Monday, March 16, 2009

जीना हुआ दुश्वार

संजीव रंजन की कविता . कविता का सन्दर्भ मित्र संजीव ने लिख भेजा है.पढें और अपनी राय से सब की हौसल अफजाई करें.
कौशल जी,
प्रस्तुत कविता प्रिय वीरू के हौसले का प्रतिफल है. मैंने टेलीफून पर कभी बात-चीत के दौरान उनसे अपने बालकनी के नीचे-के पार्किंग स्पेस में जड़ पकड़ रहे एक नन्हे वट वृक्ष के ताजा स्थिति का ज़िक्र किया था. उन्होंने कहा कि यह कविता-सी प्रतीत हो रही है - आप इसे कौशल जी के ब्लॉग पर भेजें. अब यह आप के हाथ में है :

जीना हुआ दुश्वार ...
मेरी बालकनी के नीचे-के
पार्किंग स्पेस
मेंएक बे-आबरू कुआँ और एक नन्हा वट-वृक्ष hai
oopar-वाले तले का किरायदार
उस पर सुबह और शाम को पाइप से पतले-धार
कीबारिश करता हैजिससे
उसके अक्सर पत्ते
और उसका आधा से ज्यादा
किशोर धड
सतह पर भींग जाता है
नीचे की ज़मीन भींग जाती है,
पर पानी-पानी नहीं होता है
(बदहाल ज़मीन क्षण-भर मेंपी जाती है)
उसका बाक़ी-का मुख्य आहार
फिनाइल आदि के मसाले-wala
kachade का शोरबा है
अल्ल-सुबह से देर दोपहर tak
safaayee -वाले और waaliaan
taawad tod
वह शोरबा
गुटखे की पीक के saath
us नौनिहाल की जड़ में
पटाये जाते हैं.
.......
दोपहर में
कभी कुछ देर तक
उस बेजुबान को
जब देखने का अवसर होता hai
tab लगता hai
ki फुन्गिओं पर कीउसकी
नवजात हरी pattiyaan
सिहर रहीं है.
.. संजीव रंजन, मुजफ्फरपुर

1 comment:

Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna said...

संजीव ,
जीवन के स्पंदन और संघर्ष को समेटती आप की यह कोमल कविता ,
और वो भी ब्लॉग पर .
डिअर ,
संकोच छोडें और अपनी कल्पना के कपोतों को नीले नभ में
आकुल और निर्विघन उडान के लिए
मुक्त करें.
इन कपोतों को आपने बहुत तडपाया .
आजाद करें .
बहने दें भावों को .
कौशल