Wednesday, February 25, 2009

बिहार नायक तिरस्कार के अभिशाप की पीड़ा से जूझ रहा है

( वीरेन्द्र - अपने नए पोस्ट में बिहार के मौजूदा दौर की बदहाली के कारणों की तलाश इसके इतिहास में कर रहे हैं। लेख को पढ़ें और अपनी प्रतिक्रया से अवगत कराएँ ।)

बिहार नायक-तिरस्कार के अभिशाप की पीडा से जूझ रहा है

बिहार की वर्तमान दुरवस्था के लिए किसी एक कारण को चिह्नित करना गलत होगा. कोई चीज़ न तो एक दिन में बनती है और न ही एक दिन में मिटती है. भले ही आज बिहार बेहाली का पर्याय बना हुआ है, तो भी हमें झटके से यह नहीं मान लेना चाहिए कि मौजूदा बिहार एक ऐतिहासिक विचलन है, क्योंकि इतिहास में फिसलन इतना नहीं होता कि हम वर्तमान को उससे विलग कर समझ सकें. व्यक्तिगत तौर पर मैं मानता हूँ कि बौद्ध-मत के अलावा बिहार में ज्ञानोदय का कोई मुकम्मल दौर ज्यादा दिनों तक बरकरार नहीं रह सका. सच तो यह है कि बौध-धर्मं का स्वर्ण-काल भी कभी इतना ताक़तवर नहीं बना था कि उससे एक नई संस्कृति का सूत्रपात हो सके. धर्मं को जीवित रहने या रखने के लिए जरूरी है कि वह किसी नई आचार-संहिता अथवा संस्कृति का उत्स बने. बौध-धर्मं के काल में भी आचार-संहिता मनुस्मृति के नियमों के अनुरूप बनी रही. ब्राह्मणवादी सनातनी नैतिकता बौद्ध-मत को कभी भी स्वीकार नहीं कर पाई. उल्टे, उसके खिलाफ तरह-तरह की साजिशें कराती रही. कभी बुद्ध को नास्तिक करार देकर आम आदमी के मन में संशय के बीज बोने की कोशिश की गयी तो कभी उनकी आस्था की खिल्ली उडाई गयी. हम सभी जानते हैं कि बौद्ध-मत के समर्थन में एक तरफ अगर छोटी जातियाँ थीं तो दूसरी तरफ उसे सम्राट अशोक जैसे महान नृपतियों का भी राज्याश्रय हासिल था. लेकिन सदियों से दबी-कुचली और अनपढ़ रही इन निम्न जातियों के लिए यह संभव नहीं था कि वे अपने नए मत का कोई तार्किक और वैचारिक आधार ढूंढ पातीं. दूसरी तरफ राज्याश्रय की छत्रछाया में विकसित हो रहे इस धर्मं के प्रति ब्राह्मणी नैतिकता में सराबोर तत्कालीन बौद्धिक समाज की कोई खास रूचि नहीं बन पाई. कहने की जरूरत नहीं कि किसी नई विचाधारा को आगे बढ़ाने का काम उस समाज के बुद्धिजीवी ही करते हैं. चूंकि तब पढ़ने का अधिकार सिर्फ ब्राह्मणों या कह लीजिये द्विजों को था, इसलिए तब के हमारे समाज में अधिकाँश बुद्धिजीवी ब्रह्मण ही हुआ करते थे. ऐसे में यह अपेक्षा ही गैरवाजिब थी कि ये ब्राह्मण अपने धूर विरोधी के समर्थन में प्रचार-प्रसार करें. इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि राज्याश्रय की छाया हटते ही बौद्ध धर्मं का दायरा सिकुड़ता चला गया. अशोक के बाद के दिनों में खासकर पुष्यमित्र सुंग के शासन काल में बौद्धों के खिलाफ भरी दमन का सूत्रपात किया गया. लाखों की संख्या में बौद्ध भिक्षुक या तो मार दिए गए या फिर वे अपनी मातृभूमि से पलायन कर गए.

छठी सदी में हर्षवर्धन ने राजगीर में अंतिम बुद्धिस्ट काउंसिल बुलाई थी. इसे बुद्धिज्म का आखिरी पटाक्षेप भी कहा जा सकता है क्योंकि उसके बाद बौद्ध-धर्मं धीरे-धीरे अपने अवसान की ओर बढ़ता गया. उसकी प्राणशक्ति पर फिर से ब्राह्मणों का कब्ज़ा हो गया. बौद्ध-धर्मं के पुनर्जीवन की किसी भी संभावना को निरस्त करने के लिए पाखंड में सिद्धहस्त ब्राह्मणों ने उसी बुद्ध को विष्णु का दसवां अवतार घोषित कर दिया जो जीवन भर इसी पाखंड के खिलाफ लड़ते आया था. इतर विचारों को अपनाकर उसे अपनी तरह बना लेना ब्राह्मणों की सोची-समझी रणनीति रही है. अगर ऐसा न होता तो हमारे समाज में भगवान बुद्ध के जीवन से जुडी घटनाओं को लेकर कोई न कोई जीवंत लोक-उत्सव जरूर मनाया जाता. जहाँ हर छोटी-बड़ी बात अथवा घटना को लेकर जूलूस निकाले जाते हों, हर साधुनुमा आदमी की याद में हर गली, हर कूचे में सामूहिक आयोजन किये जाते हों, शोभा-यात्राएं निकली जाती हों, वहां आखिर ऐसी क्या बात हो गयी कि हमने महात्मा बुद्ध जैसे मनीषी की ऐसी अनदेखी कर दी. प्रति-संस्कृति के नायक की हत्या की सबसे आसान रणनीति यही है कि उसे तीज-त्यौहार, पूजा-उत्सव और मेला-बाज़ार के विमर्ष से बाहर कर दो. नायक-वध की ऐसी मिशाल आप कहीं और नहीं पाएंगे.

महात्मा बुद्ध की परम्पर की इस अनदेखी के लिए जिम्मेदार पूरा भारतवर्ष है, किन्तु सबसे ज्यादा बड़ा दोष तो बिहार का ही माना जायेगा क्योंकि बिहार ही उनका धर्मं और कर्म-स्थल रहा है। बिहार की दुरवस्था का एक कारण, मेरी समझ में, यही है कि उसने अपने इतिहास और धरोहर के प्रति बहुत ही कम संवेदनशील रहा है. नायक-पूजा जितनी बुरी बात है, उससे कहीं ज्यादा बुरी बात नायकों का तिरस्कार है. नायकों के प्रति मन में श्रद्धा का भाव ही किसी समुदाय अथवा समाज में उन्नयन के लिए सांस्कृतिक ऊर्जा प्रदान करता है.
वीरेन्द्र
( नोट - बिहार की दुरवस्था के दूसरे कारणों की पड़ताल अगली किश्तों में की जायेगी।)

5 comments:

Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna said...

वीरू , आप के पोस्ट पर यह त्वरित टिपण्णी है .
अरविन्द नारायण दास ने अपने एक लेख में अशोक के प्रस्तर स्तम्भ के बारे में एक वाकये को लिखा था . फिरोजशाह तुगलक के आदेश पर अशोक के एक प्रस्तर स्तभ को दिल्ली लाया गया .स्तम्भ के इतिहास या प्रयोजन आदि की जान कारी हेतु फिरोजशाह ने अपने दरबार के ज्ञानी लोगों को बुलाया. मौलवी पंडित सब . सनातन धर्म के मर्मग्य पंडित ने कहा की प्रस्तर स्तम्भ महाबली भी, का दातून है. तो १५ सदी तक आते आते हम ज्ञान और विज्ञान के इस सुमेरु पर आरूढ़ हो गए थे.
दूसरा सन्दर्भ मैंने क्रांतिकारी कवि गोरख पांडे से सुना . शिला लेखों और प्रस्तर स्तंभों में अशोक अपनी राजाज्ञा को " देवा नाम पिया दासी " ( पाली अथवा अपने संस्कृत रूप में जिसका अर्थ है की - देवों को जो नाम प्रिय है वह अशोक ) नाम से जारी करते थे . परवर्ती संस्कृत में यह शब्द समूह महा मुर्ख के विशेषण के रूप में उपयोग किया जाने लगा .
बौद्ध धर्म और उसके अनुयायिओं का सफाया महज तर्क और दार्शनिक शाश्त्रथों से नहीं हुआ. मध्य बिहार के सपाट भूगोल में थोडी दूर -दूर पर ऊँचे - ऊँचे टीले ( बेचिरागी गाँव ) बौद्ध स्तूपों के भग्नावशेष हैं जिनका काम तमाम महज अहिंसक तरीकों से हुआ हो यह नामुमकिन लगता है. बुध्ध का लोक जीवन से सम्पूर्ण सफाया एक साथ कई तरह की आशंकायों को जन्म देता है.
"रोम मिस्र ,यूनान सब मिट गए जहां से , कुच्छ बात है की हस्ती मिटती नहीं हमारी " हमारी हस्ती बरकरार रही , गौतम बुध्ध , कबीर आदि के वावजूद . क्या यह मुकम्मल तौर पर वाकई गर्व करने वाली बात है ?
आप गौर करेंगें तो संवाद और विमर्श आगे बढेगा .
कौशल किशोर

sanjeev ranjan said...

लेख मैं पढ़ न सका कि योग्यता और हिम्मत दोनों भाग खड़े हुए . वीरू अकादमिक चन्द्रगुप्त व कौशल चाणक्य सरीखे महान मगध कि तरफ से विश्व समुदाय को ललकारते प्रतीत हुए. काश कि मुझमे में भी योग्यता होती और मैं भी बिहार सुपुत्र के हौसले से इस अकादमिक महा समर का योद्धा बनता ... संजीव रंजन, मुजफ्फरपुर.

Viru said...

मित्र संजीव,
मेरे अनगढ़ लेख पर आपकी बेबाक टिप्पणी यानी 'जिसका डर था, बेदर्दी वही बात हो गई'. अनुमान तो मुझे भी था कि मेरे लेख की फूहड़ता सुधिजनों की संवेदना को रास न आएगी, किन्तु यह गुमान न था कि वह आप जैसे सहृदय मित्र को भी इस कदर डरा देगा कि बिन पढ़े ही उसकी बुद्धि और उसका साहस उसक साथ छोड़ जायेंगे, जानता हूँ कि इस पातक-कर्म के लिए माफ़ी की गुजारिश करना भी एक तरह से धृष्टता होगी, किन्तु पाप की यह गठरी कन्धों पर लादे कबतक निरापद रह सकूंगा? कभी-कभी तो लगता है कि नीयत कुछ भी रहे, होता वही है जो नियति तय कराती है. बड़ी मुश्किल से आपकी दोस्ती का दामन थामने का मौका मिला था, लेकिन देखिये तो अजाने ही क्या कर बैठा. आपका दिल के ही ऐसी-तैसी कर दी. रब झूट न बोले, मैं दिल्लगी नहीं कर रहा. तो सुन लीजिये, मैं कसम खता हूँ कि आज से मैं ऐसा कोई भी काम नहीं करूंगा जिससे मेरे मित्र कि सुरुचिपूर्ण संवेदना पर कोई खरोंच लगे. न तो अब किसी को डरूंगा, न ही किसी को (दुनिया की तो बात ही छोडिये) अपना लंगोट उठाने की चुनौती दूंगा. ललकारा तो अपने लेख मैंने किसी को नहीं था, लेकिन तोहमत यह लगी कि दुनिया को ललकार रहा हूँ- वह भी चन्द्रगुप्त बनकर चाणक्य के साथ. हाय री, नियति!

sanjeev ranjan said...

वीरू, मेरी जान!
अब आया खेल का मज़ा! मेरा कलाम बस इतना है कि इतिहास और विश्लेषण में, प्रदेश कोई हो - बिहार कि ओहियो, सामान्य मानव जीवन और मन - वह पीड़ित राजा का हो कि भूखे किसान का, पर भूगोल व संस्कृति भाड़ी पड़ते हैं. जबकि जड़ में, तह में, असल में मुद्दा मानव जीवन व शांति व आनंद प्रजनित vikas का होता है. और वह मुद्दा मैंने अपेक्षाक्रीत उपेक्षित पाया है. अतः परोक्ष विरोध मैंने दर्ज किया था. तुम्हारे लेखन प्रतिभा के बांकपन और विश्लेषण कि बुलंदी का तो मैं अव्वल आशिक हूँ ... संजीव रंजन, मुजफ्फरपुर

sujit chowdhury said...

अभी अभी मित्र कौशल जी ने फ़ोन किया और पूछा क्या कर रहे हो? मैंने कहा खाना खाकर सोने की कोशिश कर रहा हूँ। यह बात कौशल जी जो दिल्ली निवाशी हो गए हैं, उन्हें शायद अटपटा लगा । खैर उन्होंने बताया की आज वीरू भाई ने एक लेख पोस्ट किया है जिसपर कौशल जी ने अपनी प्रतिक्रिया दी । एक चन्द्रगुप्त तो दूसरा चाणक्य। बीच में मित्र संजीव ने अपनी लम्बी चुप्पी तोड़ते हुए अपनी टिपण्णी दी। वास्तव में मुद्दा गंभीर है। मेरे जैसे आलसी मानुष को सोचने, समझने और वेश्लेषण करने की जरुरत है। रात ढल रही है। मैं भी अपनी टिपण्णी दूँगा और आलसी होने के aarop से बचने की कोशिश करूंगा। कैर शब्बा खैर बोलने से पहले इस गंभीर ऐतिहासिक मुद्दे को दुष्यंत जी के शेर से सामयिक धरातल पर लाता हूँ ,
" भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ , आजकल दिल्ली में है जेरे-बहस ये मुद्दुआ ।"
सुजीत चौधरी