Thursday, February 12, 2009

बिहार - सदी 13 से 1857 तक : क्या कहने योग्य कुछ भी नहीं है ?

कल एक मित्र से चर्चा हो रही थी । इतिहास के विद्यार्थी रहें हैं । लोक मंगल की भावना रखते हैं । अपनी आप बीती इमानदारी से बतातें हैं । डिंग हांकू वर्तमान दौर में ऐसे लोग जीवन के शाश्वत मूल्यों में आप की आस्था को मजबूत करते हैं।
बात चीत बा-रास्ता पटना विश्वविद्यालय ,बोरिंग रोड चौराहा , वीणा सिनेमा हॉल में बौबी फ़िल्म , ब्लैक से टिकट खरीदना ,और टिकेट ब्लैक करने वालों से मारपीट , से होते बिहार के इतिहास ,इतिहास लेखन और शोध तक पंहुच गया ।
एक प्रसंग आया की गुप्त काल ,फा हेयान और हुवेन सांग तक तो बिहार का प्रसंग इतिहास के औपचारिक लेखन में आता है , पर फिर शेरशाह के दिल्ली फतह के बाद औपचारिक इतिहास , बिहार और बिहारियों की दशा पर आम तौर पर मौन है।
हाँ, १७६४ का बक्सर युध्ध , ग़दर के सन्दर्भ में वीर कुंवर सिंह की बहादुरी और दानापुर की बगाबत आदि की चर्चा है।
लेकिन सोचने की बात यह है की क्या करीब ८००- १००० साल के इस लंबे दौर में लिखे और पढ़े जाने लायक कोई बात बिहार के भूगोल में नहीं घटित हुई ?
बख्तियार खिलजी द्वारा नालंदा विश्वविद्यालय की लूट , उदन्तपुरी का बिहार शरीफ में बदलना , सूफी संतों का बिहार आना ( मनेर शरीफ ) , बिहार का भूगोल भारत में इस्लाम का आरंभिक ठिकानों में एक होना, बाद में अफगानों और मुग़लों की लड़ाईयां , अकबर के सेनापति मान सिंह के नेतृत्व में बिहार बंगाल अभियान .धीरे धीरे सूफी संतों ,इस्लाम का बढ़ता प्रभाव , चैतन्य महा प्रभु और कबीर की सीख को अपनाता बिहारी कृषक समाज , मध्य युग के भीषण दुर्भिक्ष ( १६७० का दुर्भिक्ष जिसका फैलाव बनारस से राजमहल तक था ) - इन चुनिन्दा घटनायों का कुछ असर तो बिहारी समाज पर पड़ा होगा ?
क्या हजार साल के इस दौर में यहाँ के समाज ,राजनीति ,संस्कृति ,कृषि , तकनीक आदि में कुछ तो बदलाव आया होगा ?
इतिहास की एक परिभाषा के अनुसार इतिहास वर्तमान और भूत का निरंतर चलने वाला संवाद है । वर्तमान भूत से और उसके बारे में सवाल करता है । यही सवाल जवाब इतिहास है। कहने की जरूरत नहीं की यह प्रश्नोत्तरी कभी ख़त्म नहीं हो सकती है ।
कोई समाज इतिहास vihain नहीं होता ।
हाँ अगर समाज में ख़ुद पर bharosa है की अपने ithaas को अपनी najron से देखे तो इतिहास shunaytaa का prashna hin नहीं uthataa है।
इस दौर पर शोध करने waale २५-५० etihaaskaar अगर हो jaayen तो क्या औपचारिक इतिहास लेखन और विमर्श में यह najarandaaji बनी रह paayegi ?

4 comments:

रंजना said...

बहुत बहुत सही कहा आपने.सार्थक मुद्दा उठाया है....इतिहास में शून्यकाल का प्रावधान नही. यह अलग बात है कि उसपर लिखने वालों की कमी है...

उपाध्यायजी(Upadhyayjee) said...

आजादी के बाद इतिहास लिखने का जिम्मा जिन लोगो ने लिया वो राजनीति से प्रेरित थे | वही कुछ लिखा गया जो उनके आकाओं को अच्छा लगे | इतिहास के बहुत सारे तथ्य ऐसे होंगे जो कोई जान नहीं पायेगा | गंगा के मैदानी भागो में ऐसा हो नहीं सकता की समय रुक सा गया होगा | ये वो इलाका है जो हमेशा से क्रांति और बदलाव लाते रहा हो, चाहे वो प्राचीन इतिहास हो (बुद्धा, महावीर, अशोक) हो या वर्त्तमान (सामाजिक न्याय) | आपने बहुत सही प्रश्न उठाया है|

MUKHIYA JEE said...

दरअसल , उपाध्याय जी की बातों से मै सहमत हूँ ! अधिकतर इतिहासकार वामपंथी थे जिन्होंने इतिहास को अपने नज़रिए से पेश किया !

RRPSingh/My Space said...

कौशलजी चर्चित विचारों को परिपेक्ष में रखने के लिए धन्यवाद्. निश्चय ही किसी भी स्थान का कोई भी काल इतिहासविहीन नहीं हो सकता. कुछ न कुछ तो हुआ ही होगा. वहां के लोगों ने जीवन जिया होगा, सृजन हुआ होगा, वार्ताये हुई होंगी , विवाद भी हुए होंगे. पर क्या कुछ विसिष्ठ था जो उजागर किया जा सके. क्या कुछ ऐसा हुआ की लोगों की नज़र में आया. विद्वता और मुर्खता दोनों ही छुपती नहीं. अक्सर अच्छे लेखक छोटी छोटी बातों को इतने प्रभावी ढंग से लिखते हैं की घटना या व्यक्ति विशिष्ठ हो जाता है. टीवी और मीडिया ने यह कार्य आज के युग में कईयों को इतिहास बना गया. अवश्य ही इतिहास लिखने की आवश्यकता है पर इस अंतराल का बिहार देश का इतिहास बन पाया. बिरहा और चैता की तरह प्रादेशिक इतिहास बन कर रह जाएगा. शोध हो तो कुछ तथ्य अवश्य ही उजागर होंगे . मेरी कामना बिहार को भारत के प्रमुख और अग्रिणी अंग के रूप में देखने की है, न की हासिये पर. बिहार की समुचित विकास की चिंता करनी होगी और उन सभी ताकतों को मजबूत करना होगा जो बिहार को समृद्ध बनने की दिशा में हो रहे हैं. बिहार का इतिहास पुनः भारत के इतिहास का प्रमुख अंग हो यही चाहत है मेरी - मौर्य और गुप्ता काल की तरह. राजीव सिंह, श्रीकृष्णापुरी, पटना