Saturday, April 18, 2009

मेरे हमउम्र मुस्लिम लड़के कहाँ थे ?

 

1970 से लेकर 1990-91 तक के मेरे विद्यार्थी काल में मेरे हम उम्र मुस्लिम लड़के कहाँ थे ?

मेरा यह मानना है के अगर समाज अपनी बुनावट में सतरंगी है तो सातो रंग , हर सामाजिक इकाई में दिखें ,यही स्वाभाविक कहा जायेगा . और अगर मेरी इस मान्यता को सुधी और गुणी जन सही मानते हैं तो यह प्रश्न वाजिब है की अपने दौर के उस जमात के लड़कों की खोज की जाय .

मेरी पैदाईस जिस गाँव में हुई वह सन 1947 के पहले मुस्लिम बहुल गाँव था . 
1946 के सितम्बर महीने में यूं तो पूरे देश में सांप्रदायिक राजनीति , घृणा और दंगे पूरे उफान पर था पर बिहार का मगध क्षेत्र ख़ास कर पटना और बिहार शरीफ का इलाका धू - धू कर जल रहा था .बिहार के इस इलाके में साम्प्रदायिकता की आग को फौरी तौर पर मुस्लिम लीग के द्वारा प्रायोजित डायरेक्ट एक्शन डे और कलकत्ता और नोआखाली के दंगों की प्रतिक्रिया लोग बाग कहते रहे हैं .खैर कारण जो भी रहें हों उन दंगों ने इस इलाके के सांस्कृतिक भूगोल और सामजिक ताने बाने को पूरी तौर से बदल दिया .मुस्लिम गाँव लुटे और जलाए गए . सामूहिक नरसंहार की स्मृतियाँ आज भी पटना और नालंदा जिले के सामुदायिक स्मृति में कायम है.

ग्रामीण जन आज भी काल गणना के लिए तीन सन्दर्भों का उपयोग करते हैं- १९३४ का भूकम्प - भुईआं डोल , सितम्बर 1946 का दंगा - राईट या मियाँ मारी और 1966 का अकाल - सुखाड़ . मेरा गाँव उस पुरे इलाके के चंद गाँव में से एक था जहां बाहरी लोग लूट मार करने में सफल नहीं हो पाए. बाद में शांति बहाल होने पर इलाके की मुस्लिम जनता गाँव को छोड़ कर शहरों - बिहारशरीफ, हिलसा , इस्लाम पुर ,पटना / पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान का रुख कर गयी.मुसलमानों के घर और खेत को लोग खरीदने और हथियाने लगे . 

मेरा गाँव भी मुस्लिम परिवारों से खाली होने लगा .मेरे होश में गाँव में दो तीन घर ही मुसलमान बचे थे.एक मेरे पडोसी मूसा मियाँ का परिवार .मुसा मियां घर के सामने की मस्जिद में अजान देते थे और इलाके भर के लिए झाड़ फूँक का काम भी करते थे . साईं के तौर पर फसल कटाई के समय खेत खेत घूमते थे ,किसान श्रधा पूर्वक फसल का कुछ हिस्सा दे देते थे. रोजी रोटी का बाकी मसला परचून की एक दूकान और बीडी बना कर चलाते थे.
मूसा मियाँ मेरे उर्दू शिक्षक भी थे. मैं और मेरे हम उम्र उनका लडक इसा एक साथ उर्दू पढ़ते थे. इसा मेरे साथ पांचवी छठी तक हीं पढा ,बाद में वह कम उम्र में सिलाई का काम सिखाने के लिए अपने बड़े भाई के पास मसौढी चला गया .

मां के स्कूल से सातवीं पास कर मैं पटना कौलेजीअट स्कूल आ गया . १९७५ में कौलेजीअट स्कूल में सौ डेढ़ सौ छात्रों में , जहां तक स्मरण है तीन चार मुस्लिम लडके भी नहीं थे .

बाद में नैनीताल के आवासीय विद्यालय में एक गोरखपुर का मुस्लिम सहपाठी से मुलाकात हुई .खुर्शीद अहमद रिजवी . उसने दसवीं क्लास में एक नाटक लिखा था . मेरे हाउस मास्टर की प्रेरणा से उस नाटक का स्कूल ऑडिटोरियम में सफल मंचन हुआ था . रिजवी दसवीं के बाद स्कूल से वापस गोरखपुर चला गया . पूरे स्कूल में 550 छात्रों में बीस पच्चीस मुस्लिम छात्र थे . उसमें भी ज्यादा तर बिहार के .बाबर सुलतान , जो गया का रहने वाला था , 1982 में अपनी प्रतिभा के बदौलत स्कूल का हेड बॉय बना .

थोडा और आगे चलते हैं दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कॉलेज और खास कर होटल में - हॉस्टल के 175 छात्रों में एक भी मुसलमान नहीं .जहाँ तक स्मरण है इकोनोमिक्स ओनर्स के क्लास में एक भी मुसलमान नहीं छात्र या छात्र नहीं . चलिए थोडा और आगे बढा जाय .
 दिल्ली विश्वविद्यालय का दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनोमिक्स -
एम् ए अर्थशाश्त्र में हम सब कुल १५० छात्र छात्राएं .पर एक भी मुसलमान नहीं . उसके बाद फिर जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में जाना हुआ और वहाँ मुस्लिम छात्रों की अछि तायदाद थी . पर वहाँ भी ज्यादा संख्या में उर्दू फारसी और अरबी पढ़ने वाले. और अधिकतर बरास्ता अलीगढ विश्वविद्यालय , जे एन यू पहुंचे थे.

पंद्रह - सत्रह सालों के इस सफ़र में इस तरह चंद मुस्लिम सहपाठी मिले.

जानने का मन करता है के इस मजहबी जमात के मेरे हमउमर कहाँ थे और क्या कर रहे थे ?

1 comment:

दिनेशराय द्विवेदी said...

सवाल अच्छा है, वे जवाब देंगे तो बहुत से सवाल खड़े हो लेंगे।