Saturday, February 14, 2009

सवाल जमात में शामिल होने का है ?

क्या आप अभिव्यक्ति की स्वंत्रता , नारी स्वन्त्रत्य ,भारतीय समाज में बन्धुत्व की भावना को विकसित करने वालों ,लोकतांत्रिक मूल्यों - या यूँ कहें की भारतीय समाज ,राजनीति और संस्कारों के व्यापक और मुकम्मल लोकतांत्रिक करण में विश्वास रखते हैं ?
या फिर धर्म , संस्कृति , सभ्यता , आतंकवाद जैसी किसी चीज की दुहाई देकर इन भावनायों के विरूद्ध जाने वाली दूसरी जमात में खड़े होते हैं ?
फर्ज किया जाय की आप हिंदू है और अपनी हिंदू पहचान पर jaayaj और स्वाभाविक गर्व करते हैं। इस महान धर्म की उद्दात मूल्यों - जैसे - घाट- घाट में राम ,जड़ - चेतन सब उसी राम की परम अभिव्यक्ति , तो फिर क्या अपना और क्या पराया , क्या धर्मी और क्या विधर्मी , क्या हिंदू और क्या मुसलमान ?
और इस महान paramparaa के
अयं निज करोवेती , गणना लघुचेतसाम
उदार चरितानाम वसुधैव कुटुम्बकम
इसमे निहित महान आदर्श को आत्मसात कर लिया है तो sankirntaayon के दायरे क्या साए में भी न आयेंगें
और अपनी paramparaa ही इतनी सम्रिद्छ है की दूर या सात समंदर पार देखने की जरूरत नहीं रहेगी .
तो दोस्तों असली बात यह है की आप किस जमात में आना और रहना चाहते हैं ?
क्या भारतीय मनीषा और संस्कृत वांगमय में निहित सार्वभौमिक और शाश्वत मानव मूल्यों में विश्वास रखते हुए प्रगति गामी धारा का वाहक बनते हैं या फिर
भारत और भारतीय मूल्यों का तालिबानी करण, पक्ष अथवा परोक्ष रूप में करते हैं।
सवाल असली जमात का है ?

3 comments:

रंजीत said...

bhai, jamat to is dhartee par ek hee hai- insaniyat kee jamat, lekin unka kya karenge jiske liye jamat bhee rajnitik shastra ka kam kartee hi. mere najar me ek sachhe dharmik aadmee ke liye har dharma karniya hota hai, lekin satir log ek ko behtar dusre ko nikrist batakar aise logon ko gumrah karte hain.
Aap ne sahi sawal uthaya hi.

दिवाकर प्रताप सिंह said...

हमारे देश में प्रत्येक नागरिक अपने-अपने ढंग से उत्सव मनाने के लिए पूर्ण स्वतंत्र हैं। सांस्कृतिक-क्षरण या धार्मिक कट्टरता की आड़ में संविधान प्रदत्त "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता" का हनन नहीं होना चाहिए। "वैलेंटाइन-डे" का विरोध करने के नाम पर सरे आम अराजकता फैलाने और 'ला-आर्डर' अपने हाथ में लेने वालों पर रासुका (राष्ट्रीय सुरक्षा कानून) के अंतर्गत कठोर कार्यवाही की जानी चाहिए जिससे अहसास हो कि भारत में अभी भी संविधान का राज है, गुंडों का नहीं !

BBS said...

अडवाणी आजकल फिर राम की गंगा में डुबकी लगा रहे हैं. राम की लंगोट पकड़ कर अपना उल्लू सीधा करने में उनका कोई सानी नहीं है. 21st Century के पहले दशक के आखिर में भी ३०० साल पुरानी बात करते हैं. मुझे लगता है कि अडवाणी तो मुतालिक से भी बड़े दोषी हैं, क्योंकि उनका influence मुतालिक से कहीं ज्यादा है और अडवाणी कि बातों को केवल एक abberation मान कर अनदेखा नहीं किया जा सकता. ओबामा के युग में जब अडवाणी ऐसी बातें करते हैं तो बड़ी आत्मग्लानी होती है और जग हंसाई भी. मैं यह इस लिए कह रहा हूँ कि विदेश में रहने पर लोकल समाज इसको भारत की सपेरों और rope trick की छवि का वर्तमान स्वरुप समझते हैं.
मुतालिक तो केवल बाहरी symptom है, कैंसर तो अडवाणी जैसे लोगों की सोच में है.
चलिए अब तो यही कह सकते हैं " राम ही राखे"

भुवन