Monday, May 25, 2009

बिहार का चुनाव परिणाम - बदलता बिहार ?

बिहार में परिवर्तन ,विकास की शक्ल अख्तियार कर रहा है .जिस किसी से बात करें वो इस की पुष्टि करेगा.ऐसा लगता है की लम्बे ठहराब के बाद पहली बार कुछ सकारात्मक होते घटते लोग बाग़ देख रहें हैं. एक सपना बुनने लगे हैं लोग.उन्हें उम्मीद की किरण दिखने लगी है.

पिछले २५-३० सालों में करोडों बिहारी रोजी रोटी की तलाश और पढाई लिखाई के लिए बिहार से बाहर निकले. बिहारी श्रम और मस्तिष्क देश के हर कोने में हाजिर है.बाहर रहने वाले इन बिहारियों को अगर आर्थिक शरणार्थी कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी.भारत के हालिया आर्थिक विकास में बिहारियों खास कर बिहारी श्रम का कितना योगदान है ? यह प्रश्न अलग शोध की मांग करता है .

अब तक बिहार और बिहारी नकारात्मक ढंग से ही बिहार के बाहर लिया जाता रहा है . बाहर में रहने वाले बिहारियों के लिए अक्सरहां यह संबोधन अपमानजनक लगता रहा है. ऐसी क्या बात है की किसी बंगाली को बंगाली और पंजाबी को पंजाबी संबोधन अपमान जनक नहीं लगता है ? पर आप किसी भी आप्रवासी बिहारी से बात करें , बाहर में बिहारी संबोधन उसे गाली जैसा बेधता है .बिहारी होना और उसके इर्द गिर्द बनाने वाली पहचान उसे परदेसी जीवन की भागदौड़ और बने रहने के जद्दो जहद में वे बजह की बाधक लगती है. यह शब्द अपमान और तिरस्कार का बोध जगाता है. बाहर के लोग कहते
हैं की भाई ,अगर बिहारी हो तो बिहारी कहलाने और सुनने में कैसा अपमान और किसी लज्जा? बहुत कुछ उसी तरह ,जैसे की जातिगत अंहकार और श्रेष्ठता के दंभ
में अक्सरहां लोग बाग़ कहते मिल जाते हैं की अगर कोई चमार है तो उसे चमार न कहा जाय तो क्या कहा जाय ? चमार कहे जाने की चुभन को तो कोई चमार ही महसूस कर सकता है.बिहारी कहे जाने पर हिय के शूल को सिर्फ प्रवासी बिहारी हीं महसूस कर सकता है ! प्रवासी बिहारी कि परदेस में वही गति है जो हिन्दू समाज में दलितों की है . दोनों अपने भूत से भाग रहे हैं. वर्तमान दोनों के लिए दुखद है ,ये शब्द गौरव नहीं हीनता बोध कराते है . दलित और प्रवासी बिहारी दोनों , अपनी पहचान , छिपाने को अभिशप्त दिखाते हैं.

जानकार विश्लेषक कह रहें हैं की बिहार बदल रहा है .हालिया चुनाव परिणाम बदलते बिहार के नजरिये से देखा जा रहा है.

बिहार में जो सुखद बदलाब आ रहा है वह किसी से छिपा नहीं है . परिवर्तन की दिशा ठीक है . परिवर्तन समग्र विकास का रूप ले . हर इलाके और समाज के हर तबकों को शामिल करे , इस की गति तीव्र हो , भला इन बातों से किसे इनकार होगा .
बिहार में पिछले साठ सालों में किसी न किसी रूप में सरकारी तंत्र , शासन , विकास सब पर जातिवादी एकाधिकार , पक्षपात और लूट खसोट हावी रहा .
राजनैतिक हुकूमत ,शासन की आड़ में नंगा जातिवादी खेल , पचास के दशक से ही चालु है .यह अलग बात है की पासा पलटने पर कुछ तबके ज्यादा जोर से चिल्लाते रहें हैं.
लोकतांत्रिक चेतना के विकास के इस दौर का तकाजा है - सामजिक न्याय के साथ विकास . जो कोई भी इस कसौटी पर खरा नहीं उतरेगा वह देर सबेर हासिये पर फ़ेंक दिया जाएगा.
तो क्या बिहार में बरसों से जारी विकास के नाम पर लूट खसोट और जातिवादी एकाधिकार की प्रवृत्ति की उलटी गिनती शुरू हो गयी है ?
क्या वाकई सामजिक न्याय के साथ विकास की शुरूयात हो गयी है ?
इस पर कुछ कहेंगें तो विमर्श आगे बढेगा.

1 comment:

रंजीत said...

abhee sirf samarthan dene layak baat hee hai, pata nahin Credit dene layak sthiti kab tak aayegee. Mansha aur murta me antar to hamen karna hee padega anyatha yah baat bhee nare me hee simatkar rah jaayegee.