Friday, April 24, 2009

चल रे मन कहीं और चल .

चल रे मन कहीं और चल
ले चल मुझे सावन के फुन्हारों के बीच
पूर्वा हवा और सफ़ेद दीवाल बना ,
आता हुआ बारिस का झोंका .
कुएं के पास की दीवाल पर चढ़ ,
पेड़ के पके अमरुद के पास
कि झट पट खायूँ ,
उतरूं और भागूं घर की ओर .
बारिस से बचते - बचाते हुए .

चल रे मन , कहीं और चल
भादो - आसीन के धान के खेतों से गुजरते रास्तों पर चल .
गदराते धान के खेत ,
और उससे गुजरती आरियों पर ,
साफ़ पानी से भरे हुए धान के खेत ,
पयीन ,अहरी और उसमें स्वछन्द तैरती अनगिनत छोटी मछलियों के बीच
पकड़ने दे उन्हें अपनी नन्हीं अँगुलियों से .

चल रे मन कहीं और चल
फगुनाहट की मस्त हवा ,
रस्ते के बगीचे में
आम के मंजर की भीनी खुसबू
पेडों पर कूकती कोयल
माँ के संग कहानी सुनते सुनते स्कूल जाते हुए

चल रे मन कहीं और चल .
दादी के साथ
चाँदनी रात में गाते - खाते हुए
गंगा मईया के गीतों को सुनते - सोते हुए .
चल रे मन कहीं और चल
.

2 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया!!

रंजीत said...

Wah kaushal jee wah ! Gawn ke din ko yad karne ke liye badhaee. Shharatee jindgee me Gawan kahan yad aate hain logon ko. kuch samay me hee aapne apne blog ko kaafee samridh kar liya hai . Patna college kaa sansmaran behtereen lag rahe hain . kya aagen Patna university me paida huee Gundagardee aur netagaree par kuch padhne ko milega ?
Ranjit