Friday, February 27, 2009

दिल हीं तो है, न संगोखिश्त

( संजीव रंजन , मुजफ्फरपुर :मित्र संजीव आखिर हम सब के चंगुल में फँस ही गए.अपनी आप बीती सुना रहें हैं . वायदा है की इसकी कड़ियाँ वो क्रमशः जोड़ते जायेंगें .लुत्फ़ उठाएं और उनकी हौसला अफजाई करें. प्रस्तुत है उनकी रचना )

प्रिय कौशल,
यह पत्र मैंने २००७ के जुलाई-अगस्त महीने में अपने बेहद करीबी रिश्तेदार-दोस्त प्रभात को लिखा था. ऑफिस सील हो घुका था, कन्धा ज़ख्मी था, छोटे-मोटे काम और कर्जो से जीवन उबर-खाबर निकल रहा था. उन्हीं दिनों बड़े संयोग से एक अच्छे मुनाफे वाला दिलचस्प काम आया था. इस पत्र की आत्मा वही घटना है - इसे आपके ब्लॉग के सिपुर्द कर रहा हूँ :

प्रिय प्रभात,
मुजफ्फरपुर से आने के बाद जीवन और व्यवसाय में जो हलचल आया था अब लगभग शांत प्राय है। वैसे आलस्य अब भी विकट समस्या है और दीवानापन के दौरे आते हीं रहते हैं। स्वतः स्फूर्त नियमन वाला जीवन कमबख्त आये न आता है. यह जो पत्र मैं आज लिख रहा हूँ इसकी योजना पिछले दो महीनों से थी. अक्सर तो भूल हीं जाता था, जब याद आता कि लिखना है तब योजना करता कि आज रात को तसल्ली से जरूर लिखूंगा. रात आती और मुद्दे कि तरफ ध्यान जाता तो पाता कि वह योजना भीषण साहित्यीक चुनौती का वजन अख्तियार कर चुका है. कुछ उधेड़-बुन और लानत- मलामत के बाद यह निश्चय कर के कि कल तो पक्का हीं लिखूंगा उस बोझ के नीचे कुछ और चिंताओं को लेकर उखडा अनिश्चित सो रहता. यह सिलसिला जैसा कि पहले बता चुका हूँ पिछले दो महीनों से है।

बाक़ी काम-वाम का क्या है कि चल हीं रहा है. पिछली हफ्ते कुछ ऐसी स्थिति बनी थी कि तीन-चार अच्छे काम के मिलने की उम्मीद बंधी. लेकिन समय पर आवश्यक तैयारी कर संबद्ध चीजों को लेकर वक़्त पर नहीं पहुँच पाने से दो अच्छे काम ख़राब हो गए. एक तो बिल्कुल उखड गया और शिष्ट भाषा में लम्बा sangeen लेक्चर पिला गया. मैंने कुछ नहीं कहा कि क्या कहता!वैसे नुक्सान का ज्यादा मलाल नहीं हुआ क्योंकि उस दरम्यान में एक multinational NGO के ANNUAL रिपोर्ट का काम चल रहा था. काम के प्रत्येक चरण में प्रयाप्प्त प्रशंसा कि आमद थी और काम के स्केल के लिहाज़ से अच्छा मुनाफा बनता दिख रहा था. दूसरा बड़ा आकर्षण था कि जिस अथॉरिटी को मैं रिपोर्ट कर रहा था वह एक दिलफरेब महिला थी जिनसे दिन में कम-से-कम दो बार मिलने का अवसर था. लम्बा कद, लबालब व संपुष्ट संगठन, दिल्ली कि अक्सर महिलाओं-सी गोरी और सुंदर - बातचीत में बेबाक व सहज, और काम के फिनान्सिअल आस्पेक्ट्स के प्रति अतिरिक्त सजग. मिलने पर तपाक से हाथ मिलाती. मैं पता नहीं क्यों हिचक कर हाथ मिलाता. एक दिन उतावली में मैं उनसे पूछ बैठा कि आपके HUSBAND क्या करते हैं. उन्होंने छुटते हीं कहा, " आई ऍम सिंगल." आगे जब मैंने पूछा कि क्या वे दिल्ली हीं में जन्मी, पली और बढ़ी हैं तो उन्हों ने बड़े इत्मिनान और स्टाइल में कहा - हंड्रेड परसेंट. यहीं दिल्ली UNIVERSITY से एम.ए. करने के बाद अमेरिका के एक गिरामी UNIVERSITY से पीएच.डी कर संबद्ध NGO में बड़ी मुलाजिम हैं और मोटी तन्खाह पाती हैं. वसंत कुञ्ज में शानदार फ्लैट है, बड़ी गाडी है जिसे एक बुद्धू-सा ड्राईवर बड़ी सावधानी से चलाता है. उनकी छः महीने की विदेशी गुडिया-सी बिटिया है और सात-आठ साल का बड़ा मासूम बेटा है. शाम को काम के बाद वो अक्सर मुझे ड्राप कर दिया करती थी।

उनका काम हमने बड़ी मेहनत से बिलकुल वक़्त पर पूरा कर दिया. वे बहुत खुश हुईं और काम की तारीफ़ में चहक कर कहा - very beautiful, really beautiful. बिल देख कर अलबत्ता शांत हो गईं. बहुत देर तक देखती रहीं. चूँकि पन्नों की संख्या अनुमान से ज्यादा हो गईं थी अतः रिपोर्ट की प्रति इकाई राशि अनुबंधित राशि से ज्यादा थी. इसके प्रति हमने उन्हें काम के मध्य में हीं आगाह कर दिया था, फिर भी ऐसा लग रहा था कि उनके ध्यान में इस चीज को पहली बार लाया गया हो. मैं घबरा रहा था कि कहीं बहस न करने लगें और पैसे कम करनें कि जिद न कर बैठें. बहुत देर तक बिल कि पड़ताल करनें के बाद मामले को रद्द करते हुए उन्होंने कहा - ok. मैंने धीरे-से संतुलित जबान में पूछा - इज इट पिंचिंग? उन्होंने तनिक मुस्कुरा कर व्यंग्य में कहा - पेन्नी ऑलवेज पिंचेज. इसके बाद अपने महंगे पर्स से चेकबुक निकला, मेरी संस्था का नाम कन्फर्म किया और बिलकुल लड़किओं वाली हैण्डराइटिंग में चेकबुक को भर कर अपना तिरछा दस्तखत उस पर दर्ज कर रूखी मुस्कराहट के साथ मुझे थमा दिया. राशि को दुरुस्त पाकर मेरा कलेजा जोर से धड़कने लगा. चेक को सावधानी से मोड़ते हुए मैंने गुनहगारों वाले लहजे में कहना हीं शुरू किया कि 'आई डोंट नो इफ वी हैव औनर्ड योर एक्स्पेक्टेसनस और नौट ...' कि उन्होंने काटते हुए कहा - नो, आई हैव नो प्रॉब्लम. इट इज रादर गुड. इट डीपेन्ड्स औंन दी हाईअर अथॉरिटी. मैंने उन्हें याद दिलाया कि काम के दौरान उन्होंने एक और बड़े काम का जिक्र किया था और कहा था कि वह इस प्रोजेक्ट के ख़त्म होते हीं शुरू हो जायेगा. उन्होंने कहा - नहीं, उसमें अभी देर है. अभी तो एडिटिंग हीं चल रही है. मैंने पूछा - क्या महीने-दो महीने. उन्होंने कहा - दो महीने तो नहीं, लेकिन महीना-भर लग हीं जायेगा. मैंने चिंता और आग्रह को मिला कर अतिशय विनम्र भाव से पूछा - विल इट कम टू अस, ऐज promised. अबकी-बार वे हंस पड़ी. कहने लगीं - इट शुड. अब मेरे पास कहने या पूछने को कुछ नहीं था. चलने की बारी थी. सोच रहा था कि कुछ अच्छा कह कर हाथ मिला कर चलूँ. इसी दौरान उनका मोबाइल बजने लगा और वे फोन पर बातें करने लगीं. मैं असहज बैठा दीवारों पर लगे नोटिस और पेंटिंग्स को देखने लगा, कि टेबुल को हल्के से थपथपाने की आवाज आई. मैंने देखा कि वो कान से मोबाइल लगाये शिष्टाचार-वाली मुस्कराहट लिए मेरी तरफ मुखातिब हैं. आँखों को हल्के-से बंद कर के उन्होंने इशारा किया कि मैं जा सकता हूँ. मैं उठ खडा हुआ. हाथ मिलाने की पहल करने कि हिम्मत न हुई. उनकी शान में गर्दन को झुकाया और मुड़ कर वापस चल पड़ा. एक दो कदम बढाया हीं था की पीछे से उनकी आवाज आई - सी यू सून. मैंने मुड़ कर उनकी बात को गर्दन झुका कर एक्नौलेज किया, संक्छेप में सीयू कहा और बहार निकल आया. मन अतृप्त और अनिश्चित था, लेकिन कदम बड़े इत्मीनान से उठ रहे थे. शायद पैसे पूरे मिल जाने की वजह से. अब देखो कि वो दोबारा बुलाती हैं कि नहीं (... क्रमशः )
संजीव रंजन, मुजफ्फरपुर

3 comments:

Viru said...

प्रिय संजीव,
क्या कहूं? अपनी कहूं तो 'तेरी चुहल से प्यार कर बैठा, सारा जीवन तमाम कर बैठा'.
अभी इतना ही, बाकी तुमसे मिलने के बाद.

तुम्हारा

वीरू

Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna said...

कसबे के होटल के हलुवायी को याद करें कभी जलेबी छानता हुआ या फिर गरम गरम सोन्हें मोतीचूर के लड्डू कसता हुआ . देखने वालों और खास कर बच्चों को लार टपकाते वे जलेबियाँ और लड्डू . मुझे तो हाल तक हलुवायी के भाग्य से इर्ष्या होती थी . जब जी करे मन भर जलेबी और लड्डू खाए .बाद में जानकारों ने कहा कि बेचारे हलुवायी मिठाईयों को खा ही नहीं पाते क्योंकि बनाते ही बनाते ही इनका जी भर जाता है.
संजीव ,आप की इस लघु कथा को पोस्ट करने में आज जितना श्रम करना पड़ा कि मेरी स्थिति कसबे के हलूवायी की हो गयी है.
मैं बराबर कहता रहा हूँ कि कथा सामग्रियों का विपुल भण्डार आपके पास है.रस में सराबोर करने वाली शैली है और सोने में सुहागा यह के.अधिकतर भोगा हुआ यथार्थ .
शीघ्रताशीघ्र कथा का दूसरा भाग भेजें.
सादर

Viru said...

भाई संजीव,
क्या कहने! यह बेवफाई और ऐसी ढिठाई, खुदा खैर करे!
वीरू