Thursday, April 16, 2009

अथ स्कूल कथा : कैसा था पटना का यह स्कूल १९७५ में ?

ग्रामीण छात्रवृति योजना के तहत मेरा चुनाव हुआ और जनवरी सन १९७५ में मेरा दाखिला पटना कौलेजिअट स्कूल में हुआ. रहने की व्यवस्था स्कूल होस्टल में. दाखिले के समय मैं ग्यारह साल का था .

छात्रवृति की यह योजना ग्रामीण छात्रों के लिए थी. हर प्रखंड से दो छात्रों का चयन द्वि स्तरीय लिखित परीक्षा के माध्यम से किया जाता था . चयनित छात्रों को जिला स्कूल में प्रवेश दिया जाता था .और रहने की व्यवस्था स्कूल हॉस्टल में की जाती थी . शुक्र है सरकार की इस योजना का की गाँव का लड़का राजधानी के स्कूल में आ गया .१९७५ में सौ रुपये की मासिक छात्रिवृति मिलती थी. हम सब का कदम कुँआ में स्टेट  बैंक की एक शाखा में बैंक अकाउंट खोला गया था. हर महीने हम सब बच्चे अपना अपना चेक खुद भर कर प्राचार्य महोदय से दस्तखत करा कर बैंक जाते और पैसे लेकर आते .छोटी उम्र में हीं बैंक से यह बढ़िया एक्सपोजर था . दृष्टि पात करने पर लगता है की बैंक में जगह की कमी के वावजूद कर्मचारी कार्य कुशल थे , बैंक में कुशल व्यवस्था थी और हम सब के चेक का भुगतान शीघ्र हो जाता था .

होस्टल की भव्य बिल्डिंग थी . बड़े बड़े कमरे और चौडे ओसारे .बीच में लॉन और किनारे में अशोक के बड़े पेड़. लॉन में दो चार नल लगे थे जहां हम सब के खुले में नहाने की व्यवस्था थी. होस्टल के चारों तरफ चहारदीवारी थी और दक्षिण तरफ बड़ा सा खेल का मैदान.हॉस्टल से सटे हॉस्टल अधीक्षक श्री जंग बहादुर लाल का आवास था . तीन चार बजते बजते स्कूल का विशाल मैदान हॉस्टल और आस पास के मुहल्लों के बच्चों से भर जाता था .बच्चे गुल्ली डंडा से लेकर क्रिकेट , फुटबाल तक में लग जाते थे . होस्टल के प्रवेश द्वार के साथ हीं स्कूल प्रिंसिपल श्री त्रिवेणी सिंह का आवास था. स्कूल परिसर में नीम और आम के विशाल पुराने दरखत थे और ढेर सारी चिडियों  की आश्रय स्थली .शाम होते ही पूरा परिसर तरह तरह की पक्षियों की चहचाहट से गुन्जायीत होता था.

हॉस्टल में १००-१५० , आठवीं से लेकर ग्यारहवीं तक के लड़के रहते थे .अस्सी प्रतिशत बच्चे ग्रामीण छात्रवृति योजना के तहत चयनित .और कुछ को छोड़ कर सब ग्रामीण और छोटे कस्बाई पृष्ठभूमि के . हम सब के लिए शहर में रहने का यह पहला अनुभव था .होस्टल में सटे दो मेस था . दोनों में से किसी में आप शामिल हो सकते थे . दिन में दो वार चावल , दाल सब्जी और भुजिया का भोजन .दाल पतला . सब्जी में मुख्य  रूप से आलू और वो सब्जियाँ जिनका सीज़न पार हो रहा होता था .भुजिया मुख्य रूप से आलू की जिसमें नाम मात्र का तेल और फोरन होता था . शुरुआत में तो कुछ स्वाद लगा पर बाद में मेस का खाना तो हम सब बच्चे भूख के जोर पर हीं भीतर ठेल पाते थे. फरबरी के महीने में माँ पटना आयी . बेटे की हालत देख कर आधा लीटर दूध रोजहा का इन्तेजाम कर गयी.दरिया पुर मोहल्ले का एक सख्श होस्टल में कुछ लड़कों को दूध दे जाता था.लेकिन लगता है की दूध में मिलावट शुरू हो चुकी थी और मुझे उस दूध के स्वाद का स्मरण कर आज भी उबकाई आती है.  खाने का चार्ज महीने का साठ रूपया . सौ रुपये की मासिक छात्रवृत्ति में मेस चार्ज के बाद चालीस रुपये हाथ में बच जाते थे. और खर्च करने के लिए पटना का पूरा बाजार था .

पटना कौलेजिअट स्कूल , पटना शहर का पुंरानास्कूल है . ब्रिटिश शैली में बनी हुई स्कूल की 
भव्य इमारत . गोल ऊँचे पाए . मुख्य भवन के सामने सुन्दर पार्क . उस पार्क में ऊँचे छोटे घेरे में पानी भर कर कमल के फूल की व्यवस्था थी. पहली बार जब देखा था तो कुछ कुछ जादूई लगता था . स्कूल इमारत के इतिहास की ठीक ठाक जानकारी नहीं है पर निसंदेह भवन उन्नीसवीं सदी का है. और यह पटना के चंद भव्य और खूबसूरत इमारतों में से एक रहा होगा . जिस किसी ने स्कूल परिसर की परियोजना बनायी थी उसने ने सारी व्यवस्था ग्रैंड स्केल पर किया था. 

 तो हम सब गाँव के बच्चे पटना शहर के इस पुराने स्कूल में रहने और पढ़ने लगे.पटना शहर के नापने और तौलने लगे.हथुआ मार्केट जाना और आते समय गोल गप्पे ( जिस हम सब फोचका कहते थे )और आलू टिक्की चाट खाना मुख्या आकर्षण रहता था . सब्जी बाग़ भी जाते थे.सब्जी बाग़ में बेकरी की दुकानें और तरह तरह की पाव रोटी और बिस्कूट . कोको कोला , चाट और सिनेमा से हम सब का परिचय हो रहा था .मेरे लिए पहली फिल्म थी रूपक में जे संतोषी माँ और फिर बाद में एलिफिंस्टन में शोले और वीणा में सन्यासी .साल भर में मैं पंद्रह बीस फिल्में देख लिया .एक मित्र देखी हुयी सारी फिल्मों का लिस्ट बना ता था . मैंने भी लिस्ट बनाना शुरू किया .साल के अंत में यह लिस्ट माँ के हाथ लग गयी . माँ ने पिटाई तो नहीं की पर पुरे घर में बड़ी बदनामी हुयी.याद करें यह वो दौर था जब सिनेमा को अभिभावक गण हेय दृष्टि से और बहुत हद तक अशलील और बच्चों के बच्चों को बिगाड़ने के शर्तिया नुख्से के तौर पर लेते थे . 

  यहीं क्रिकेट से परिचय हुआ .पर फिल्ड में खेलते समय अक्सरहां सब्जी बाग़ के बदमास और बड़े बच्चों से जूझना पड़ता था . एक से एक भद्दी भद्दी गालियाँ देते थे और उनका मन किया तो हम सब का बात बल भी छीन लेते थे .कुछ बड़े लड़के , दाढ़ी बनाने वाले उस्तरे साथ रखते थे और उसी से हम सबों को डराते थे.मार पीट तो कम लेकिन उन लड़कों के डराने का स्वांग हीं हम सबको बेहद भयभीत किये रहता था.पटना शहर में ७० के दशक में दुर्गा पूजा से लेकर छठ पर्व तक तरह तरह के शास्त्रीय संगीत के बड़े बड़े कार्यक्रमों का आयोजन होता था .और पटना कौलेजिअट स्कूल का मैदान इन आयोजनों की मुख्य स्थली होती थी. 

स्कूल में हमारे गाँव के स्कूल के लिहाजन अनुशासन ढीला ढाला था .कुछ दादा किस्म के लड़के हॉकी  सटीक 
 लेकर घूमते  थे. छात्रों पर शिक्षकों का अनुशासन था .आम तौर पर शिक्षक भी योग्य थे .एक दिल दहला देने वाला वाकया  याद है. हिंदी के एक शिक्षक शर्माजी थे . स्कूल परिसर में हीं उनका आवास था . पता नहीं  पढाने में उनकी योग्यता क्या थी ? ठीक से याद नहीं है .एक दिन क्लास में पता नहीं , एक बच्चे ने क्या गुस्ताखी कि शर्मा ने उस बच्चे को क्लास में आगे लाकर बेतरह पीटा. छोटा बच्चा रोता हुआ अपनी बेगुनाही और क्षमा याचना करता रहा .पर शर्मा ने कोई रहम नहीं किया .हम सब बच्चे पूरी तरह से आतंकित हो गए थे . इतने सालों के बावजूद जब भी इस वाकये का स्मरण होता है शर्मा के लिए मुंह में भद्दी गाली आती है.

राष्ट्रीय स्तर की मेधा छात्रवृति के बदौलत मैं १९७६ के मध्य में मेरा दाखिला नैनीताल के एक प्रतिष्ठीत आवासीय स्कूल में हो गया .पटना कौलेजिअट स्कूल में बिठाये डेढ़ साल कई मायनों में याद गार रहे .कई तरह के नायब अनुभव हुए. शहर में रहने का यह पहला अनुभव था .शहर की विशालता , सुविधायों ,जददो - जहद और खास तरह की गुमनामी का अहसास उस कच्ची उम्र में भी हो रहा था .पर समग्रता में कहूं तो ये सारे अहसास बेहद सुखद थे . शायद हर बचपन और कैशोर्य जीवन के तमाम उतार चढाव और संघर्षों के वावजूद सुखद हीं होता है .

शहर के पहले स्कूली अनुभव की बाकी यादें  बाद में .

 
 

1 comment:

Viru said...

मित्र कौशल, ढूंढ ही लिया न आखिर आपने मोती? ऐसा स्मरण और इस तरह लिखा हुआ कि मैं भी जा पहुंचा अपने हरप्रसाद दास जैन स्कूल में. सब आपकी तरह नसीब के मालिक नहीं होते, क्योंकि पटना सबका जिला नहीं होता. जिसका जिला राज्य की राजधानी भी हो, वही तो सीधे गाँव के स्कूल से उड़कर पटना पहुंचेगा. माना कि खाने के नाम पर अखाद्य मिलता था और भूख की पीडा में आप सब बच्चे उसे खा भी लेते थे, किन्तु क्या इसी बिना पर आपके पटना-सुख पर ऐतिहासिक ईर्ष्या न करुँ? मित्र, इतना उदार हुआ नहीं जाता. उस उम्र में जिसे पटना मार्केट जाने का मौका मिला होगा, वह आज भी मेरे लिए घोर ईश्वरीय अनुकम्पा का प्रतीक है. कुछ और कहिये न, मन नहीं मानता कि आपने पूरी बात कह दी है. छुपाकर क्या करेंगे?

वीरेन्द्र