रिश्तेदार नातेदार नहीं रह गया था. पर यादें थी. ढेरों. और शायद इतने दिनों बाद उन्हें कोई मिला था जो उनकी यादों को उनकी तरह समझ रहा था.
उनके बच्चों ने भारत नहीं देखा था।
दादी और दादाजी की भावनाओं के प्रवाह में अन्य भी सराबोर थे। शाम इसी उत्साह में बीती।
शेष पुनः
राजीव

Tuesday, February 17, 2009

वैलेंटाइन डे के बहाने - चाल और चेहरा

(मित्र वीरू का वैलेंटाइन डे पर केंद्रित पोस्ट की दूसरी किस्त प्रस्तुत है। वीरेंदर का कहना है की इस विषय पर इससे ज्यादा शिष्ट वो नहीं हो सकते हैं .पढ़ें और अपने उदगार से अनुग्रहीत करें .)



वैलेंटाइन डे के बहाने: भाग II
अपने लेख के पहले अंश में वैलेंटाइन डे की मैंने जो दो छवियाँ दिखाई थी, उसमें एक त्राषद तो दूसरी प्रहसनमूलक मानी जा सकती है. पहली छवि त्राषद इसलिए क्योंकि उसमें रामजी की आड़ में वह सब कुछ किया जा रहा है जो भगवान श्रीराम की छवि से कोसों दूर है. जिस राम का नाम सुनते ही हमारे मन में निराशा के बीच आशा, दैन्य के बीच पुरुषार्थ तथा हैवानियत के बीच इंसानियत की भावनाओं का स्वतः संचार हुआ करता था, आज वही राम निरीह बना शैतानी तांडव देखने के लिए मजबूर है. मुझे अक्सर ऐसा लगता है कि जिस तरह सीता मैया को रावन ने धोखे से अपहरण कर लिया था वैसे ही मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को भी अ-रामों ने अगवा कर लिया है. राम की यह छवि कितनी दयनीय है! राम के बगूला भगत उन्हें लेकर गली गली में घूम रहे है और सबको बता रहे हैं कि देखो भगवान राम का कितना अपमान हुआ है. जिस राम के सामने त्रिलोक कांपता था, आख़िर उस राम के साथ बेअदबी से पेश आने की किसने हिमाकत कर डाली? जिस राम ने भक्तशिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास से भी अपने अपमान की बात नहीं कबूली, अब क्या हुआ कि वे रो-रोकर कभी किसी तोगडिया को, कभी किसी सिंघल को तो कभ किसी अडवानी को बिन पूछे बताये जा रहे हैं कि हे, मेरे सच्चे भक्त! तुम्हीं मेरा उद्धार कर सकते हो. अगर तुम्हारी थोडी-सी भी आस्था मुझमें है तो कसम खाओ कि तुम बाबरी मस्जिद को धूल-धूसरित कर दोगे; कि उसी जगह पर मेरा एक भव्य मन्दिर बनोगे. मैं वचन देता हूँ कि जिस दिन तुम ऐसा कर लोगे, उस दिन मैं तुम्हें और तुम्हारी पार्टी को केन्द्र कि सत्ता पर बैठा दूँगा. चाहो तो तुमलोग एक काम करके भी मेरा पूरा स्नेह और समर्थन हासिल कर सकते हो. क्या यह वाकई दुखद नहीं है?
गली-मोहल्ले के लुच्चे, लम्पट, लफंगे और दादालोग जिस तरह भारतीयता, राष्ट्र धर्मं और जातीय गौरव के नाम पर हर साल चौदह फरवरी को मानवीय प्यार का ज़नाज़ा निकालते हैं, उसे देखकर इतना तो कहा ही जा सकता है कि ये राम का मर्म जानते हैं और न ही उनका कर्म. अगर ये बौड़म राम के काल में पैदा हुए होते तो मुझे यकीन है कि ये राम और सीता को पुष्प-वाटिका में प्रवेश नहीं करने देते. इनकी नज़र में लक्ष्मणजी भी घोर पातकी कर्म कर रहे थे. बड़े भाई के प्रणय-निवेदन का चश्मदीद गवाह वे अकेले ही तो थे. नल-दमयंती, भरत-शकुंतला, अहिल्या-गौतम जैसे न जाने कितने पवित्र मनीषियों ने प्यार का पैगाम दिया है, आज यह बताने कि जरूरत नहीं है. हम जिस प्रेम को जानते हैं उसकी अभिव्यक्ति और उसका एहसास सिर्फ़ दो व्यक्तियों के लिए मायने रखता है. प्यार में तीसरे पक्ष की उपस्थिति ही गैरवाजिब है और इसीलिए उसकी छवि सदैव एक खलनायक की मानी गयी है. प्रेम सर्वथा सृजनकारी होता है. वह नूतन और अनदेखे सत्य का अन्वेषक होता है. वह नैतिकता, संस्कार और पवित्राचार की परम्परास्यूत परिभाषा को नवरूप देता है. प्रेम ऊर्जा का अक्षय भंडार होता है. वह न तो पुरातन है और न ही नवीन. वह चिरनवीन होता है. उसकी गरिमा इस बात पर निर्भर नहीं करती कि हम उसका इज़हार इस-उस या किस प्राकार करते हैं. लेकिन जो चीज इतनी सृजनकारी होगी वह अपने को स्थापित करने हेतु मौजूदा चीजों के क्रम में उतने ही फेर-बदल भी करेगी. इसके लिए हमें प्रेम के समाजशास्त्र से रु-ब-रू होना पड़ेगा.
स्थापित समाजों का इतिहास इस बात का गवाह है कि उनकी बुनियाद में प्रेम का कोई मसाला नहीं मिलाया गया है. भारतीय समाज तो व्यक्तिक प्रेम को सदैव एक विकार मानता आया है. स्त्री रूप में माया कि जैसी छवि हमारे धर्मं-ग्रंथों में उकेरी गयी है, वह कमोबेश आज भी हमारे मानस में रची-बसी है. पवित्रता-अपवित्रता के खानों में सजाया गया हमारा समाज सदैव एक जटिल संकुचन की पीड़ा से ग्रस्त रहा है. हम जो भी करें, हमें जाति, धर्मं, नाते-रिश्तेदारी, कुल-खानदान और हैसियत का ख्याल रखना पड़ता है. जो लोग वैलेंटाइन डे के बहाने प्रेम का प्रतिकार या तिरस्कार कर रहे हैं, वे बखूबी जानते हैं कि अगर हमारे समाज में व्यक्तिक प्यार को मान्यता मिल गयी तो न तो उनकी जाति बचेगी, न उनका धर्मं बचेगा और न ही बचेगा उनका कुल-खानदान. यह प्यार सबको भस्म कर देगा. और इसीलिए यह क्षयकारी रोग है, समूल विनाश ही उपचार है.

जय हो! जय हो!!