Tuesday, March 3, 2009

दीवाली - वीरेन्द्र की भोजपुरी कविता

वीरेन्द्र की भोजपुरी कविता - दीवाली .पटना गाँधी मैदान का यह मंच ,हम सब के लिए बिहारी जन जीवन , इतिहास ,समाज ,आशा और निराशा , जय पराजय अर्थात हमारे सामूहिक जीवन के राग रंग का आइना या कहें की मेटाफर है. मित्र वीरू ने कविता का सन्दर्भ दिया है . इसे पढें और अपने उदगारों से अनुगृहित करें. अब उनकी जुबानी ----

मैं भोजपुरी भाषी हूँ. भोजपुरी शब्दों के अर्थ जिस तरह खुद-ब-खुद निचुड़ कर मेरे जेहन को शुकून पहुंचा जाते हैं, वैसा आमतौर पर हिंदी और अंग्रेजी के शब्द नहीं कर पाते. बहुत दिनों तक मुझे लगता रहा है और अभी भी लगता है कि जिस भाषा में हम संगीत समझ पाते हैं, उसी भाषा में कविता भी करनी चाहिए. जानता हूँ कि कविता का लयात्मक होना कविता होने की शर्त नहीं होती, फिर भी दिल है कि मानता नहीं. आज मैं आपके लिए भोजपुरी कवितायेँ लेकर आया हूँ. मन में संशय है कि गैर-भोजपुरी भाषी इन कविताओं को गैरवाजिब तो नहीं मान लेंगे? रब झूठ न बोलाय, मैं भाषा के आधार पर इस मुल्क में किसी नई राजनीतिक अस्मिता की पैरोकारी कटाई जरूरी नहीं समझता. तो आईये, इसे पढें और थोडी-सी प्रशंशा करें ताकि लगे कि भोजपुरी में कविता भी हो सकती है, सिर्फ भोंडे गाने ही नहीं लिखे जा सकते .

कविता का मथेला (शीर्षक) दीवाली --- सन्दर्भ बताना यहाँ जरूरी समझता हूँ. कल्पना कीजिये कि कोई प्रिय दीवाली के दिन अपनी प्रियतमा के साथ नहीं है. प्रियतमा समझ नहीं पा रही है कि क्या करे, क्या न करे. दीप जलाए कि न जलाए. फिर पता नहीं क्या आता है उसके मन में कि वह भी दीवाली की रात दिए जला देती है. प्रभु की माया देखिये कि इधर वह दीप जला बूझी आँखों से आकाश को निहार रही है कि उसका प्रियतम आन पड़ता है. प्रियतमा का दीप जलाना प्रिय को अच्छा नहीं लगता और वह शंकालु हो उठता है. उदास हो जाता है कि उसकी गैर मौजूदगी में भी उसकी प्रिया के मन में इतना उमंग और उत्साह है कि वह दीप जला उसका इज़हार कर रही है. यही सन्दर्भ है और आगे कविता के रूप में प्रियतमा का जवाब है.


ई दीवाली के दीप जनी बूझ बलम,
ई सुहागिन के प्रीत जनी बूझ बलम.
एही जियरा के माटी के दियरा बनल,
आपन धूनल परनवा के बाती पूरल,
जोगल नेहिया के तेलवा से दियरा भरल
ओमें बिरहा के अगिया से तितकी धरल
जरल जिनगी के जिनगी ना बूझ बलम
ई सुहागिन के प्रीत जनी बूझ बलम
ई दीवाली के दीप जनी बूझ बलम.
दिया अंचरा के ओट में ई कबतक रही
चोट सुधिया के जियरा ई कबतक सही
चटक जाई दियरा, सब तेल धरती बही
ई बियोगिन के जिनगी में कुछ न रही
ई ता माटी ह, लोहा ना बूझ बलम
ई सुहागिन के प्रीत जनी बूझ बलम
ई दीवाली के दीप जनी बूझ बलम.

8 comments:

sanjeev ranjan said...

अपनी मिटटी की सुगंध-वाली कोमल भावनाओं की पारदर्शक कविता ... संजीव रंजन, मुजफ्फरपुर

Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna said...

मित्र
याद करें .
बहुत पहले हम लोग चर्चा करते थे और विद्वतजनों से सुना करते थे के विज्ञान और जनपक्षीय तकनीकी विधाएं अभूतपूर्व ढंग से समाज के लोकतांत्रिकरण की कूवत रखती है .
इन्टरनेट और अब ब्लॉग जगत ने तो ज्ञान के क्षेत्र में हलचल मचा दिया है .
एक मायने में हमारी ऐतिहासिक तमीज और तहजीब की विश्व मानव सभ्यता को कुछ अनुपम भेटें रहीं हैं.संस्थागत रूप में ज्ञान पर एकाधिकार का अनोखा भारतीय मॉडल .
मित्र लगता है के अब इसके दिन गिने चुने रह गए हैं.हाँ इसे व्यक्ति के जीवन काल के सन्दर्भ में न देखा जाय बल्कि समाज जीवन के परिप्रेक्ष्य में लें .
मैं आपको ले जाना चाहता हूँ आज से ज्यादा नहीं सौ डेढ़ सौ साल पहले. तत्कालीन अनपढ़ ,ग्रामीण और खेतिहर समाज में भी भावना की तरंगें उठती होंगीं .पर बहुत हुआ तो वाचिक परंपरा का हिस्सा हीं बन पाती थी .और लोक कलायों और गाथायों यों भी धार्मिक और नैतिक आवरण या कहें तो मुलम्मे से ढकी नहीं रहती थी ऐसे में तो फेर बदल की काफी गुंजाएस होती होगी.जो धार्मिक श्रुति काव्यों और ग्रंथों को रक्षा कवच उपलब्ध था वह इन लोक गथायों को कहाँ नसीब.चार्वाक के -- भस्मी भूते देहस्य पुरागमन कुतः के पहले की छेड़ छड़ याद हैं न . पर गायत्री मंत्र में छेड़ छड़ की कल्पना भी महापापम .
पर अब देखिये ज़माना चाँद सालों में कितना बदल गया है
आप देखिये इन्टरनेट और ब्लॉग जगत का जादू . न न कहते हुए भी आपके कवि मन को उन्मादी कर दिया
वीरू क्या बेहतरीन कविता कही है आपने.
तो लगे रहें इसी तरह , बिना कोई संकोच के
मित्र ,आलोचना और असफलता का निर्मूल भय और कल्पना की नीची उडान ( माफ़ करें lack of imagination कहना चाह रहा हूँ )हीं एक मात्र बाधा है . बाकी निर्वाध समतल मैदान है .
क्षमा याचना सहित के कविता की बेला में मैं क्या इतिहास और समाजशास्त्र ले कर बैठ गया .
कौशल

sanjeev ranjan said...

कौशल जी,
इतिहास, samaj shashtra आदि बड़ा अहम् है कि नामवर सिंह जी नें इन्हीं आयुधों के जोर se हिंदी के कोमल-सुकुमार कवि-कहानीकारों को पछाड़ माडा है. सबकी घिघी बांध जाती है और मैदान छोड़ कर भाग खडे होते हैं. आपकी बात अकादमिक सम्यकता से लबरेज है. वीरू इत्तिफाक करेंगे ... संजीव रंजन, मुजफ्फरपुर

Viru said...

मेरी भोजपुरी कविता पर कौशल की जो टिपण्णी आई थी, उसे मित्र संजीव ने "अकादमिक सम्यकता से लबरेज़" कहा है. कौशल की टिपण्णी उन्हें हिंदी के मूर्धन्य आलोचक नामवर सिंह की शैली और मीमंषा पद्धति से मिलती-जुलती लगी. संजीव की टिपण्णी में मुझे नामवर सिंह सैनिक लगे - प्रशिक्षित, हूनरमन्द और समाज, इतिहास और सिद्धांत के हथियार भांजते हुए. हंसी आ गयी उनकी इस फूहड़ छवि को देखकर. नहीं, संजीव मैं आपके इस चुहल से इत्तफाक नहीं रखता. यह सच से परे और दुखद है. यह मतभेदों के प्रति क्रूर व्यवहार है. मुझे नहीं लगता कि जीवन को समझने का सबका नजरिया एक जैसा होता है या होना चाहिए. जो मुझसे अलग और इतर है, वह हमारे लिए भला सर्वथा मजाक और चुहल का विषय क्यों हो? इस चुहल के पीछे मुझे कोई मंगलकारी उद्देश्य नज़र नहीं आया. उल्टे, एक तरह की वितृष्णा नज़र आई.
वीरेन्द्र

sanjeev ranjan said...

वीरू, अव्वल तो क्षमा प्रार्थना. उत्तर बाद में. मलाल बस इतना कि - बन गया रकीब आखिर, था जो राजदां अपना.

sanjeev ranjan said...

कमबख्त शेर गलत कह गया, जबकि लिखना चाहता था कि - शायद किसू के दिल को लगी उस गली में चोट, मेरी बगल में शीश-e-दिल चूर हो गया

Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna said...

मित्र वीरू
आप का कवि ह्रदय आपके शब्दों में इसी तरह उन्मादी बना रहे और गीत और कवितायें कहतें रहें.
संजीव ने मुझे इतने महान शख्सियत के समतुल्य कर दिया के मुझे उनके सुफिआना कलाम पर अचरज और हैरान हूँ.
संजीव लगें रहें
आपके मुजफरपुर यात्रा और कथा सुनाने और सुनाने को बेताव हूँ.
नामवर सिंह को फिर से पढूंगा इस वायदे के साथ
सादर

Viru said...

प्रिय संजीव,
पहला शेर वाकई गलत था क्योंकि अपना राजदां रकीब बना ही कब था! अलबत्ता, दूसरा शेर वह कह गया जो संजीव ही कहे तो बेहतर. मित्र, न तो हमारे दिल के टुकड़े होंगे और न वे बिखरेंगे. तुम चुहल करो, हम बिदके भी नहीं? यह तो प्रीति की रीति नहीं होगी न? या, फिर तुम्हीं कहो किसी और ढंग से.
वीरेन्द्र