Wednesday, May 20, 2009

उन दिनों कैसा था पटना कॉलेज ! बिहार विमर्श -9

आलेख वीरेन्द्र . कैसा था पटना का पटना कॉलेज.अपनी ऐतिहासिक उपलब्धियों के बदौलत ,बिहार के सिरमौर कॉलेज के रूप में ख्याति रही है इस कॉलेज की .यह अंक पटना कॉलेज कथा की नवीनतम कड़ीहै . तो आप बीती पर उनके इस लेख में जमाने की शक्ल -ओ -सूरत भी साफ़ नजर आती है.इसे पढें और बिहार विमर्श के इस आयाम को विस्तृत करें.

पिछले अंक में मैंने आपसे वादा किया था कि मैं आपको पटना कॉलेज के छात्रों के गैर-शैक्षणिक सरोकारों से रु-ब-रू करवाऊंगा. तो आइये मेरे साथ और देखिये यह नज़ारा और सुनिए यह गल्प.

तो एक चक्कर लगा लें पटना कॉलेज का. अशोक राजपथ के उत्तरी किनारे पर बना यह कॉलेज अपनी ऐतिहासिक ईमारतों के लिए आज भी मशहूर है. कहते हैं, अंग्रेजों के ज़माने में यह नील व्यवसाय का केंद्र था और यहाँ नीलहे गोरे साहब रहा करते थे. पुराने पटना कॉलेज में ईमारतों के तीन खंड थे और तीनों बेहद ख़ूबसूरत कॉरिडोर से जुड़े हुए थे. अब यहाँ चौथा खंड भी है जिसमें मनोविज्ञान की कक्षाएं चलती हैं. 


लेकिन बिना प्रवेश द्वार पर रुके आप इस कॉलेज के गैर-शैक्षणिक सरोकारों से परिचित नहीं हो सकेंगे. अशोक राजपथ पर बने इस प्रवेश द्वार के दाहिनी तरफ रिक्शावालों ने अपना अवैध डिपो बना रखा है जबकि बायीं तरफ राजेन्द्रजी की ख्यातिलब्ध चाय की दूकान बरसों से उसी टूटी-फूटी अवस्था में विराजमान रही है. जिन छात्रों का कॉलेज के अन्दर दबदबा होता था, वे इस दूकान पर अवश्य बैठते थे. राजेन्द्रजी की दूकान पर एक साथ ही चाय की अंगीठी और चिलम की गूल जलते रहती थी. ऐसे में यह संयोग भर नहीं था कि उनकी चाय से भी गांजे की खुशबू हवा में बिखरती रहती थी. कुछ तो उनकी उम्र की वज़ह से और बहुत कुछ उनकी दुहरी उपयोगिता की वज़ह से, उस दूकान पर आनेवाला कोई भी छात्र उनसे बेअदबी से बात नहीं करता था. उनका दावा था कि वे कई पीढियों के बीच सेतु का काम करते रहे हैं; कि आज भी उनकी जान-पहचान बड़े-बड़े अधिकारियों के साथ है. खैर, राजेन्द्रजी खुद भी गांजे का निरंतर सेवन करते थे और अपनी उदारता से नए छात्रों को भी उत्प्रेरित करते थे. उनका मानना था कि गांजा स्वस्थ्य के लिए कतई हानिकारक नहीं होता क्योंकि यह शिव का प्रसाद है. अच्छी नीयत से गांजा पीनेवाला न तो कभी किसी डॉक्टर का मोहताज होता है और न ही उसे किसी के बारे में गलत सोचने या करने की फुर्सत होती है. वह तो खुद ही शिवमय हो जाता है. 
 
इस प्रवेश द्वार से पटना कॉलेज में दाखिल होते ही आप महसूस करेंगे कि अन्दर की दुनिया सिर्फ गांजे के धुँए में सराबोर नहीं है. सच कहा जाये तो पटना कॉलेज अपनी तमाम अधोगति के बावजूद अपना अपना शैक्षणिक वजूद बचाए रखने में कामयाब रहा था. यहाँ बिहार के सभी हिस्सों के वे मेधावी छात्र जो विज्ञान की पढाई नहीं कर सकते थे, इकठ्ठा होते थे. इसके अलावा, एक दस्तूर के रूप में जो बात हमारे दौर में स्थापित होती जा रही थी, वह यह थी कि प्रशासनिक सेवा में जाने का सबसे सुगम मार्ग कला विषयों के बगीचे से होकर गुजरता है. नतीजतन, साइंस कॉलेज से पटना कॉलेज आनेवालों छात्रों की भी अच्छी खासी तादात रहती थी. पटना कॉलेज में आने का मेरा भी अघोषित उद्देश्य यही था. चूंकि मैं विज्ञान का छात्र था, इसलिए कला विषयों के बारे मैं कोई बारीक समझ नहीं रखता था. हाँ, वरिष्ठ छात्रों से पता चला था कि समाजशास्त्र सिविल सर्विसेस की परीक्षा के लिए बेहतर विषय हो सकता है. सो, मैंने समाजशास्त्र का वरण कर लिया. 
 
वरण तो कर लिया किन्तु हासिल क्या हुआ? शिक्षकों की गुणवत्ता के आधार पर देखा जाये तो पटना कॉलेज का समाजशास्त्र विभाग का कोई ख़ास महत्व नहीं था. शुरू के एक-दो हफ्ते तो मुझे सबकुछ दिलचस्प लगा क्योंकि मेरे लिए यह एक नया विषय था. गोपाल बाबु, गोपी कृष्ण प्रसाद (GKP), सरदार देवनंदन सिंह (SDN) जैसे शिक्षक विभाग की शोभा बढा रहे थे. इनमें से अगर किसी एक के पास शिक्षक बनने की योग्यता और गरिमा थी तो वे थे GKP. सच कहूं तो उन्हीं की कक्षा में आभास होता था कि समाजशास्त्र में भी कुछ समझने की जरूरत है. वरना, दूसरे तो शायद ही कभी किस्सागोई की सरहद पार कर पाते थे. मिसाल के तौर पर मैं यहाँ SDN सिंह की शिक्षण-पद्धति के बारे में एक रोचक बात बताना चाहूँगा. चाहे वे मार्क्स के बारे में बताएं या मेक्स वेबर के बारे में, अंत वे खुद द्वारा ईजाद की गई एक रोचक पहेली से करते थे - 'मार्क्स (वेबर) के विचारों को न तो प्रूव किया जा सकता है, न ही डिसप्रूव किया जा सकता है, यह अंततः अनप्रूव्ड रह जाता है.' उनकी यह उक्ति इतनी बचकानी लगती थी कि मैं मन ही मन मुस्कराते रहता था. बाद में पता चला कि लालू प्रसाद यादव के शासनकाल में SDN सिंह पहले इंटरमेडीएट काउन्सिल के अध्यक्ष बने और बाद में मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरा के वाइस चांसलर. कुछ दिनों तक उन्होनें सुलभ इंटरनॅशनल को भी अपनी सेवाएं दी थीं. खैर, पढाई के मामले में खुद का ही भरोसा रहा. दीगर है कि पटना कॉलेज के होस्टलों में तब सभी विषयों के उम्दा छात्र रहते थे. उनसे बातें करके, उनसे नोट्स लेकर और उनके सुझाव सुनकर हम सबको बहुत कुछ सीखने का मौका मिल जाता था. 
 
पटना कॉलेज की बात चेतकर बाबा के ज़िक्र के बगैर अधूरा ही माना जायेगा. जी, चेतकर बाबा यानी चेतकर झा पटना कॉलेज के प्रिंसिपल थे. वे एक बिंदास व्यक्तित्व के मालिक थे और छात्रों में काफी लोकप्रिय भी थे. धोती के ऊपर कोट पहने हुए, हाथ में छाता या छड़ी लिए, पान चबाते हुए जब वे पटना कॉलेज की मटरगश्ती करते तो एक अजीब दृश्य उपस्थित हो जाता. वे खुद किसी से न डरते थे और उनसे भी शायद ही कोई डरता था. आपको जानकर हैरत होगी कि वे राजनीतिशास्त्र के शिक्षक थे और लास्की के निर्देशन में लन्दन स्कूल ऑफ़ इकोनिमिक्स से डॉक्टरेट की डिग्री प्राप्त की थी. उनकी छात्रप्रियता की एक मिसाल मैं बयां करना चाहूँगा. स्नातक की परीक्षाएं चल रहीं थीं. राजनीतिशास्त्र का एक पेपर लीक से हटकर था, सो छात्रों ने उस पेपर का बहिष्कार कर दिया था. वाइस-चांसलर अडिग थे कि उस पेपर की दोबारा परीक्षा नहीं होगी. छात्र असमंजस में थे कि क्या करें, क्या न करें. लेकी जाको रखी साइयां, मार सके न कोई. सो, छात्र हार-थककर बाबा के पास पहुंचे. बाबा ने आने का कारन पूछा तो छात्रों ने बताया कि वाइस-चांसलर किसी की नहीं सुन रहा है और कह रहा है कि जिसे जो करना हो कर ले. छात्रों ने यह भी बताया कि करने के लिए तो हम उनका कुछ भी कर सकते थे, किन्तु पटना कॉलेज और आपकी आन में हम कोई बट्टा नहीं लगाना चाहते थे. बाबा खुश हुए और कह दिया कि जाओ, तयारी करो, आगे का काम मेरा है. ख़ुशी में छात्रों ने नारा लगाया, "राइट और रौंग, बाबा इज स्ट्रौंग'. जी, ऐसे मनोहारी थे हमारे प्रिंसिपल साहब.  
 
राजनीतिक रूप से आठवें दशक की शुरुआत को संक्रमण का दौर कहा जा सकता है. पूर्ववर्ती दौर की प्रगतिशीलता अब शिथिल हो रही थी और उसकी जगह एक नई पतनशील राजनीतिक संस्कृति तेजी से अपने पाँव पसारती जा रही थी. पढ़नेवाले छात्र इस राजनीति से पूरी तरह विमुख थे और जो छात्र राजनीतिक मंचों पर चहलकदमी कर रहे थे उनका पढाई से दूर का भी कोई रिश्ता नहीं था. ऐसे में छात्र संघ का चुनाव नए राजनीतिक मुहावरों की अजीबोगरीब नुमाईश का अवसर प्रदान करता था. जातीय सभाओं का आयोजन करना सभी प्रत्याशियों के लाजिमी माना जाता था. इन्हीं जातीय सभाओं में उम्मीदवारों के चयन पर अंतिम मुहर लगाई जाती और यहीं पर तय होता कि प्रचार के दौरान क्या कुछ किया जाना है. तो आईये मैं आपको बारी-बारी से भूमिहार और राजपूत की सभाओं में ले चलता हूँ. 
 
पटना विश्वविद्यालय का सीनेट हॉल ऐसी जातीय सभाओं के आयोजन के लिए सबसे उपयुक्त स्थान हुआ करता था. कभी-कभी ये सभाएं किसी हॉस्टल में भी आयोजित की जाती थीं. वैसे तो जातीय सभाओं में किसी गैर-जाति के सदस्य की उपस्थिति न सिर्फ वर्जित थी, अपितु खतरनाक भी मानी जाती थी, किन्तु अगर आपका कोई भरोसेमंद दोस्त उस जाति का है तो आसानी से घपला किया जा सकता था. मैंने भी किया था- अपने खांटी भोजपुरिया दोस्त गणेश ठाकुर के साथ. गणेश ठाकुर पहले भोजपुरिया था, बाद में भूमिहार या कुछ और. इस तरह मुझे पहली दफा एक जातीय सभा में शरीक होने का मौका मिला था. सीनेट हॉल के मंच पर भगवान परशुराम की तस्वीर राखी गयी थी. मंच पर विराजमान होनेवाले सभी नेतागण बारी-बारी से उस तस्वीर पर माल्यार्पण कर रहे थे. अब तो मुझे उन नेताओं में से ज्यादा के नाम याद नहीं हैं, लेकिन इतना ज़रूर याद है कि शम्भू सिंह (1982 के छात्र संघ चुनाव में भूमिहारों की तरफ से अध्यक्षीय उम्मीदवार थे) व अनिल शर्मा की मौजूदगी मंच की शोभा बढा रही थी. यही अनिल शर्मा आज प्रदेश में कांग्रेस के अध्यक्ष हैं. इस सभा में सभी प्रत्याशियों को अपनी उम्मीदवारी के समर्थन में तर्क प्रस्तुत करने होते थे. हर उम्मीदवार भगवान परशुराम के ऐतिहासिक कारनामों स्मरण करने के पश्चात भूमिहारों की खंडित एकता पर आंसू बहाता और संकल्प लेता कि वह अपने प्राणों की आहूति देकर भी इस धरा से एकबार फिर क्षत्रियों का समूल नाश करेगा. यह भी बताया जाता कि कैसे वह अपनी जाति के ठेकेदारों को पटना विश्वविद्यालय के निर्माण कार्यों में शरीक कराने में सफल रहा. सभा की समाप्ति से पहले उपस्थित लोगों से अपील की गयी कि जातीय एकजूटता के संकल्प को और पुख्ता बनाने के लिए सब्जी बाग स्थित भगवान परशुराम के मंदिर में माथा टेका जाये. मुझे पहली दफा पता चला कि सब्जी बाग में भगवान परशुराम का कोई मंदिर भी है. 
 
अब चलिए राजपूतों की सभा में. यह सभा विधि कॉलेज के हॉस्टल में आयोजित की गयी थी. दद्दा के नाम से मशहूर अशोक सिंह इस सभा की अध्यक्षता कर रहे थे. समीर सिंह जो एक पुराने कांग्रेसी परिवार से ताल्लुक रखते थे, राजपूतों की ओर से छात्र संघ चुनाव में अध्यक्षीय उम्मीदवार थे और वे भी मंच पर विराजमान थे. लेकिन सबकी दिलचस्पी सचिव पद के उम्मीदवार सत्येन्द्र सिंह में ज्यादा दीख रही थी. कारण यह था कि पिछले दिनों बी.एन. कॉलेज में एक भूमिहार छात्र की हत्या की गयी थी और सत्येन्द्र सिंह उसके घोषित कातिल थे. वैसे तो सचिव पद के लिए दूसरे उम्मीदवार भी थे, किन्तु सत्येन्द्र सरीखा दमदार उनमें दूसरा कोई न था. समीर सिंह ने अपने भाषण की शुरुआत करते हुए राणा प्रताप को याद किया और बाद में सिलसिलेवार तरीके से बताया कि उन्हें अपनी जाति के छात्रो को कॉलेज से छात्रवृति दिलवाने में कितने पापड बेलने पड़े; रानीघाट से साइंस कॉलेज तक जो सड़क बनाई गयी उसका ठेका किसी राजपूत को दिलाने में उन्हें कितना ऊंचा-नीचा करना पडा. अध्यक्ष पद के उम्मीदवारों के बोल लेने के पश्चात सचिव पद के उमीदवारों को अपनी-अपनी बात कहने का मौका मिला. अभी कोई नाम याद तो नहीं है, किन्तु इतना ज़रूर याद है कि सत्येन्द्र सिंह के अलावा सचिव पद का एक और उम्मीदवार भी था. पहले बोलने की बारी उसी की थी. उसने बोलना शुरू किया ही था कि सत्येन्द्र सिंह अचानक व्यग्र हो उठा. लोगों को अकस्मात खतरे की घंटी सुनाई पड़ने लगी. सचिव पद का दूसरा उमीदवार अचानक विनम्र हो उठा, अपनी गलती स्वीकार की और भाई सत्येन्द्र के समर्थन में तन, मन व धन से अपना योगदान देने के लिए उत्कंठित हो उठा. सभा निःशब्द हो उठी. सत्येन्द्र ने बोलना शुरू किया. बिना किसी लाग-लपेट के उसने सभा की ओर एक सवाल उछाला. वह जानना चाहता था कि अगर सभा में उपस्थित सभी लोग असल में राजपूती बूँद हैं तो फिर मुझे बताया जाये कि मैं उस बिरादरी में कहाँ हूँ. सभा में सत्येन्द्र भैया की जिंदाबाद के नारे लगाने लगे. कहा गया कि आप से बढ़कर यहाँ कोई राजपूतों का हितैषी नहीं है. इत्ते पर भी जब सत्येन्द्र भैया को संतुष्टि नहीं हुई तो वे खड़े हो गए और लगे बोलने अपनी मातृभाषा भोजपुरी में, "हमरा पिछला साल दुगो केस में जेल जाये के पडल, हम पूछ्तानी कि हम काहे गइलीं जेल में? हमरा बाबु के कवनो गेहूं न कटाईल रहे, ना केहू हमर माई-बहिन के बेईज्ज़त कइले रहे. हम गईल रहीं आपन भाई लोगन के ईज्ज़त बचावे खातिर. लेकिन आज एह मंच पर सब लोग एह तरह से आपन राजपूती कारनामा बतावत बा जईसे ऊ लोग ना रहित त पटना विश्वविद्यालय में ठकुररईती खत्म हो जाईत. हम पूछ्तानी कि जे लोग चुनाव लादे खातिर मुहं बईले फिरता, ऊ कबहूँ गोलियों-बन्दूक चलवले बाडन, कतहूँ बम फोडले बाडन? त भैया गोली-बन्दूक हम चलाईं, बाकि नेता कोई दोसर बने. ई कहवां के न्याय ह. हम एलान करतानी कि अबकी हमहूँ चुनाव लड़ब, जेकरा में जोर होई, ऊ सामने आई.' और इसी तरह की कई फब्तियां और भी सुनते रहे लोग. 
 
सत्येन्द्र की बातों से असहमति तो किसी को नहीं थी, किन्तु कुछ असंतुष्ट किस्म के लोगों को आधिकारिक उम्मीदवारों के खिलाफ अपनी भंडास निकालने क मौका अवश्य मिल गया. इन्हीं में से एक थे सुनील सिंह. वे समीर सिंह के साथी थे, उन्हीं की तरह हमेशा सफ़ेद कुर्ता-पायजामा पहनते थे और नेता बनने का सपना पालते थे, इसलिए दाढी भी रखते थे. वे गुपचुप तरीके से आस लगाये बैठे थे कि इसबार उन्हें राजपूत समाज चुनाव लड़ने का मौका देगा. लेकिन किस्मत के ओछे थे, और उनकी मानें तो समीर सिंह ने ही उनका पत्ता काट दिया था. सभा के समापन के पश्चात उनसे मिलना हुआ तो वे अनायास ही फूट पड़े. लगे, कहने लगे, "वीरेन्द्रजी, आप ही बताइए कि जिस माली ने एक छोटे से पौधे को दिन-रात रखवाली करके धूल-धूप और आंधी से बचाया हो, वही पौधा बड़ा होकर अपनी छाया से माली को ही वंचित कर दे, तो उसे कैसा लगेगा?" मैंने फ़ौरन कहा कि यह तो बेअदबी होगी और हमारे समाज में इस बेअदबी को पसंद नहीं किया जाता. वे आश्वस्त हुए और बताने लगे कि समीर सिंह ने उनकी पीठ में छुरा कैसे भोंका है. मैंने किसी तरह उन्हें शांत किया और विशवास दिलाया कि अगली दफा उनको ज़रूर टिकट मिलेगा. पता नहीं, क्या सोचकर वे सचमुच शांत हो गए और फिर करने लगे इधर-उधर की अनेक बातें. 
 
ऊपर की बातें सुनकर कोई सहज ही अनुमान लगा सकता है कि आठवें दशक का पटना कॉलेज सिर्फ लम्पटों-लुहेडों का जमघट भर था. लेकिन यह इतना छोटा सत्य होगा कि उसकी अनदेखी कर देने में कोई बड़ा गुनाह नहीं हो जायेगा. बिहार के छात्रों के लिए पटना विश्विद्यालय प्रतिभाओं का ऐसा महाकुंड था जिसमें स्नान कर लेने भर से ही काया में कांति पैदा हो जाए. शिक्षक हों न हों, बुरे हों या अच्छे हों, कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि पढाई तो छात्र आपस में एक दूसरे की मदद कर पूरी कर लेते थे. यह अजब भले लगे, किन्तु है सच कि पटना कॉलेज में आकर कई निपट देहाती छात्र भी अंग्रेजी बोलने लगते थे या कम से कम में अंग्रेजी में पढ़ने और लिखने लगते थे. हॉस्टल के छात्र आपस में जिन मुद्दों पर बातचीत करते, उनमें तर्क और अनुभव की ऊष्मा मौजूद रहती. जो छात्र देखने में निहायत ही लम्पट जान पड़ते, वे भी गज़ब के सृजनशील होते. मेरा तो मानना है कि लम्पटई (गूंदागर्दी नहीं) के लिए जितनी बुद्धिमत्ता और परिहास बुद्धि की ज़रुरत होती है, उतनी किसी कक्षा में अव्वल आने के लिए भी नहीं होती. पटना कॉलेज के ज़्यादातर लम्पट सृजनशील प्रकृति के थे. यह अलग बात है कि उनकी प्रतिभा के प्रस्फूटन के लिए वहां कोई मुक्कमल रास्ता नहीं था. मैंने महसूस किया है कि अगर उनमें अपने लिए थोडा और प्यार होता, थोडा और अनुशासन होता तो उनमें से कई आज साहित्य और फिल्म की दुनिया में अपना नाम रौशन कर रहे होते.  
 

आज जब पलटकर देखता हूँ तो भी पटना कॉलेज के बारे में मुझे कुछ भी बुरा नहीं लगता है. एक अजीब मोहकार्षण आज भी दिल पर तारी हो जाता है. हॉस्टल में पंडीजी के मेस में जो खाना पकता था, उसे देखकर भले ही किसी अज़नबी को वितृष्णा हो जाये, किन्तु हमें वह ज्यादा कुछ बुरा नहीं लगता था. मज़े की बात देखिये कि आरा में पढ़नेवाले मेरे मित्र जब कभी पटना आते तो इसी खाने को देखकर लार टपकाने लगते और हमें एहसास करा जाते कि हम नाहक ही अपनी नियति का रोना रोते रहते हैं. बात बात में वे अपने पंडीजी को गालियाँ देते कि इतना पैसा लेकर भी वह हमें गर्मी भर 'ललका साग' और रोटी खिलाता है. सच ही, पटना कॉलेज अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद हम सबके लिए एक मोहक और रमणीक स्थल था जहाँ जीवन का हर रंग अपनी बेबाकी में मौलिक और मोहक प्रतीत होता था. मुझे पटना कॉलेज से मोह है और इसीलिए हमेशा दुआ करता रहता हूँ कि कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन. 

वीरेन्द्र  


 

2 comments:

संगीता पुरी said...

उन दिनों के पटना के पढाई लिखाई के वातावरण से रूबरू कराता यह आलेख अच्‍छा है .. पर निश्चिंति से कभी सारे को पढूंगी .. तब अधिक समझ में आएगी बात।

रंजीत said...

bahut achha sansmaran... lagta hai wahin kahin hun... dhanyawaad
Ranjit